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Exclusive Interview: सेनाप्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने पाकिस्तान को लेकर किए खुलासे

अब पाकिस्तान और उसके पाले हुए आतंकी भी पहले के मुकाबले काफी चौंकन्ने हो गए हैं। यह बातें यहां राजधानी में शुक्रवार को हरिभूमि को दिए विशेष साक्षात्कार में सेनाप्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कही।

बालाकोट के बाद दहशत में पाकिस्तान, भारत से आतंकियों को नहीं मिलेगा अभयदानसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे

बीते साल 14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले की घटना के बाद की गई बालाकोट एयरस्ट्राइक से पाकिस्तान को ऐसा करारा सबक मिला है कि अब वह इस बात को अच्छी तरह से समझने लगा है कि अगर भविष्य में उसने अपने पाले हुए आतंकवादियों की मदद से भारत को कोई जख्म देने की कोशिश की तो उसका अंजाम बहुत ही बुरा होगा। इस कार्रवाई से हमने दुश्मन के मन में कभी न मिटने वाली दहश्त बिठाने के अलावा एक ऐसा बड़ा और कड़ा संदेश दे दिया है कि एलओसी पार चल रहे पाक समर्थित आतंकी अड्डों, लांच पैड या ऐसा कोई भी ढांचा अब सीधे भारतीय सेना के निशाने पर आ गया है। अगर वहां से कोई नापाक कोशिश की गई तो सीमा पार तबाही का मंजर पाकिस्तान की कल्पना से परे होगा। यही कारण है कि अब पाकिस्तान और उसके पाले हुए आतंकी भी पहले के मुकाबले काफी चौंकन्ने हो गए हैं। यह बातें यहां राजधानी में शुक्रवार को हरिभूमि को दिए विशेष साक्षात्कार में सेनाप्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कही।

पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

प्रश्न- क्या बालाकोट एयरस्ट्राइक विफल हो गई, क्योंकि आतंकी अड्डे फिर से सक्रिय हो गए हैं?

उत्तर- नहीं, इस स्ट्राइक के बाद भारत ने काफी कुछ हासिल किया है। हमने पाकिस्तान के समर्थन में एलओसी पार चलने वाले आतंकी ठिकानों को तबाह किया है और उसे यह संदेश भी दिया है कि अब वहां चलने वाले आतंक के अड्डों, जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए प्रयोग किए जाने वाले आतंकी लांच पैड व आतंकवाद का पोषण करने वाले किसी भी ढांचे को भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। आतंकी इन्हें अपनी जन्नत मानना बंद दें। अगर इनमें से कहीं से भी भारत पर बुरी नजर डालने की कोशिश की गई तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। साथ ही यह तथ्य भी बिलकुल सही है कि बालाकोट एयरस्ट्राइक में तबाह हुए आतंकी अड्डों को पाक ने कुछ महीनों के बाद फिर से बना लिया है। युद्ध के समय पर भी ऐसा ही होता है, दुश्मन के जो ठिकाने हमारी कार्रवाई में नष्ट हो जाते हैं। कुछ वक्त बाद वह उन्हें पुन: बना लेता है।

प्रश्न- क्या पाकिस्तान की परमाणु युद्ध की धमकी गीदड़भभकी के समान है?

उत्तर- परमाणु हथियार दुश्मन के खिलाफ देश को एक अच्छा और मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। इनकी भूमिका को लेकर इतिहास में हालांकि पाकिस्तान की तरफ से कई बार भारत को परमाणु युद्ध छेड़ने की धमकियां दी जाती रही हैं। लेकिन हमने सर्जिकल स्ट्राइक और एयरस्ट्राइक जैसे दो मौकों पर एलओसी पार कर पाक समर्थित आतंकी ठिकानों को सैन्य कार्रवाई कर नेस्तनाबूद किया। लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तान की तरफ से परमाणु हथियारों का प्रयोग या ऐसी कोई बात अबतक सामने नहीं आई है।

प्रश्न- धारा-370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल हुई है?

