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जम्मू-कश्मीर: घाटी में अब भी मौजूद हैं 240 आतंकवादी

गुरुवार 17 मई से शुरु हुए रमजान के पवित्र महीने की शुरुआत के साथ ही सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में सैन्य अभियानों पर लगायी गई रोक से कश्मीर में मौजूद कुल करीब 240 आतंकवादियों के हौसले बढ़ेंगे।

जम्मू-कश्मीर: घाटी में अब भी मौजूद हैं 240 आतंकवादी
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गुरुवार 17 मई से शुरु हुए रमजान के पवित्र महीने की शुरुआत के साथ ही सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में सैन्य अभियानों पर लगायी गई रोक से कश्मीर में मौजूद कुल करीब 240 आतंकवादियों के हौसले बढ़ेंगे। वह अपनी ताकत में इजाफा करेंगे, अपने संगठन को मजबूत करेंगे, हथियार एकट्ठा करेंगे और अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार करेंगे।

इससे रमजान के दौरान सूबे की महत्वपूर्ण सरकारी बिल्डिंगों, भवनों और सैन्य-सुरक्षा ठिकानों पर आतंकी हमलों से लेकर अमरनाथ यात्रा पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। यह जानकारी केंद्र के इस बाबत लिए गए निर्णय के बाद सैन्य-सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों ने हरिभूमि से बातचीत में दी।

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गौरतलब है कि कुछ दिन पहले सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में जिन 240 आतंकियों की मौजूदगी की बात कही थी। उनमें से 100 विदेशी और 140 स्थानीय आतंकवादी हैं।

आतंकी उठाएंगे फायदा

सेना के वरिष्ठ सेवानिवृत अधिकारी मेजर जनरल अफसर करीम ने कहा कि सूबे में सेना सहित अन्य सुरक्षाबल आगामी एक महीने तक मिलिट्री ऑपरेशन नहीं कर पाएंगे। इसका कश्मीर घाटी के अंदर और नियंत्रण रेखा के पार बैठे आतंकवादी और उनके आका भरपूर फायदा उठाएंगे।

वह अपनी ताकत में शत-प्रतिशत इजाफा करेंगे। रमजान के ठीक एक दिन पहले आया केंद्र की यह फैसला सुरक्षाबलों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

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आतंकी मौका मिलते ही उनपर या अन्य जगहों पर हमला कर सकते हैं। ऐसे में सिक्योरिटी फोर्सेज को सतर्कता में कोई कमी नहीं लानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्व में यह स्थिति में कुछ दिन के लिए होती थी। लेकिन पूरे महीने सैन्य अभियानों पर रोक नहीं लगायी जाती थी।

एलओसी पर नहीं बदलेंगे हालात

सेना के एक अन्य वरिष्ठ सेवानिवृत अधिकारी मेजर जनरल एनसी.बधानी ने कहा कि ऐसी स्थिति में सुरक्षाबल राज्य के अंदरूनी इलाकों में सैन्य अभियानों की तीव्रता में कुछ कमी कर देते हैं। लेकिन एलओसी पर फौज की आक्रामकता में कोई परिवर्तन नहीं आता है।

अगर पाकिस्तान की ओर से संघर्षविराम समझौते का उल्लंधन किया गया और भारतीय सेना की चौकियों को निशाना बनाया गया। तो सेना उसका मुंहतोड़ जवाब देगी। इसके अलावा अगर इस दौरान पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की घुसपैठ हुई।

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तो उसे रोकने के लिए भी फौज सख्त कार्रवाई करेगी। घाटी के अंदर मिलिट्री ऑपरेशन रोककर सरकार केवल आम नागरिकों के मन में सुरक्षाबलों के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदर्शित करना चाहती है। लेकिन अगर आतंकवादी सुरक्षाबलों की गडियों पर हमला करते हैं।

तो उसका जवाब दिया जाएगा। इस निर्णय से सेना के मनोबल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उसकी सतर्कता जस की तस बनी रहेगी। निर्णय का असर अमरनाथ यात्रा पर देखने को मिल सकता है।

सेना का तर्क

रक्षा मंत्रालय में तैनात सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, केंद्र ने इसे यूनीलेटरल सीजफायर का नाम दिया है। इससे पहले इतिहास में केवल एक बार 19 नवंबर 2000 से लेकर 31 मई 2001 के बीच में केंद्र द्वारा ‘नॉन इनिशिएसन ऑफ काम्बेट ऑपरेशन’ नामक प्रक्रिया अपनायी गई थी।

उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी। उसके बाद यह दूसरा मौका है। जब सरकार ने राज्य में सैन्य अभियान रोके हैं। बीते 9 मई को सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस बाबत गृह मंत्रालय से बातचीत की थी।

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उसके बाद मंत्रालय ने सेना से चर्चा की, जिसमें बल ने स्पष्ट किया था कि अगर कोई हम पर हमला करेगा। तो हम उसका सख्त लहजे में जवाब देंगे। रोक के दौरान सेना के सर्च एंड डिस्ट्रॉय और कॉर्डन एंड सर्च जैसे अभियान बंद रहेंगे।

लेकिन अगर कोई सैन्य वाहन, गाड़ियों के काफिले पर हमला करेगा या फिर सुरक्षाबलों के पास किसी जगह पर आतंकियों के छिपे होने की पुख्ता सूचना हुई, तो बेहिचक कार्रवाई की जाएगी।

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