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समलैंगिता अपराध तो सेरोगेसी और टेस्ट ट्यूब क्या प्रकृति के आदेश

सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत अपराध बताया गया है।

समलैंगिता अपराध तो सेरोगेसी और टेस्ट ट्यूब क्या प्रकृति के आदेश
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत अपराध मानने के फैसले को जहां सही ठहराने वालों की संख्या अच्छी खासी है। वहीं इसे अपने अधिकार का हनन मानने वालों की संख्या भी कम नहीं है। इसका समर्थन करने वाले लोगों ने कोर्ट के फैसले की आलोचना की। कास्मोस इंस्टीच्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज (सीआईएमबीएस) के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सुनील मित्तल ने बताया कि धारा 377 के साथ मुख्य समस्या इसे परिभाषित करने को लेकर हैं।
‘प्रकृति के अनुसार’ का समाज ने मोटे तौर पर एक पारंपरिक और पितृसत्तात्मक अर्थ समझ लिया है। डॉ. मित्तल के अनुसार चिंता का एक कारण यह है कि विषमलैंगिक जोड़ों के बीच ऑरेल और गुदा सेक्स को यह कानून अपराध ठहराता है। हालांकि इस तरह की एक घटना से यह स्थापित करना मुश्किल हो जाएगा कि तथाकथित प्रकृति के खिलाफ कहे जाने वाले सभी यौन संबंधों को ध्यान में रखते हुए हमारी सीमाएं क्या होनी चाहिए। एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि टेस्ट ट्यूब बच्चों और सरोगेट माताओं को क्या प्रकृति के आदेश के संदर्भ में देखा जा सकता है।
डॉ. मित्तल के अनुसार अनुसंधानों में समलैंगिक झुकाव और साइकोपैथोलॉजी के बीच कोई अंतर्निहित संबंध नहीं पाया गया है। व्यवधान के रूप में, समलैंगिक, गे और उभयलिंगी लोगों को चित्रित करने वाले स्टीरियोटाइप छवि के बावजूद, कई दशकों तक अनुसंधान और नैदानिक अनुभवों ने सभी चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य संगठनों के नेतृत्व में यह निष्कर्ष निकाला है कि ये झुकाव मानव अनुभव और संबंधों के सामान्य रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए भारत में समलैंगिकता कितनी पुरानी है।

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