उत्तर- बिलकुल, शांति आ रही है। बीते वर्ष 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटने के बाद से वहां पर आतंकी घटनाओं से लेकर पथराव की घटनाओं में कमी देखने को मिली है। कानून-व्यवस्था की हालत भी अच्छी हो रही है। यह इस बात का संकेत दे रहा है कि हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं।

प्रश्न- क्या आतंकी ठिकानों का फिर से बनना भारत के लिए बड़ी चुनौती है?

उत्तर- आतंकी ठिकानों का पाक ने फिर से निर्माण कर लिया है। लेकिन अब इनकी लोकेशन बदल गई है यानि पहले जहां थे अब वहां नहीं हैं। कई बार आतंकी कैंप एक झोपड़ी की तरह भी रखे जाते हैं, जिससे अपने दुश्मन को चकमा दिया जा सके। लेकिन सेना लगातार इंटेलीजेंस के अपने खुफिया सूत्रों के जरिए आतंकी ठिकानों, उनमें मौजूद आतंकवादियों की संख्या और उनके कैंपों के आसपास मौजूद गांव वालों की इन जगहों पर रहने वाली गतिविधियों के बारे में डिटेल में जानकारी लेते रहते हैं। इसी आधार पर हम अपना एक आकलन तैयार करते हैं कि एलओसी पार घुसपैठ के लिए कितने आतंकी और कैंप एक्टिव हैं। वर्तमान में एलओसी पार कुल 25 आतंकी लांच पैड एक्टिव हैं, जिनसे करीब 250 आतंकवादी जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करने की फिराक में घात लगाए बैठे हैं।

प्रश्न- भविष्य में चीन सीमा को अधिक तव्वजो देने के पीछे क्या कारण जिम्मेदार है?

उत्तर- भारत की उत्तरी और पूर्वी सीमा से लगे हुए दो पड़ोसी हैं। इसमें उत्तरी क्षेत्र इलाके के हिसाब से ज्यादा बड़ा है। भौगौलिक आधार पर इसके चुनौतीपूर्ण भूभाग पर हमने ज्यादा ध्यान दिया भी है। लेकिन यहां ऐसा प्रश्न यह नहीं है कि कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है और कौन नहीं। अगर हमें शांति चाहिए तो हर वक्त पूरी तरह से तैयार रहना चाहिए। ऐसा कतई नहीं है कि चीन सीमा की ओर हमने हाल ही में ध्यान देना शुरु किया है। हम पहले से उस इलाके को लेकर सक्रिय हैं, जिसमें कई प्रकार का इंफ्रास्ट्रक्चर भी हमने बनाया है। सेना सीमा पर तैनात है और हम अपनी इंच-इंच जमीन की रक्षा करना चाहते हैं। लेकिन साथ ही सीमाई विवादों को हल भी करना चाहते हैं। अभी तीन तरह से सेना सीमाओं पर निगरानी कर रही है। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्विलांस और रिजर्व शामिल है। अहम जगहों पर फौज की नियमित कड़ी गश्त होती है, कम महत्व के इलाकों में निगरानी उपकरणों की मदद से दुश्मन पर नजर बनाए रखते हैं और जरुरत पड़ने पर वहां फौज भेजी जाती है।

प्रश्न- बजट में हुई कटौती का सेना के आधुनिकीकरण पर प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर- सेना के आधुनिकीकरण का प्लान मौजूदा जरुरतों और भविष्य के खतरों और चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इसके बाद आवश्यकता के आधार पर सैन्य उपकरणों की खरीद को लेकर प्राथमिकता तय की जाती है। आज हम सेना का मौजूदा आधुनिकीकरण करते हुए साइबर, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, रोबोटिक्स और स्पेस वॉर जैसे भावी खतरों को लेकर भी विचार कर रहे हैं। अगर भारत को 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनना है और इस नजरिए से हम राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में देखें तो ब

तो बजट की कमी की बात तो रेल मंत्रालय भी कर सकता है और सड़क-परिवहन भी। लेकिन हमारी जरुरत तीनों सेनाओं में मौजूद संसाधनों के बेहतर तालमेल और सामंजस्य के साथ इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में आगे बढ़ना है। सीडीएस की नियुक्ति इस दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। केंद्र ने बीते तीन सालों में सेना की युद्धक क्षमता में काफी इजाफा किया है। ऑपरेशनल तैयारी पूरी है। अगर कोई जिम्मेदारी दी जाएगी तो हम उसे पूरा कर लेंगे।

प्रश्न- क्या गैर-जरुरी सैन्य समारोहों पर रोक लगनी चाहिए?

