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जयललिता...हारकर जीतने वाली एक बाजीगर

बैंगलुरू कोर्ट में 2014 तक यह पूरी प्रक्रिया चली।

जयललिता...हारकर जीतने वाली एक बाजीगर
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नई दिल्ली. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के लिए साल 1996 बेहद मुश्किलों भरा रहा। यही वह समय था जब अम्मा को पहली बार जेल का मुंह देखना पड़ा। अम्मा के हाथों से सत्ता छिन गई और विरोधी पार्टियां इतनी हावी हो गई कि अम्मा की तबियत खराब हो गई थी। और उसके बाद उन्हें मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा। इसी साल आयकर विभाग ने जब जयललिता की कोठी पर छापा मारा तो वहां से उन्हें दस हजार साड़ियां और 750 जोड़ी जूते अल्मारियों में रखे मिले थे।
जब ललिता को किसी का भी साथ नहीं मिला
द हिंदू के मुताबिक, आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह जेल भी गई थीं। हालांकि इस मामले ने राजनीति में भूचाल जरूर ला दिया था। जिसके बाद जयललिता चुनाव भी हार गई थीं। इतना सब होने के बाद ललिता ने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था। ललिता ने सोचा कि यदि वह इस समय राजनीति छोड़ देती हैं तो उन्हें इन सब तमाम आरोपों के मामले से छुटकारा मिल जाएगा। उस समय में तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष जी. के. वासन, तमिल मनीला कांग्रेस के नेता एस. थिरुनावुक्कारसर, एमएमके के नेता ए. एच. जवाहिरुल्ला और कई अन्य नेता एडीएमके के उनके बेहद करीबी थे। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी का भी ललिता को साथ नहीं मिला।
जयललिता ने हार नहीं मानी
लेकिन जयललिता ने हार नहीं मानी और एक बंद कमरे में सामान्य परिषद की बैठक बुलाई और कहा कि करूनानिधि जी राजनीति में कोई चाणक्य नहीं हैं। यदि आप में से कोई उनका समर्थक है तो उसे पार्टी छोड़ देनी चाहिए। ताकि और ज्यादा से ज्यादा केस उस पर दर्ज न हो जाएं। इस बैठक के बाद राजनीतिक पार्टियों ने ऐसा मान लिया था कि जय ललिता अब पूरी तरह कमजोर पड़ चुकी हैं, टूट चूकी हैं। लेकिन लोगों कि इस धारणा को अम्मा ने गलत साबित कर दिखाया। जेल में 1 महीना बिताने के बाद जयललिता एक दम अलग दमदार अवतार में निकलकर जनता के सामने आइ। जयललिता पूरे जोश और ताकत के साथ अपने विरोधियों के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार थी। वो जानती थी कि उन्होंने भूतकाल में बहुत बुरा समय देखा है।
जब जयललिता ने दिया इस्तीफा
बैंगलुरू कोर्ट में 2014 तक यह पूरी प्रक्रिया चली। जेल का ये सफर जयललिता के लिए बेहद दर्दनाक रहा। मार्च 1989 में जयललिता ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। ठीक उसी तरह से सीएम जे. जयललिता ने भी साल 1989 में तमिलनाडु विधानसभा में अपने अपमान के एवज में प्रतिज्ञा की थी कि वो तब तक यहां कदम नहीं रखेंगी, जब तक ये सदन महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हो जाता।
पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं जयललिता
गौरतलब है कि, 1989 में जब विपक्ष की नेता जयललिता ने स्पीकर से कहा कि मुख्यमंत्री करूणानिधि के उकसाने पर पुलिस ने उनके फोन को टैप किया है इसलिए इस पर बहस होनी चाहिए लेकिन उस दिन बजट पेश होना था इसलिए स्पीकर ने कहा कि वे इस मुद्दे पर बहस की अनुमति नहीं दे सकते क्योंकि बजट पेश किया जा रहा है लेकिन एआइडीएमके के नेता इस बात पर गुस्सा हो गए और स्पीकर के सामने हल्ला मचाने लग गए। अंतत: जयललिता ने बोदिनायाकन्नूर से 1989 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और सदन में पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं।
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