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Karnataka Live: इस वजह से राज्यपाल वाजुभाई और सुप्रीम कोर्ट ने दिया भाजपा को सरकार बनाने का मौका

Karnataka Election Results 2018 Live: कर्नाटक में किसे सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करे, यह मुश्किल सवाल वहां के राज्यपाल वाजुभाई आर वाला के सामने के सामने जरूर था परंतु सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में आए दिशा निर्देशों और परंपराओं ने उनकी राह आसान भी कर दी।

Karnataka Live: इस वजह से राज्यपाल वाजुभाई और सुप्रीम कोर्ट ने दिया भाजपा को सरकार बनाने का मौका
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कर्नाटक में किसे सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करे, यह मुश्किल सवाल वहां के राज्यपाल वाजुभाई आर वाला के सामने के सामने जरूर था परंतु सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में आए दिशा निर्देशों और परंपराओं ने उनकी राह आसान भी कर दी। चुनाव पूर्व यदि किन्हीं दो या उससे अधिक दलों के बीच गठबंधन अथवा तालमेल होता है, तब बहुमत मिलने की सूरत में उसके नेता को आमंत्रण दिया जाता है।

परंतु यदि एक-दूसरे खिलाफ चुनाव लड़ने और नतीजे आने के बाद दो दलों के बीच गठबंधन होता है, तब राज्यपाल के पास यह सोचने का विषय होता है कि क्या अवसरवादी दलों का इस तरह से बनने वाला गठबंधन प्रदेश को स्थायी और कल्याणकारी सरकार दे पायेगा? ऐसे में उनके पास यह विकल्प बचता है कि वह ऐसे दल की संख्या को आंके, जो सबसे बड़ा भी हो और जो सदन के भीतर बहुमत साबित करने का विश्वास भी दे।

कर्नाटक के मामले में इसे अगर दूसरी तरह से देखा जाये तो कांग्रेस पांच साल से सत्ता में थी। 2013 के चुनाव में उसे 122 सीटें हासिल हुई थी। इस चुनाव में उसने जन विश्वास खो दिया। वह 122 से 78 पर पहुंच गई। यानी उसके 44 विधायक कम हो गये। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली दूसरी पार्टी जनता दल एस को 2013 में 40 सीटें मिली थी, जो इस चुनाव में घटकर 37 रह गई।

यानी न जनता ने जनता दल एस में विश्वास व्यक्त किया और न ही कांग्रेस में लेकिन जिस भारतीय जनता पार्टी में भरोसा जाहिर किया, वह बहुमत के जादुई आंकड़े से सात-आठ अंक दूर रह गयी। उसे 104 सीटें हासिल हुई। अब यहां यह देखना जरूरी है कि अभी 2 सीटों के लिये चुनाव होना बाकी है और भाजपा ने तीन दूसरे विधायकों के समर्थन का दावा राज्यपाल के सामने पेश किया है।

इसके अलावा उसे कांग्रेस के सात लिंगायत विधायकों के समर्थन की बात भी मीडिया में आ रही है, जो सदन में बहुमत साबित करते समय वोटिंग में हिस्सा नहीं लेकर अथवा अनुपस्थित रहकर भाजपा की मदद कर सकते हैं। ऐसा अलग-अलग प्रदेशों में कई बार हो भी चुका है। राज्यपाल के समक्ष विचार के कई मुद्दे रहे। उन्हें यह तो देखना ही है कि कौन सा दल जनपेक्षाओं के अनुसार प्रदेश को साफ सुथरी और टिकाऊ सरकार दे सकता है।

यह भी देखना जरूरी था कि जनता ने किसके प्रति विश्वास व्यक्त किया है और किसे नकार दिया है। जिन दो दलों के प्रति लोगों ने अविश्वास जाहिर किया है, यदि वे दोनों अवसरवादी बनकर हाथ मिला लें तो यह जनादेश का सीधे तौर पर अपमान माना जाना चाहिए। भाजपा प्रदेश में पहले भी सरकार बना और चला चुकी है। केन्द्र में भी उसके नेतृत्व में सरकार चल रही है। उसे ही सर्वाधिक 104 सीटें भी मिली हैं।

ऐसे में तमाम पहलुओं को देखने-परखने के बाद राज्यपाल के समक्ष उसे ही सरकार बनाने का न्योता देने और अपना बहुमत साबित करने के लिये कहने के अलावा दूसरा कोई रास्ता था ही नहीं। हां, यदि सबसे बड़ा दल-भाजपा स्वयं सरकार बनाने के प्रति असमर्थता जाहिर कर देती, तब वह चुनाव परिणामों के बाद बने गठबंधन को मौका दे सकते थे।

वैसे भी कर्नाटक में चुनाव हारने वाली कांग्रेस पार्टी ने पूरे नतीजे आने से पहले ही जिस तरह से जनता दल एस को समर्थन देने और राजभवन पहुंचकर मिली-जुली सरकार बनाने का दावा पेश करने की जल्दबाजी दिखायी, उसे यही संदेश गया कि ऐसा करके न केवल वह पेशबंदी कर रही है,

बल्कि बेंगलुरू की सड़कों पर मीडिया कैमरों के सामने एक राजनीतिक दृश्य पेश करके वास्तविक नतीजों और जनभावनाओं को नकारने की कोशिश करके लोगों का ध्यान इससे हटाने का प्रयास ही कर रही है कि राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस एक और बड़े राज्य में हारने का इतिहास रच चुकी है।

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