Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

कर्नाटक में हमेशा रही सियासी उठापटक, जानें क्या है पूरी कहानी

कर्नाटक ऐसा प्रदेश है, जो सियासी उठापटक के लिए बदनाम रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह संभवतः यही है कि राजनीतिक दलों को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हो पाता है। ऐसे में जिनके पास थोड़ी सी भी शक्ति होती है, वह सत्ता पर कब्जा करके मनमानी करना चाहता है। प्रदेश का मौजूदा राजनीतिक संकट बाहरी वजहों से कम और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक का नतीजा अधिक है।

कर्नाटक में हमेशा रही सियासी उठापटक, जानें क्या है पूरी कहानी

कर्नाटक ऐसा प्रदेश है, जो सियासी उठापटक के लिए बदनाम रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह संभवतः यही है कि राजनीतिक दलों को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हो पाता है। ऐसे में जिनके पास थोड़ी सी भी शक्ति होती है, वह सत्ता पर कब्जा करके मनमानी करना चाहता है। प्रदेश का मौजूदा राजनीतिक संकट बाहरी वजहों से कम और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक का नतीजा अधिक है।

कांग्रेस के ऐसे दो विधायकों ने कुमारस्वामी सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान किया है, जिन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया गया है। इनमें से एक ऐसे हैं, जिन्हें मंत्री पद से हटाया गया है और दूसरे ऐसे हैं, जो मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज हैं। खबर तो यह भी आ रही है कि पांच और कांग्रेस विधायक एक-दो दिन में पार्टी से किनारा कर सकते हैं।

दो विधायकों के समर्थन वापस लेने से कुमार स्वामी के नेतृत्व वाली मिलीजुली सरकार पर फौरी तौर पर भले ही संकट न हो परंतु अब यदि दो-तीन और विधायकों ने पाला बदला अथवा इस्तीफा दिया तो सरकार का गिरना तय है। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए 113 विधायकों के समर्थन की दरकार होती है। जब यह सरकार बनी, तब मुख्यमंत्री को 116 विधायकों का समर्थन हासिल था।

पिछले साल मई में हुए विस चुनाव में 104 सीटें हासिल कर भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी परंतु भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए जनादेश गंवा देने वाली कांग्रेस ने मात्र 37 सीटें हासिल करने वाली एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली जेडीएस को समर्थन दे दिया ताकि कुमार स्वामी की अगुआई में मिली जुली सरकार स्थापित हो जाए।

तकनीकी तौर पर उन्हें बहुमत हासिल हो गया परंतु जो सरकार बनी वह नैतिक रूप गलत थी क्योंकि न केवल जेडीएस को राज्य के लोगों ने पूरी तरह नाकारा था बल्कि पांच साल से सत्ता में रही कांग्रेस को भी केवल 77 सीटें ही हासिल हो सकी थी और उसने जनादेश खो दिया था।

उस समय भाजपा पर यह आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक तिकड़म को सही ठहराने की कोशिश की कि गोवा और मणिपुर में भाजपा ने भी यही खेल खेला था। उन दोनों प्रदेशों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी,

परंतु भाजपा ने रातों-रात पाला बदलवाकर सरकार गठित कर ली। कर्नाटक में भी चूकि भाजपा ही सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, इसलिए राज्यपाल ने वीएस येदियुरप्पा को सरकार गठित करने का आमंत्रण दिया परंतु वह सदन में बहुमत हासिल नहीं कर सके।

कई प्रदेशों में ऐसा हो चुका है, जैसा समय-समय पर कर्नाटक में भी देखने को मिलता है। विधायकों को दूर-दराज के शहरों अथवा प्रदेशों में ले जाया जाता है ताकि दूसरे दल के लोग उन्हें बहला-फुसलाकर तोड़ न लें। तब भी ऐसा ही हुआ था।

इस समय भी कुछ ऐसे ही नजारे देखने को मिल रहे हैं। कुमार स्वामी सरकार पर अस्थिरता का संकट देखते हुए भाजपा ने अहतियातन अपने विधायकों को गुरूग्राम के एक रिजोर्ट में ठहरा दिया है। बुधवार को उस स्थान के बाहर अजीब सा नजारा देखने को मिला।

हाथों में हरियाणा कांग्रेस की तख्तियां लिए हुए कुछ लोगों ने भाजपा के खिलाफ नारेबाजी की। ऐसा किसलिए किया गया, किसी की समझ में नहीं आया। अपने विधायकों को एकजुट रखने में नाकाम कांग्रेस के कुछ नेता कुमार स्वामी सरकार पर संकट और उनके विधायकों की नाराजगी के लिए भी भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।

कर्नाटक का सियासी ऊंट किस करवंट बैठता है, यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे परंतु किसी प्रदेश में इस तरह की सियासी उठापटक जोड़ तोड़ के सहारे सरकारों का गठन और सत्ता पर कब्जे की आपाधापी किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। यह उन लाखों-करोड़ों लोगों की इच्छाओं आकांक्षाओं पर भी वज्रपात की तरह है, जो बड़ी उम्मीदों से सरकारें गठित करने के लिए मतदान करते हैं।

Share it
Top