Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

लोकनायक जेपी ने इसलिए कभी नहीं लड़ा चुनाव, ऐसी थी राजनैतिक विचारधारा

जयप्रकाश नारायण देश के उन महान नेताओं में से एक हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए तो जंग लड़ी ही थी किन्तु आजादी के बाद भी जब इंदिरा गांधी भ्रष्टाचार एवं महंगाई पर लगाम लगाने के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन पर उतारू हो गयीं तो उन्होंने जनता की आवाज बुलंद की। इस आन्दोलन के दमन के लिए आपातकाल लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया।

लोकनायक जेपी ने इसलिए कभी नहीं लड़ा चुनाव, ऐसी थी राजनैतिक विचारधारा
X

जयप्रकाश नारायण देश के उन महान नेताओं में से एक हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए तो जंग लड़ी ही थी किन्तु आजादी के बाद भी जब इंदिरा गांधी भ्रष्टाचार एवं महंगाई पर लगाम लगाने के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन पर उतारू हो गयीं तो उन्होंने जनता की आवाज बुलंद की। इस आन्दोलन के दमन के लिए आपातकाल लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया।

इस तरह से वे जनता की आजादी की दो जंगों के नायक के रूप में सदैव याद किए जाएंगे। उन्हें लोग जेपी के नाम से भी जानते हैं। जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और जनशक्ति को जागृत करने के लिए अपनी अन्तिम सांस तक वे संघर्ष करते रहे। उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा और न कभी उन्हें सत्ता के किसी पद की ही कोई आकांक्षा रही।

सम्राट, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री शासन चलाते हैं, लेकिन एक जननेता जनता के दिलों पर राज करता है। जेपी एक ऐसे ही जननेता थे, जो लोकनायक के रूप में विख्यात हुए। वह गांधी के अनुयायी और प्रखर समाजवादी थे। सन्ा 1942 के स्वाधीनता आंदोलन के समय इस देश की जनता में जयप्रकाश का बोलबाला था। जब गांधी ने ‘करो या मरो' का नारा दिया था तब अंग्रेजों ने देश के तमाम नेताओं को जेल में कैद कर दिया था।

ऐसा लग रहा था कि अब स्वतंत्रता का संघर्ष थम जाएगा। ऐसे समय में जेल से भागकर उन्होंने आजादी के संघर्ष को जारी रखा। शस्त्र भण्डारों पर छापे मारे, आजाद दस्ते खड़े किए, भूमिगत रहकर ब्रिटिश सरकार के नाकों दम कर दिया। उनका सिर लाने के लिए इनाम घोषित करना पड़ा। इन सारी पराक्रम गाथाओं ने जनता का हृदय हर लिया। आजादी के बाद राजपथ के बदले वे जनपथ की ओर मुड़े।

1960 के दशक में सक्रिय राजनीति से दूर होकर वे सामाजिक कार्यों में जुट गए। स्वतंत्रता और समानता ये दो आदर्श ही वे ‘प्रकाश स्तम्भ' थे जिन्होंने जयप्रकाश को अपनी ओर आकर्षित करके उन्हें कंटीले रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता का अर्थ एक उपनिवेशी सत्ता से मात्र छुटकारा पाना नहीं था और न ही यह तत्कालीन सरकार में परिवर्तन करना था।

जयप्रकाश के लिए इसका अर्थ इन सीमित ध्येयों से परे था। जिसमें शामिल था हर एक अन्याय शोषण और असमानता से मानव जाति को छुटकारा। साहस, आत्मसमर्पण की भावना और निष्ठा से प्रेरित होकर जनसाधारण को स्वतंत्रता और समानता दिलवाने की खोज में वे निकल पड़े। जयप्रकाश का जन्म 11 अक्टूबर 1902 में सीताबदियरा गांव में हुआ था।

यह गांव उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर उस स्थान पर है जहां सरयू और गंगा नदियां मिलती है। थोड़े-थोड़े वर्षो के बाद ये नदियां अपना रास्ता बदल लेती, और इनके किनारे पर बसे गांव इनकी चपेट में आ जाते। इसलिए उनके पिता हरसूदयाल को जो राज्य सरकार के नहर विभाग में अधिकारी थे, कई बार यहां से हटकर नए सिरे से अपना घर बनाना पड़ता था।

यहीं से नन्हें जयप्रकाश का मुसीबतों से परिचय हुआ। उनका पूरा जीवन आम जनता और लोकतंत्र के लिए संघर्ष की एक महागाथा है। जयप्रकाश नारायण के बारे में यह बताना भी आवश्यक है कि 1948 में स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि जयप्रकाश भारत के भावी प्रधानमंत्री हैं। 1953 में नेहरू ने उन्हें केन्द्रीय सरकार में आने का निमन्त्रण भी दिया था।

