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कर्नाटक में सत्ता के लिए कांग्रेस का सुप्रीम नाटक, राहुल गांधी को रखना होगा इन बातों का ध्यान

कर्नाटक में सत्ता के लिए कांग्रेस का सुप्रीम नाटक भारतीय राजनीति में उतावलेपन की नई परिघटना है। कांग्रेस सत्ता के लिए इतनी व्याकुल दिख रही है कि रात को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पहुंचा जाती है। यह कदम पार्टी के हताशा को दर्शाता है।

कर्नाटक में सत्ता के लिए कांग्रेस का सुप्रीम नाटक, राहुल गांधी को रखना होगा इन बातों का ध्यान
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कर्नाटक में सत्ता के लिए कांग्रेस का सुप्रीम नाटक भारतीय राजनीति में उतावलेपन की नई परिघटना है। कांग्रेस सत्ता के लिए इतनी व्याकुल दिख रही है कि रात को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पहुंचा जाती है। यह कदम पार्टी के हताशा को दर्शाता है। क्या वाकई कांग्रेस उसी पार्टी की विरासत को ढो रही है, जिसके नाम देश की सबसे पुरानी पार्टी होने और सबसे अधिक समय तक सरकार चलाने का रिकार्ड है।

इससे पहले तक कांग्रेस सत्ता के लिए इतनी अधीर कभी नहीं दिखी थी। तब भी नहीं, जब गोवा, मणिपुर और मेघालय में विधानसभा चुनाव बाद सबसे पार्टी के रूप में उभरने के बाद भी उसने आगे बढ़कर सरकार बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। उस वक्त कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। तब भी नहीं जब अरुणाचल में कांग्रेस के 44 में से 43 विधायक ने पाला बदल लिया था।

इस बार अचानक कांग्रेस इतना सत्तालोलुप दिख रही है कि रात की भी परवाह नहीं कर रही है और उच्चतम न्यायालय के दरबार पहुंच गई। लेकिन शीर्ष अदालत ने राज्यपाल के अधिकार में दखल नहीं देकर कांग्रेस को आईना दिखाया। कमाल की बात तो यह है कि जो कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लेकर आई, उन्हीं के पास रात में दरवाजा खटखटाने पहुंच गई।

महाभियोग लाकर कांग्रेस पार्टी ने दिखा दिया था कि उसे देश के चीफ जस्टिस पर भी भरोसा नहीं है। जबकि कांग्रेस सबसे अधिक समय तक सत्ता में रही है और सभी संस्थानों का सममान करने की बात कहती है। कांग्रेस इस बात को समझ नहीं रही है कि कर्नाटक की जनता ने उसे नकार दिया है। कर्नाटक के राज्यपाल ने अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया और उसे बहुमत साबित करने के लिए समय दिया।

इसमें संविधान के विरुद्ध कुछ भी नहीं है। राज्यपाल के पास सरकार बनाने के लिए बुलाने के अधिकार हैं। विधानसभा चुनाव के बाद बने कांग्रेस और जनता दल सेकुलर गठबंधन को अपने विधायकों के ऊपर इतना ही भरोसा है और उनके पास बहुमत है तो, फिर अधीर होने की क्या जरूरत है। राज्यपाल ने भाजपा को बहुमत साबित करने का वक्त दिया है,

अगर वह तय समय पर बहुमत सिद्ध नहीं कर पाएगी, तो राज्यपाल खुद ही इस गठबंधन को मौका देंगे। 15 दिन इंतजार करने में क्या हर्ज है। कांग्रेस ने यह भी कहा है कि अब वह गोवा में सबसे बड़ी पार्टी के आधार पर सरकार बनाने का दावा करेगी। यह भी बचकाना ऐलान है। गोवा में सरकार बने 15 महीने बीत गए, और अब कांग्रेस ऐसा सोच रही है।

हार दर हार के बाद लगता है कांग्रेस अपना आपा खोती जा रही है। कांग्रेस को जनादेश का सममान करना सीखना चाहिए। कर्नाटक में तो उसी की सरकार थी, तो अगर जनता ने बदलाव किया तो कांग्रेस को उस पर चिंतन करना चाहिए कि उन्हें दोबारा मौका क्यों नहीं मिला। जदएस के साथ गठबंधन तो कांग्रेस की जनादेश के खिलाफ बैक डोर से ही सत्ता पाने की कोशिश है। कांग्रेस को सोचना चाहिए कि सत्ता के लिए ऐसी अधीरता उसकी बची खुची साख भी खत्म कर देगी।

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