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इच्छा मृत्यु मामला: असाध्य रोग के मरीज को इलाज से इंकार करने का अधिकार, पढ़िए SC का पूरा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में आधुनिक तकनीकों के साथ यह संभव है किमशीनों की मदद से मरीज की मृत्यु को महीनों और सालों तक आगे खींचा जाए।

इच्छा मृत्यु मामला: असाध्य रोग के मरीज को इलाज से इंकार करने का अधिकार, पढ़िए SC का पूरा फैसला

उच्चतम न्यायालय ने आज कहा कि असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति को‘‘ लंबी शारीरिक पीड़ा' से बचने के लिए चिकित्सकीय इलाज से इंकार करने का अधिकार है।

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में की।

पीठ ने असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति के गरिमापूर्ण मृत्यु के लिए इलाज से इंकार करने संबंधी इच्छा पत्र को निष्पादित करने के अधिकार को कानूनी मान्यता दी।

पीठ ने ऐसे मरीज के इलाज से इंकार के अधिकार को स्वीकार करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति जो व्यस्क है और मानसिक रूप से स्वस्थ है, उसे इलाज से इंकार करने का अधिकार है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि 21 वीं सदी में चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के साथ यह संभव है कि सहायक मशीनों की मदद से मरीज की मृत्यु को महीनों और कई मामलों में सालों तक आगे खींचा जाए। ऐसे समय पर इलाज लेने से इंकार का अधिकार सामने आता है।

शीर्ष अदालत ने कई विदेशी फैसलों का जिक्र किया और कहा कि एक अमेरिकी अदालत ने व्यवस्था दी है कि हर व्यक्ति जो वयस्क तथा मानसिक रूप से स्वस्थ है उसे यह तय करने का अधिकार है कि उसके शरीर के साथ क्या किया जाएगा।

ये है पूरा घटनाक्रम

संविधान पीठ ने कहा कि इस मामले में कानून बनने तक फैसले में प्रतिपादित दिशानिर्देश प्रभावी रहेंगे।

* 11 मई, 2005: उच्चतम न्यायालय ने असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति को निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने संबंधी गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका को मंजूरी दी। न्यायालय ने सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में घोषित करने का अनुरोध करने वाली याचिका पर केन्द्र से जवाब मांगा।

* 16 जनवरी, 2006: न्यायालय ने दिल्ली चिकित्सा परिषद( डीएमसी) को हस्तक्षेप करने की अनुमति दी और निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु पर दस्तावेज दायर करने का निर्देश दिया।

* 28 अप्रैल, 2006: विधि आयोग ने निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु पर एक विधेयक का मसौदा तैयार करने की सलाह दी और कहा कि उच्च न्यायालय में दायर ऐसी याचिकाओं पर विशेषज्ञों की राय लेने के बाद ही फैसला हो।

* 31 जनवरी, 2007: न्यायालय का सभी पक्षों से दस्तावेज दायर करने का निर्देश।

* 7 मार्च, 2011: अरूणा शानबाग की ओर से दायर अन्य याचिका पर न्यायालय ने मुंबई के एक अस्पताल में पूर्णतया निष्क्रिय अवस्था में पड़ीं नर्स को इच्छा मृत्यु की अनुमति दी।

* 23 जनवरी, 2014: भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पी. सताशिवम की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मामले पर अंतिम सुनवाई शुरू की।

* 11 फरवरी, 2014: डीएमसी ने भारत में निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु पर नीतिगत बयान संबंधी अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला की कार्यवाही से जुड़े दस्तावेजों की प्रति न्यायालय को सौंपी, न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा।

* 25 फरवरी, 2014: न्यायालय ने शानबाग मामले में दिये गये फैसले सहित निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु पर दिये गए विभिन्न फैसलों में समरूपता नहीं होने की बात कहते हुए जनहित याचिका को संविधान पीठ के पास भेजा।

* 15 जुलाई, 2014: पांच न्यायाधीशों की पीठ ने याचिका पर सुनवाई शुरू की, सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को नोटिस भेजे, वरिष्ठ अधिवक्ता टी. आर. अंद्यार्जुना को न्याय मित्र नियुक्त किया। मामला लंबित रहने के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी।

* 15 फरवरी, 2016: केन्द्र ने कहा कि वह मामले पर विचार कर रही है।

* 11 अक्तबूर, 2017: भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने दलीलें सुनी और फैसला सुरक्षित रखा।

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