पर वे विनोवा के भूदान आंदोलन में हिस्सा लेने लगे और 1954 में अहिंसक क्रांति के लिए अपना जीवनदान करके पार्टी एवं सत्ता की राजनीति को सदा के लिए तिलांजलि दे दी, लेकिन जब इंदिरा गांधी- निरंकुश एवं अहंकारी शासक के रूप में उभरी और जनता भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी से त्राहि-त्राहि करने लगी तो वे खामोश नहीं रहे। हालांकि तब तक वह बूढ़े हो चुके थे।

वे जीवन मूल्यों और अखण्डता का क्षय देखकर दुःखी थे और यह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं देख सके। ऐसे समय में जयप्रकाश नारायण आम जनता की आशा आकांक्षाओं के प्रतीक बनकर सामने आए और उन्हें भी इंदिरा गांधी ने जेल में डाल दिया। बाद में जयप्रकाश नारायण को चुनाव में जीतने की चुनौती थी। उन्होंने यह चुनौती स्वीकार कर ली। यद्यपि उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा।

उनके मार्गदर्शन से जनता पार्टी बनी जिसमें कम्युनिस्टों को छोड़कर सभी दल शामिल हो गए। चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। स्वयं इंदिरा गांधी और संजय गांधी अपना चुनाव हार गए। जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनाए गए। जयप्रकाश सत्ता से दूर रहे। गांधी और जेपी नैतिक शक्ति के उत्कृष्ट नमूने हैं।

जेपी ने निरंकुश सत्ता के विरूद्ध लोक शक्ति संगठित की और सफल संघर्ष किया। राजनीतिक शक्ति प्रेरित करने पर भी वह स्वयं सत्ता में नहीं गए और अन्त तक सत्ता संन्यासी बने रहे। यह केवल व्यक्तिगत त्याग की बात नहीं थी, बल्कि इस बात की मिसाल है कि लोकतंत्र में नैतिक शक्ति का कितना ऊंचा और महत्वपूर्ण स्थान है।

जो लोकतंत्र स्थानीय जीवन में सक्रिय हो, जिसका राज्य शक्ति से सम्मानपूर्ण सहयोग हो, जिसमें नागरिकों को विचार और संगठन की स्वतंत्रता हो जिसके ऊपर जनता को बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का दबाव हो, जिसे नैतिक शक्ति का मार्गदर्शन तो प्राप्त होता ही हो, बल्कि जिस पर उसका अंकुश भी हो।

क्या वह लोकतंत्र क्रांतिकारी नहीं होगा, परिवर्तन के लिए काम नहीं करेगा? तो ऐसे लोकतंत्र में क्या अलग क्रान्ति की आवश्यकता रह जाएगी? हां ऐसे लोकतंत्र में क्रान्ति को जनता की शक्ति से, और उसी की गति से, चलना पड़ेगा। अब तक जो क्रान्तियां हुई हैं, या बड़े परिवर्तन हुए हैं उनके हो जाने पर उन पर राज्यशक्ति हावी रही है और क्रान्ति को राज्य शक्ति ने सीमित, खण्डित कर दिया है।

लोकतंत्र में जब लोकशक्ति परिवर्तन की वाहक होगी तो परिवर्तन का प्रवाह गतिशील रहेगा, सत्ता के खेल में फँसी राज्य शक्ति परिवर्तन के मार्ग में बाधा बनकर नहीं खड़ी हो सकेगी। क्रान्ति लोकतांत्रिक हो तथा लोकतंत्र क्रान्तिकारी हो, यह जेपी की दृष्टि थी। दोनों के उद्देश्य लोकतंत्र से सधने चाहिए। यह कल्पना जेपी ने की थी और उन्होंने उसकी योजना भी प्रस्तुत की थी।

उन्होंने कहा, लोगों को सतर्क रहकर रखवाले की भूमिका निभानी होगी ताकि लोकतंत्र की विभिन्न संस्थाएं ठीक से कार्य करें। यदि लोगों में एकता हो तो जनता की ताकत या ‘लोक शक्ति' बहुत सशक्त हो सकती है। लोक शक्ति में इतना बल है कि जो सरकार राष्ट्र के कल्याण के लिए ईमानदारी और सक्षमता से काम न करे तो वह उसे हटा भी सकती है। ऐसा करके उन्होंने दिखा भी दिया।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story