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भारत के पहले HIV पीड़ित के संघर्ष की कहानी

1989 में वैलंटाइंस डे के दिन गोवा के रहने वाले डोमिनिक डीसूजा की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

भारत के पहले HIV पीड़ित के संघर्ष की कहानी

डोमिनिक डीसूजा, इनका नाम एड्स बीमारी की पड़ताल के इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता। भारत में एचआईवी पॉजिटिव पाए जाने वाले डोमिनिक पहले व्यक्ति थे।

1989 के वैलंटाइंस डे के दिन गोवा के रहने वाले डोमिनिक डीसूजा की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। सुबह का वक्त था। डोमिनिक अपनी मम्मी और चाची के साथ नाश्ता करके उठे ही थे कि पुलिस उन्हें उनके घर से खींचकर थाने ले गई।

जहां उनसे उनकी सेक्शुअल लाइफ और पर्सनल रिलेशनशिप से जुड़े एक के बाद एक सवाल पूछे गए। इस वक्त तक डोमिनिक को इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि उनके साथ इतनी सख्ती से इस तरह की पूछताछ क्यों की जा रही है।

उस वक्त डोमिनिक की उम्र 29 साल थी। डोमिनिक को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। करीब 25 साल पहले भारतीय कोर्ट में पहुंचा यह एचआईवी एड्स से संबंधित पहला केस था।

उस वक्त लाचार डोमिनिक एचआईवी पॉजिटिव पेशंट्स के लिए बने गोवा पब्लिक हेल्थ अमेंडमेंट ऐक्ट का सामना कर रहे थे। यहीं से उनकी मेडिकल और इमोशनल यात्रा की शुरुआत हुई।

सामाजिक तौर पर कई तरह की प्रताणनाओं का सामना करने के बाद डोमिनिक न केवल खुद अपने दर्द से बाहर आए बल्कि अपने जैसे दूसरे लोगों का सहारा बनने का निर्णय उन्होंने लिया।

हालांकि जिस वक्त डोमिनिक को अरेस्ट किया गया वह पूरी फीजिकली पूरी तरह फिट थे और उन्हें खुद को भी इस बीमारी के होने का अहसास नहीं था। डोमिनिक एचआईवी पेशंट थे लेकिन उन्हें एड्स नहीं था।

उन्हें 64 दिन तक सभी से दूर रखा गया। तब तक डोमिनिक की जॉब जा चुकी की। ऐसी स्थिति में डोमिनिक ने खुद को संभाला और किसी से सहारा मांगने के बजाय देशभर के एचआईवी पीड़ितों का सहारा बनने के लिए भारत के पहले एचआईवी पॉजिटिव ऐक्टिविस्ट बने।

डोमिनिक की शुरुआत के साथ ही गोवा में देश का पहला ऐसा एनजीओ बना जो एचआईवी पॉजिटिव लोगों के लिए काम कर रहा है। इसी के साथ गोवा एड्स ऐक्टिविज़म का केन्द्र बन गया।

डोमिनिक की दोस्त इसाबेल डी सेंटा-रीटा वेज इस एनजीओ को चलाने में पूरा सहयोग कर रहीं थी।

इसाबेल के अनुसार 'डोमिनिक जानते थे कि इस इंफेक्शन से पूरी तरह छुटकारा नहीं पाया जा सकता, लेकिन वह ऐसा ऑर्गेनाइजेशन खड़ा करना चाहते थे जो बिना किसी भेदभाव के इस वायरस की रोकधाम के लिए काम करे।'

अपनी उम्र के 33वें साल में डोमिनिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। हालांकि तब तक वह अपनी आधी लड़ाई जीत चुके थे। क्योंकि सरकार द्वारा पारित अमेडमेंट के तहत गोवा पब्लिक हेल्थ ऐक्ट के अनुसार अदालत ने हिरासत को वैकल्पिक बना दिया था।

डोमिनिक ए़ड्स के साथ जरूर जिए, लेकिन उन्होंने कभी खुद को शर्मिंदा महसूस नहीं किया। विज के अनुसार, अनुमान के मुताबिक आज भारत में 2.1 मिलियन एचआईवी पॉजिटिव लोग हैं।

आज इस वायरस से पॉजिटिव व्यक्ति के लिए इलाज उपलब्ध है। इसके द्वारा पीड़ित व्यक्ति सामान्य व्यक्ति जितनी उम्र जी सकता है। हालांकि इस बीमारी के कारणों से जुड़ी कुछ भ्रांतियां आज भी वैसी ही हैं। ऐसी सोच के चलते हमें पेशंट्स की केयर के लिए फंड जुटाने में खासी दिक्कत आती है।

करीब 25 साल हो गए, जब डोमिनिक का संघर्ष शुरु हुआ था। उनका संघर्ष सफल रहा। पिछले महीने पार्ल्यामेंट में एचआईवी/एड्स पर आधारित बिल पास हो गया।

इस पर डोमिनिस के अधिवक्ता आनंद ग्रोवर कहते हैं 'इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति समाज में अब सम्मान के साथ जी सकेगा। उसे सही इलाज मिल सकेगा।

हालांकि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।' डोमिनिक को याद करते हुए ग्रोवर कहते हैं ' 22 मई 1992 को मुझे डोमिनिक के हॉस्पिटल से कॉल आया, मैं तुरंत उससे मिलना दौड़ा।

डोमिनिक जो कि एक हैंडसम लड़का था, सिर्फ हड्डियों का ढांचा रह गया था। उसने मुझसे अस्पताल में वादा लिया कि वह रहे न रहे, एचआईवी से पीड़ित लोगों के लिए हम काम करना बंद नहीं करेंगे।

उससे किए गए इस वादे में मेरी लाइफ में बहुत कुछ बदल दिया और हमने एचआईवी पीड़ितों के अधिकारों की लड़ाई जारी रखी।'

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