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रक्षा / इसरो ने भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पीएसएलवी सी-43 के जरिए लॉन्च किया, जानें इसके मायने

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) द्वारा बनाए गए ‘सबसे अधिक वजनी'' उपग्रह जीसैट-11 (GSAT-11) आज यानी बुधवार को फ्रेंच गुआना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से सफल प्रक्षेपण किया गया।

रक्षा / इसरो ने भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पीएसएलवी सी-43 के जरिए लॉन्च किया, जानें इसके मायने

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) द्वारा बनाए गए ‘सबसे अधिक वजनी' उपग्रह जीसैट-11 (GSAT-11) आज यानी बुधवार को फ्रेंच गुआना के एरियानेस्पेस के एरियाने-5 रॉकेट से सफल प्रक्षेपण किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो ISRO) के अनुसार इसका वजन करीब 5,854 किलोग्राम वजन का जीसैट-11 देशभर में ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाएगा, ISRO का GSAT-11 सैटेलाइट अब तक का ‘सबसे अधिक वजन' वाला उपग्रह है।

इसे भी पढ़ें: ISRO ने रचा इतिहास, सैटेलाइट GSAT-11 फ्रेंच गुयाना से हुई लॉन्च

इसरो (Indian Space Research Organisation - ISRO) ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित 9 देशों के 31 उपग्रहों को पोलर सेटेलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 (PSLV-C42) के जरिए लॉन्च कर दिया। इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सेटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था।

पीएसएलवी की 45वीं उड़ान है जिसमें एक माइक्रो और 29 नैनो सेटेलाइट शामिल हैं। पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल की इस साल में यह छठी उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सेटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका के 23 उपग्रह और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया, फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन के एक-एक उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया।

इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड के साथ करार किया गया है। कम लागत और बेहतरीन टेक्नोलॉजी की वजह से आज दुनिया के कई देश इसरों के साथ व्यावसायिक समझौता करना चाहते हैं। अब पूरी दुनिया में सेटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग तेजी से बढ़ हो रही है।

हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं हो सकती। ऐसे में यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं है। कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा।

हालिया प्रक्षेपित हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह को 44.4 मीटर लंबे और 230 टन वजनी पीएसएलवी सी-43 से रॉकेट से छोड़ा गया है। पृथ्वी की निगरानी के लिए इसरो ने हाइसइस को विशेष रूप से तैयार किया है। हाइसइस पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड व सतह का भी अध्ययन करेगा। एक विशेष चिप की मदद से तैयार किया गया ऑप्टिकल इमेजिंग डिटेक्टर ऐसे रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

हाइसइस की मदद से पृथ्वी धरती के चप्पे-चप्पे पर नजर रखना आसान हो जाएगा। अब धरती से 630 किमी दूर अंतरिक्ष से पृथ्वी पर मौजूद वस्तुओं के 55 विभिन्न रंगों की पहचान आसानी से की जा सकेगी। इस उपग्रह का उद्देश्य पृथ्वी की सतह के साथ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पैक्ट्रम में इंफ्रारेड और शॉर्ट वेव इंफ्रारेड फील्ड का अध्ययन करना है।

हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग या हाइस्पेक्स इमेजिंग की एक खूबी यह भी है कि यह डिजिटल इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी की शक्ति को जोड़ती है। हाइस्पेक्स इमेजिंग अंतरिक्ष से एक दृश्य के हर पिक्सल के स्पेक्ट्रम को पढ़ने के अलावा पृथ्वी पर वस्तुओं, सामग्री या प्रक्रियाओं की अलग पहचान भी करती है।

इससे पर्यावरण सर्वेक्षण, फसलों के लिए उपयोगी जमीन का आकलन, तेल और खनिज पदार्थों की खानों की खोज आसान होगी। ग्लोबल सेटेलाइट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अभी यह इंडस्ट्री 200 अरब ड़ालर से ज्यादा की है। इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है जबकि भारत की हिस्सेदारी अब लगातार बढ़ रही है।

सेटेलाइट ट्रांसपोंडर को लीज पर देने, भारतीय और विदेशी क्लाइंटस को रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट की सेवाओं को देने के बदले में हुई कमाई से इसरो का राजस्व लगातार बढ़ रहा है। एक साथ कई उपग्रहों के प्रक्षेपण के सफल होने से दुनिया भर में छोटी ससेटेलाइट लॉन्च कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को फायदा होगा।

असल में इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाता है जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं। बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सेटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरुरत पड़ती है।

अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनिया का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सेटेलाइट की लांचिंग भारत से करा रहे हैं। हम अंतरिक्ष विज्ञान, संचार तकनीक, परमाणु उर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहे हैं,

बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गए हैं। असल में इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है।

पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी कामयाबी हासिल कर चुका है। इसने दुनिया के विकसित देशों की नींद उड़ा दी है । अरबों डालर का मार्केट होने की वजह से भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग भी संभव है। ऐसे में भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। गरीबी दूर करने और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो मददगार साबित हो सकता है। कुल मिलाकर एक साथ कई उपग्रहों के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण से इसरो को बहुत व्यावसायिक फायदा होगा जो भविष्य में इसरो के लिए संभावनाओं के नए दरवाजें खोल देगी।

समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ-साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए रणनीति बनानी होगी। क्योंकि जैसे-जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा।

भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए प्रसिद्ध है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना होगा। मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान पर भी काम शुरू करना होगा।

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