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Karnataka Floor Test Live: चार बजे राजनीतिक भंवर से उबरेगा कर्नाटक, खत्म होगा नाटक

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि कर्नाटक में जारी राजनीतिक अनिश्चतता का पटाक्षेप हो जाएगा। फ्लोर टेस्ट चार बजे होगा। जिसके बाद कर्नाटक में किसकी सरकार बनेगी यह तय हो जाएगा और प्रदेश राजनीतिक भंवर से बाहर आ जाएगा।

Karnataka Floor Test Live: चार बजे राजनीतिक भंवर से उबरेगा कर्नाटक, खत्म होगा नाटक
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि कर्नाटक में जारी राजनीतिक अनिश्चतता का पटाक्षेप हो जाएगा। आज शाम को चार बजे फ्लोर टेस्ट होगा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि कर्नाटक में जारी राजनीतिक अनिश्चतता का पटाक्षेप हो जाएगा। फ्लोर टेस्ट चार बजे होगा। जिसके बाद कर्नाटक में किसकी सरकार बनेगी यह तय हो जाएगा और प्रदेश राजनीतिक भंवर से बाहर आ जाएगा।

15 मई को विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद किसी दल को बहुमत नहीं मिलने से कर्नाटक में सियासी अनिश्चितता बनी हुई है। चुनाव नतीजे में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जनादेश उसे मिला, लेकिन कांग्रेस और तीसरे नंबर पर रही जेडीएस ने जनांकाक्षा के खिलाफ बैक डोर से सत्ता हासिल करने की कोशिश में गठबंधन कर लिया।

दोनों ने ही राज्यपाल के पास सरकार बनाने का दावा पेश किया। कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला ने सबसे बड़ी पार्टी के आधार पर भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दिया। राज्यपाल ने भाजपा के विधायक दल के नेता मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का समय दिया, हालांकि भाजपा ने एक सप्ताह का ही वक्त मांगा था।

कांग्रेस और जदएस गठबंधन को राज्यपाल का फैसला नागवार गुजरा और वे रात में ही सुप्रीम कोर्ट चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की और अदालत ने दो अहम बातें कहीं। पहली बात तो शीर्ष अदालत ने राज्यपाल के सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के अधिकार पर कुछ भी निर्देश देने से मना कर दिया। जिसके आधार पर राज्यपाल ने बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।

लेकिन अगली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा 15 दिन समय देने पर सवाल उठाया और केवल 24 घंटे का वक्त बहुमत साबित करने के लिए दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्यपाल पर सवाल उठे हैं कि आखिर इतना वक्त क्यों दिया? वे राज्य में राजनीतिक अनिश्चितता क्यों बनाए रखना चाहते थे। यह पहली बार नहीं है जब सरकार गठन में किसी राज्यपाल की भूमिका पर सवाल खड़े हुए हों।

इससे पहले भी कांग्रेस के समय में भी और भाजपा के समय में भी राज्यपाल और राजभवन के फैसले पर प्रश्न खड़े होते रहे हैं। गोवा, मणिपुर, मेघालय, तमिलनाडु आदि राज्यों में राज्यभवन पर प्रश्नचिन्ह लगे। कांग्रेस शासनकाल में भाजपा शासित राज्यों के खिलाफ राज्यपाल का जमकर दुरूपयोग हुआ था। खैर राज्यपाल को और अधिक सतर्कता, विवेक और संविधानसम्मत व कानून के आईने में सही फैसला करना चाहिए।

अपनी राजनीतिक निष्ठा को अपने फैसले की राह में नहीं आने देना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भी बीएस येदियुरप्पा को केवल 24 घंटे दिए हैं, जबकि सभी विधायक बेंगलुरु से बाहर हैं।

ऐसे में इतना कम समय देना उचित नहीं है। शीर्ष अदालत को पर्याप्त समय देना चाहिए था। लगता है किसी दबाव में इतना कम समय दिया गया है। आने वाले समय में इतने कम समय देने पर भी सवाल उठ सकते हैं।

शीर्ष न्यायालय को यह भी विवेचना करनी चाहिए थी कि कांग्रेस-जदएस गठबंधन किस परिस्थिति में बना है? क्या जनादेश इस गठबंधन के पक्ष में था? मात्र 24 घंटे मिलने के बावजूद बीएस येदियुरप्पा ने सर्वोच्च अदालत का सम्मान करते हुए विधानसभा के पटल पर बहुमत साबित करने का भरोसा जताया है।

अब देखने वाली बात होगी कि 19 मई के चार बजे येदियुरप्पा बहुमत सिद्ध कर पाते हैं या नहीं? हालांकि कर्नाटक में किसकी सरकार बनेगी यह तय हो जाएगा और प्रदेश राजनीतिक भंवर से बाहर आ जाएगा।

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