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एक नहीं बल्कि कई अंतर है जल्लीकट्टू और कंबाला में

जल्लीकट्टू से बैन हटाने के बाद अब कंबाला से भी बैन हटाने की मांग की जा रही है।

एक नहीं बल्कि कई अंतर है जल्लीकट्टू और कंबाला में
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चेन्नई. जल्लीकट्टू को लेकर प्रदर्शन के बाद आखिरकार तमिलनाडु सरकार की ओर से जलीकट्टू को वैध घोषित कर दिया। दरअसल, जल्लीकट्टू से बैन हटाने के बाद अब कम्बाला से भी बैन हटाने की मांग की जा रही है।
दरअसल, कम्बाला कर्नाटक में होने वाला एक पारंपरिक खेल है। वैसे तो ये दोनों खेल देखने में एक तरह के दिखते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें जल्लीकट्टू और कम्बाला में फर्क मालूम नहीं है। अधिकांश लोग ये दोनों खेल को समान मानते हैं। लेकिन दोनों पारंपरिक खेल में अंतर है। बता दें कि कर्नाटक के एक कार्यकर्ता वातल नागराज का कहना है कि जल्लीकट्टू जानवरों के प्रति एक क्रूरता को दर्शाता है लेकिन कंबाला केवल एक खेल है जो कीचड़ में खेला जाता है।
ये है अंतर
कम्बाला: कम्बाला भैंसो की सालाना दौड़ होती है। यानी इसमें भैंसों की रेस लगाई जाती है। इसमें भैंस कीचड़ पर दौड़ता है। कंबाला में दो भैंसों को एक साथ बांध दिया जाता है फिर रेस लगाई जाती है। जो नवंबर से मार्च महिने के बीच होता है। कम्बाला हर राज्य में अलग-अलग समय पर आयोजित किया जाता है। बता दें कि इस खेल में विजेताओं को गोल्ड मेडल और ट्रॉफी से सम्मानित किया जाता है।
जल्लीकट्टू: जल्लीकट्टू नाम से तो सभी वाकिफ हैं। इस खेल में सांडो को शामिल किया जाता है। इस खेल में सांडों की दौड़ नहीं बल्कि सांडो को काबू में किया जाता है। हर साल जनवरी माह में पोंगल के खास मौके पर इस खेल का आयोजन होता है। इसमें बैल के सींग में सोने व चांदी के सिक्के बांध दिए जाते हैं। इस खेल में इन सिक्कों को बैल के सींगों से निकालना होता है। जो निकाल लिया उसे विजेता माना जाता है।
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