उत्तर- सेनाओं में कई प्रकार के सैन्य सम्मान समारोह जैसी गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। लेकिन अब तीनों सेनाओं में इस बात पर सहमति बन गई है कि सेनादिवस या गणतंत्र दिवस जैसे आयोजनों पर ही ऐसी गतिविधि का आयोजन किया जाना चाहिए। इसके अलावा सामान्य अवसरों पर ऐसे किसी समारोह को आयोजित किए जाने की जरुरत नहीं है। किसी के पदभार ग्रहण करने या दूसरे को सौंपने का कार्यक्रम भी सामान्य ही होना चाहिए। हमें और अधिक प्रोफेशनल नजरिए से सोचने की जरुरत है। अब ऐसा तो न हो कि फील्ड फायरिंग की किसी गतिविधि के लिए भी रेड-कारपेट सेरेमनी होनी चाहिए। इसी संदर्भ में कुछ दिन पहले सीडीएस जनरल रावत द्वारा की गई टिप्पणी बिलकुल उचित है।

प्रश्न- वर्तमान में क्या सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है?

उत्तर- मैं इस बात से बिलकुल सहमत नहीं हूं कि सेनाओं का राजनीतिकरण हो रहा है। इसे हम एक प्रकार की गलत धारणा का बन जाना कह सकते हैं। हम लोगों की और लोगों के लिए बनाई गई सेना हैं। आम लोगों की सुविधा के लिए किसी पुल का निर्माण करना या अन्य प्रकार से मदद पहुंचाना बिलकुल भी गलत नहीं है।

प्रश्न- क्या सेवानिवृत अधिकारियों और जवानों से संबंध खराब हो रहे हैं?

उत्तर- नहीं। हमारे सभी पूर्व अधिकारियों और जवानों से बहुत अच्छे संबंध हैं। जब मैं बीते 31 दिसंबर को नया सेनाप्रमुख बना तो मेरे पहले सीओ ने आकर मुझे बधाई दी। वह भी एक सेवानिवृत अधिकारी ही हैं। यह एक प्रकार का चेन ऑफ कमांड है जो ऊपर से नीचे तक बहुत अच्छा है। हमारी कोशिश है कि हम सेना में पदोन्न्ति, अधिकारियों की नियुक्ति, रैंक से जुड़े मामलों को दुरुस्त करें। लेकिन कुछ लोग हैं जो सेना के बारे में बाहर टिप्पणी कर रहे हैं। उनपर ध्यान दिए जाने की जरुरत नहीं है।

प्रश्न- सेना के पुर्नगठन को लेकर की जा रही कवायद किस स्तर पर पहुंची है?

उत्तर- सेना के पुर्नगठन को लेकर चार शोध हुए हैं। यह सभी सेनाओं की आपरेशनल क्षमता से जुड़े हुए हैं। इसमें दो की प्रगति बहुत अच्छी है। इसमें एक सेना मुख्यालय के पुर्नगठन से जुड़ा हुआ शोध अब सरकार यानि कैबिनेट की मंजूरी के इंतजार के स्तर पर है। उसके बाद इसकी प्रक्रिया शुरु हो जाएगी। दूसरा कार्य इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स बनाने का है। यह केवल कागजी कार्रवाई तक ही सीमित नहीं रहेगा। बल्कि इसे धरातल पर भी साकार करना होगा। आईबीजी के गठन से सेनाओं की युद्धक क्षमता में कई गुना का इजाफा होगा। लेकिन मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि आईबीजी को सरकारी मंजूरी मिलने के बाद जमीन पर आकार लेने में एक से डेढ़ साल का वक्त लगेगा। अरूणाचल-प्रदेश स्थित सेना की 17वीं कोर में हालिया हुए युद्धाभ्यास में हमने इसका अभ्यास किया है। लेकिन अभी उसकी व्यापक रिपोर्ट आना बाकी है। मेरे हिसाब से आईबीजी में संचार प्रक्रिया का सशक्त होना (टॉप टू बॉटम संवाद बढ़ेगा) एक बड़े बदलाव के रूप में सामने आएगा।

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