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जानें शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फांसी से पहले के वो 12 घंटे

भगत सिंह को फांसी का जो दिन तय हुआ था वह 24 मार्च 1931 का दिन था। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अपने फैसले में बदलाव कर भगत सिंह की फांसी का समय पहले से तय समय के 12 घंटे करने का ऐलान किया। दरअसल भगत सिंह को अगले दिन सुबह 4 बजे की बजाय उसी दिन शाम 7 बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा।

जानें शहीद-ए-आजम भगत सिंह की फांसी से पहले के वो 12 घंटे
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च 1931 का ही वो दिन था जब भगत सिंह को फांसी की सजा दी गई थी। उस दिन जेल के भीतर सुबह से ही चहल-पहल शुरु हो गई थी। शहीद भगत सिंह को फांसी की सजा दिए जाने का दिन मुकर्र हो चुका था। अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह को कई संगीन आरोपों में गिरफ्तार कर उन्हें फांसी की सजा का फरमान सुनाया था। सजा वाले दिन भगत सिंह पहले कि तरह सख्त अपनी ऑखों में वो ही पुरानी चमक के साथ उठे।
उनकी ऑखों में फांसी का तनिक भी डर नहीं था। उनकी फांसी से पहले के 12 घण्टे बहुत महत्तवपूर्ण और नौजवानों के लिए प्रेरणादयक थे। आइए आपको बताते है भगत सिंह की जिंदगी के आखिरी 12 घण्टो के बारे में जो किसी भी देशवासी को देश पर बिना किसी भय के हस्ते-हस्ते अपनी जान की कुर्बानी देने के लिए प्ररित कर सकते है।

दिन 23 मार्च,1931 समय चार बजे लाहौर सेंट्रल जेल के वॅार्डन चरत सिंह ने सभी कैदियों को आदेश दिया कि सभी अपने-अपने बैरक में लौट जाएं। जेल वॅार्डन के अचानक से चार बजे ही सभी कैदियों को बैरक में लौट जाने के फरमान ने हैरत में डाल दिया था। किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वॅार्डन सभी को बैरक में लौट जाने को क्यों कहा। वॅार्डन के आदेश पर सभी कैदी वापिस अपने बैरक में लौट तो आए लेकिन एक सवाल सभी को परेशान करता रहा।
तभी जेल के नाई बरकत ने हर कमरे के पास से गुजरते हुए दबी आवाज में बताया कि आज रात भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव को फांसी होने वाली है। इस खबर से सभी कैदी चिंतित हो गए और गुस्से में भर गए कि ऐसे कैसे ब्रिटिश सरकार बिना कानूनी कार्रवाई को पूरा करे बिना किस तरह से ऐसा फैसला सुना सकती है।
सभी कैदी भगत सिंह की फांसी के बाद उनकी कोई भी चीज जैसे पेन,कंघा या घड़ी कुछ भी हासिल करना चाहते थे। ताकि वह अपने लोगो को बता सके कि वो भगत सिंह के साथ जेल में बंद था। बहराल नाई बरकत भगत सिंह के बैरक में गया और वहां से उनकी कंघा,पेन बाकी चीजे ले आया।
उनकी चीजों के बटवारे के लिए कैदियों के बीच ड्रॅा निकाला गया।
भगत सिंह की फांसी से ठीक पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने आए थे। प्राण बताते है कि जब मैं भगत से मिलने जेल गया तो मुझे ऐसा लगा जैसे कोई शेर बंद पिंजरे में चक्कर लगा रहा हो।
प्राण बताते है कि उस दिन मुझे देखते ही भगत सिंह का पहला सवाल था कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए या नहीं। मै हैरान था लेकिन मैंने जवाब दिया कि हां लाया हूं। ओर जैसे ही मैंने किताब भगत सिंह के हाथों में उन्होंने बिना समय गवाए उसे पढ़ना शुरु कर दिया। ऐसा लगा जैसे उन्हें पहले से पता था कि उनके पास अब बहुत कम समय बचा है।
प्राण ने हिचकिचाते हुए भगत सिंह से पूछा क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? तो उस पर भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, "सिर्फ़ दो संदेश... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंक़लाब ज़िदाबाद!"

फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद बाद भगत सिंह ने अपने वकील प्राण से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें। जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी। भगत सिंह से मिलने के बाद प्राण राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी
में चले गए।
वकील प्राण मेहता के वहां से चले जाने के बाद जेल प्रशासन ने भगत सिंह और उनके दोनों क्रांतिकारी साथियों को बता दिया था कि उनको कल की बजाय आज फांसी देने का हुक्म है। दरअसल भगत सिंह को फांसी का जो दिन तय हुआ था वह 24 मार्च 1931 का दिन था। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अपने फैसले में बदलाव कर भगत सिंह की फांसी का समय पहले से तय समय के 12 घंटे करने का ऐलान किया। दरअसल भगत सिंह को अगले दिन सुबह 4 बजे की बजाय उसी दिन शाम 7 बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा।
ये सुनते ही भगत सिंह ने कहा कि क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी खत्म नहीं करने देंगे। कुछ देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर लाया गया। फिर उन तीनों का वज़न लिया गया और इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें। फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए, लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए।
जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाय सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे सुनाई देने लगे। भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िदाबाद' का नारा लगाएंगे।
सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी। जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया। काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे। अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया।
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