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कौन हैं रोहिंग्या जिनको वापस भेजने पर होता रहता है बवाल, जानें पूरा मामला

भारत सरकार ने पहली बार देश में अवैध रूप से घुसे सात रोहिंग्याओं को वापस भेजने का फैसला किया है। इस मामले में वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की बात कही थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

कौन हैं रोहिंग्या जिनको वापस भेजने पर होता रहता है बवाल, जानें पूरा मामला

भारत सरकार ने पहली बार देश में अवैध रूप से घुसे सात रोहिंग्याओं को वापस भेजने का फैसला किया है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई जिसमें वकील प्रशांत भूषण ने याचिका दायर करके रोहिंग्याओं को वापस भेजने पर रोक की मांग की थी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इंकार कर दिया। यह सात रोहिंग्या असम के सिलचर में अवैध रूप से रह रहे थे। जांच के बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया था।

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 40 हजार से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान गैरकानूनी तौर पर रह रहे हैं। ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमान इस वक्त जम्मू कश्मीर, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान में बसे हैं।

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मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि इस समय यूएनएचसीआर के पास भारत में रह रहे 14,000 से अधिक रोहिंग्या के बारे में जानकारी मौजूद है। लेकिन कमसे कम 40 हजार रोहिंग्या भारत में हैं उनमें से सिर्फ 14 हजार ही वैध हैं बाकी अवैध हैं।
अवैध विदेशी नागरिकों का पता लगाना और उन्हें वापस भेजना की एक प्रक्रिया है जिसमें गृह मंत्रालय 1946 विदेशी अधिनियम की धारा 3(2) के तहत अवैध विदेशी नागरिकों का पता लगाने और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर रहा है।
राज्य सरकारों को भी रोहिंग्या सहित अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करने उन्हें रोकने और उन्हें वह वापस भेजने की शक्तियां मिली हुई हैं। भारत में सबसे ज्यादा रोंहिग्या मुसलमान जम्मू और कश्मीर में बसे हैं। वहां करीब 10,000 रोंहिग्या मुस्लिम अवैध रूप से बसे हुए हैं। जो वहां अपनी पकड़ बनाते जा रहे हैं। इनके कारण सुरक्षा एजेंसियां लगातार परेशान होती रहती हैं।

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यह पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब म्यांमार सरकार ने 1982 में राष्ट्रीयता कानून बनाया था जिसके तहत रोहिंग्या मुसलमानों का नागरिक दर्जा खत्म कर दिया गया था। इसके बाद से ही म्यांमार सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करती आ रही है।
हालांकि, इस पूरे विवाद की जड़ करीब 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है, लेकिन 2012 में म्यांमार के राखिन राज्य में हुए सांप्रदायिक दंगों ने इस मुद्दे को हवा देने का काम किया।
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