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अब आसान नहीं होगा बच्चों से भीख मंगवाना

जूविनाइल जस्टिस कानून 2015 के क्रियान्यवन की निगरानी बाल आयोग करेगा।

अब आसान नहीं होगा बच्चों से भीख मंगवाना
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नई दिल्ली. देश की राजधानी से लेकर बाकी राज्यों में सड़क किनारे, चौक-चौराहे से लेकर ट्रैफिक सिग्नल पर बच्चे बड़ी तादाद में भीख मांगते हुए नजर आ जाते हैं। इनमें कुछ मजबूरी तो कुछ जबरन मजबूर किए हुए होते हैं। लेकिन अब प्रवृति को बदलने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने कमर कस ली है। आगामी तीन महीनों के अंदर इस मुद्दे को आयोग राष्ट्रीय अभियान की तर्ज पर उठाते हुए प्रत्येक राज्य से संवाद करेगा और बाल संरक्षण के लिए संशोधित जूविनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन कानून) 2015 कानून के कठोर क्रियान्वयन की निगरानी करेगा।
नया कानून जानना जरूरी
आयोग का कहना है कि पहले भी भीख मंगवाने को लेकर काूनन था लेकिन उसमें सख्त सजा का प्रावधान नहीं था। लेकिन जनवरी 2016 में अधिसूचित हुए संशोधित जेजे कानून में सख्त सजा का प्रावधान भी जोड़ा गया है और आयोग को इसके क्रियान्वयन की निगरानी करने का अधिकार दिया गया है।
12 राज्यों में हुई कार्यशालाएं
अब तक गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, असम, मणिपुर राज्यों में कार्यशालाएं आयोजित हो चुकी हैं। इसमें आम जनता को इन कानूनों के बारे में जानकारी दी जा रही है।
दिल्ली से शुरुआत
आयोग के सदस्य यशवंत जैन ने हरिभूमि को बताया कि इस पर स्वत: संज्ञान लेते हुए हमने चाइल्ड लाइन और बाल सुधार समितियों (सीडब्ल्यूसी) के साथ करीब तीन बैठकें की और फिर चाइल्ड लाइन के जरिए दिल्ली में एक सर्वे कराया। इसमें 35 स्थानों पर कुल 600 बच्चे चिन्हित किए गए और उनकी सूची दिल्ली सरकार को भेजी गई।
इसी सर्वे के आधार पर 19 सितंबर को आयोग ने दिल्ली के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा कि वो सभी जिलाधिकारियों (डीएम) को सूचित करें और सम्स्या का हल निकालकर एक महीने में एनसीपीसीआर को विस्तृत रिपोर्ट सौंपे। फिर 22 सितंबर को दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग को भी इस मामले में पत्र लिखकर प्रदेश सरकार की मदद करने को कहा। मामले में तत्परता दिखाते हुए दिल्ली सरकार ने तय समय के अंदर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंप दी है।
अब आगे एनसीपीसीआर इसे राष्ट्रव्यापी अभियान बनाकर देश के सभी महानगरों व अन्य जगहों पर भी जेजे कानन के बारे में जागरूक्ता व इसके क्रियान्वयन की निगरानी करेगा। पुराने कानून में ऐसा कुछ अधिकार आयोग के पास नहीं था।
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