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टाइगर मामले में फिर कर्नाटक से पिछड़ा मप्र, ताजा गणना के आंकड़ों से मिली जानकारी

देश में टाइगर बचाने के अभियान के तहत हर दो साल में टाइगरों की गणना कराई जाती है।

टाइगर मामले में फिर कर्नाटक से पिछड़ा मप्र, ताजा गणना के आंकड़ों से मिली जानकारी
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भोपाल. देश में टाइगरों को बचाने के लिए गणना की जाती है। गणना के मुताबिक कर्नाटक पहले एवं मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है। प्रदेश सरकार एक ओर कूनो-पालपुर में गुजरात से शेर लाने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसके अभयारण्यों में शेरों की तादाद में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो रही है। टाइगर सेन्सस (गणना) में देश में मप्र फिर दूसरे स्थान पर रहा है। लगातार दूसरी बार कर्नाटक ने प्रदेश को इस मामले में मात दी है।
देश में टाइगर बचाने के अभियान के तहत हर दो साल में टाइगरों की गणना कराई जाती है। पिछले वर्ष मार्च से अक्टूबर 2013 तक प्रदेश में भी टाइगरों की गणना की गई थी। गणना के आंकड़े देहरादून स्थित वन्य प्राणी संरक्षण संस्थान भेजे गए हैं। इन आंकड़ों को अगस्त-2014 में प्रकाशित कर सार्वजनिक किया जाना था। सूत्रों के अनुसार इस बार की गणना में मप्र में लगभग 280 टाइगर होने का पता चला है। उधर, कर्नाटक में करीब 320 टाइगर होने की जानकारी मिली है। इन आंकड़ों की मानें तो प्रदेश में बाघ संरक्षण के बावजूद इनकी संख्या में खासी वृद्धि नहीं हो पा रही है।
कर्नाटक व मप्र के बीच 20 बांघों का अंतर
साल 2010 की बाघ गणना में कर्नाटक और मप्र के बीच महज 20 बाघों का अंतर था। कर्नाटक में 280 बाघ पाए गए थे, जबकि मप्र में 260। इस बार की गणना के नतीजों से पता चलता है कि प्रदेश में बाघों की संख्या कर्नाटक की अपेक्षा कम बढ़ पाई है। कर्नाटक ने बाघों के संरक्षण पर काम करते हुए पिछले साल के मुकाबले 40 बाघ बढ़ा लिए, जबकि प्रदेश में महज 20 बाघ ही बढ़ पाए।
नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, क्यों पिछड़ा मप्र -
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