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जेजे कानून: नए नियम न मानने वाले बाल गृहों पर जड़ेगा ताला

किशोर न्याय कानून 2015 के नए नियमों की अनदेखी करने वाले बाल गृहों की अब खैर नहीं।

जेजे कानून: नए नियम न मानने वाले बाल गृहों पर जड़ेगा ताला
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नई दिल्ली. किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) कानून 2015 की अनुपालना के लिए केंद्र की ओर से बनाए गए नए नियमों की अनदेखी करने वाले बाल गृहों की अब खैर नहीं। क्योंकि जो संस्थान इन नियमों के विरूद्ध कार्य करता हुआ नजर आएगा। उसकी मान्यता तुरंत रद्द कर दी जाएगी। यह कहना है राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) का। गौरतलब है कि बाल अपराधों का निपटारा करने के लिए कानून बनाने का काम केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय करता है। लेकिन राज्यों में उसके क्रियान्वयन की निगरानी का काम एनसीपीसीआर करता है।
आयोग ने शुरू की राज्यों में पड़ताल
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य यशवंत जैन ने हरिभूमि को बताया कि आयोग ने किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) कानून 2015 की निगरानी का काम देश में शुरु कर दिया है। इसके तहत केरल, राजस्थान, असम, मणिपुर, मेघालय और हिमाचल-प्रदेश जैसे राज्यों के बाल गृहों, बाल सुधार संस्थानों का दौरा कर वहां की जमीनी स्थिति का आकलन किया जा चुका है। इसमें नए नियमों के तहत बच्चों से संबंधित विभिन्न संस्थानों द्वारा पंजीकरण न कराने की समस्या, फर्जी बाल गृहों की समस्या और बाल अधिकारों पर काम करने वाले स्थानीय प्रशासन से जुड़े लोगों में बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरुकता की कमी नजर जैसे मुद्दे प्रमुखता से नजर आए।
हिमाचल-प्रदेश को दिए निर्देंश
हिमाचल-प्रदेश के दौरे में जैन ने मनाली स्थित ‘दार-उल-फजल’ नामक बाल गृह को यह निर्देश दिए कि अगर वो जल्द ही जेजे कानून 2015 से जुड़े हुए नए नियमों के तहत पंजीकरण नहीं कराएगा, तो उसपर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इस संस्थान ने इस साल मार्च 2016 में स्थानीय प्रशासन से पंजीकरण कराया था। लेकिन अब इसे नए नियमों के तहत मान्यता लेनी होगी। इस बाल गृह की स्थापना 1982 में श्रीनगर में हुई थी। लेकिन इसके बाद हुए दंगों की वजह से दार-उल-फजल को वहां से हटाकर मनाली में स्थापित किया गया। अभी इस बाल गृह में कुल 78 बच्चे रहते हैं। यहां इनके लिए माध्यमिक यानि आठवीं कक्षा तक पढ़ने की व्यवस्था की जाती है। गृह में जम्मू-कश्मीर के 20 बच्चे, हिप्र के 50 और अरुणाचल-प्रदेश के 8 अनाथ, माता-पिता द्वारा छोड़े हुए बच्चे रहते हैं।
बीते वर्ष बना नया कानून
बाल अपराधों से जुड़ा नया कानून बीते वर्ष 2015 में बनाया गया है। जबकि इससे संबंधित नए नियम हाल ही में जारी किए गए हैं। इनके तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है। गौरतलब है कि बाल अपराधों के लिए किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) कानून वर्ष 2000 में बनाया गया था। इसके करीब पांच वर्ष बाद 2005 में इसमें संशोधन किए गए। लेकिन फिर निर्भया मामले के बाद 2015 में नया कानून बनाया गया है।
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