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आदिवासी इलाकों में बिना किसी मदद के इस महिला ने तीन महीनों में बनवाए 500 शौचालय

सरकार से बिना मदद लिए फोरेस्ट अधिकारी पीजी सुधा ने तीन महीनों में 500 टॅायलेट का निर्माण कराया। सुधा ने यह शौचालय केरल के एर्नाकुलम जिले के 9 आदिवासी इलाकों में बनवाए हैं। सुधा ने इन 500 शौचालय का निर्माण कार्य महज 3 महीनों में ही पूरा कराया है।

आदिवासी इलाकों में बिना किसी मदद के इस महिला ने तीन महीनों में बनवाए 500 शौचालय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वच्छ भारत अभियान और खुले में शौच पर रोक को लेकर देशभर में जागरूक अभियान जारी है। प्रधानमंत्री की इन योजनाओं को लेकर देश के दूर-दराज इलाकों में तेजी से काम चल रहा है। लेकिन भारत में ऐसे भी कई हिस्से है जहां पर अभी तक इन योजनाओं को लेजाने में सफलता नहीं मिल पाई है।

लेकिन देश में ऐसे भी लोग है जो खुद से बिना किसी सरकारी सहायता के अपने दम पर और अपने खर्च से पीएम मोदी के इस अभियान में सहयोग कर रहे हैं। हम आज आपको एक ऐसी ही महिला के बारे में बताने जा रहे हैं।

जिन्होंने अकेले ही बिना किसी मदद के करीब 500 टॉयलेट बनवाए हैं। केवल इतना ही नहीं इस महीला ने इन 500 टॅायलेट का निर्माण मात्र रिकॅार्ड तीन महीने में पूरा किया है। जो कि अपने आप में किसी हैरत से कम नहीं है।

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हम आपको बता रहे है केरल की उस महिला के बारे में जो पेशे से एक सेक्शन फोरेस्ट अधिकारी है। और जिनका नाम पीजी सुधा है। आपको बता दें कि सुधा ने यह सभी 500 टॅायलेट किसी राजधानी या जिले में नहीं ब्लकि केरल के एर्नाकुलम जिले के 9 आदिवासी इलाकों में बनवाए है।

सुधा ने इन 500 शौचालय का निर्माण कार्य महज 3 महीनों में ही पूरा कराया है। आपको बता दें कि सुधा खुद एक आदिवासी इलाके से आती है और उन्होंने आज से 16 साल पहले राज्य वन विभाग कि नौकरी हासिल की थी।

सुधा के खुद आदिवासी इलाके से ताल्लुक रखने और के कारण उन्हें खुले में शौच से होनी वाली परेशानियों के बारे में पता था। जिसे लेकर उन्होंने तय किया था कि जब भी वह ऐसे किसी मुकाम पर होंगी तो जरूर इस दिशा में काम करेगी।

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लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था क्योंकि सुधा जब भी आदिवासी इलाके में शौचालय निर्माण के लिए किसी ठेकेदार के पास जाती तो पहले तो ठेकेदार आदिवासी इलाके का हवाला देकर काम करने से मना कर देता या फिर अगर राजी भी होता था तो काम के ऐवज में इतनी रकम की मांग करता कि जो सुधा के लिए उपलब्ध करा पाना संभव नहीं था।

सुधा ने बताया कि इलाके में कई ऐसे स्थान भी थे, जहां पहुंचना काफी कठिन है और वहां जाने के लिए 3 घंटे लगते हैं और पैदल ही जाना पड़ता है। उन स्थानों पर शौचालय बनाने के लिए ठेकेदार तीन गुना ज्यादा पैसे मांगते थे लेकिन उसके बाद उन्होंने आदिवासी लोगों के साथ मिलकर ही इस काम को अंजाम देना शुरु कर दिया।

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