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जानें करतारपुर कॉरिडोर को लेकर क्यों मचा विवाद, इस शख्स ने की थी पहल

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय से करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में माथा टेकने के लिए भारत के सिख अनुमति मांग रहे थे। लेकिन अब जाकर उनका यह सपना साकार हो पाया है।

जानें करतारपुर कॉरिडोर को लेकर क्यों मचा विवाद, इस शख्स ने की थी पहल
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भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय से करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में माथा टेकने के लिए भारत के सिख अनुमति मांग रहे थे। लेकिन अब जाकर उनका यह सपना साकार हो पाया है।

पाकिस्तान सरकार की ओर से करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में माथा टेकने के लिए भारत के सिखों को अनुमति मिल गई है। पाकिस्तान सरकार की ओर से अनुमति मिलने से भारत के लाखों सिखों में खुशी की लहर है।

पाकिस्तान सरकार ने घोषणा कि पंजाब के गुरदासपुर में स्थित करतारपुर कॉरिडोर अंतरराष्‍ट्रीय सीमा तक निर्माण किया जाएगा। इसकी नींव 28 नवंबर को रखी जाएगी। जिसके लिए पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान पहुंच गए हैं।

करतारपुर साहिब गुरुद्वारा की अहमियत..

मालूम हो कि करतारपुर साहिब सिखों के प्रथम गुरु, गुरुनानक देव जी का निवास स्थान था और उनका निधन भी यही पर हुआ था। गुरुनानक देव जी की याद में गुरुद्वारा का निर्माण कराया गया।

करतारपुर साहिब, पाकिस्तान के लाहौर से 120 किमी दूर नारोवाल जिले में है जो पंजाब मे आता है। जहां पर गुरुद्ववारा है, वहीं पर 22 सितंबर 1539 को गुरुनानक देवजी ने अंतिम सांस ली थी।

ऐसा बताया जाता है कि गुरुनानक देव जी ने यहां पर अपनी जिंदगी के 18 वर्ष बिताए थे। करतारपुर कॉरिडोर सिखों के लिए सबसे पवित्र जगहों में से एक है, भारतीय सीमा की तरफ बसे सिख श्रद्धालु सीमा पर खड़े होकर दर्शन करते हैं।

यह श्राइन रावी नदी के निकट स्थित है और डेरा साहिब रेलवे स्‍टेशन से इसकी दूरी 4 किमी है। गुरुद्वारा भारत-पाक बॉर्डर से मात्र तीन किमी दूर है। श्राइन भारत की तरफ से साफ नजर आती है।

सिद्धू के पाकिस्तान जाने के बाद हुई थी चर्चा..

केंद्रीय मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के एक दावे के बाद करतारपुर साहिब का मुद्दा चर्चा में आ गया था। नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान गए थे।

सिद्धू ने बताया कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने उनसे कहा है कि पाकिस्तान करतारपुर साहिब गालियारा खोल सकता है। यह बात उन्हें वतन लौटने पर कही थी।

जानकारी के लिए आपको बता दें कि भारत की आजादी के 70 सालों में विभिन्न सिख संगठनों के अलावा कई प्रधानमंत्री ने इसके लिए प्रयास किया था, लेकिन अब जाकर यह सपना पूरा हो रहा है।

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