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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: कैसे हुई योग की शुरुआत, जानें 10 हजार साल पुराना इतिहास

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस यानि International Yoga Day हर साल 21 जून को पुरी दुनिया में मनाया जाता है। इसको लेकर इस बार भी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इस बार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में पीएम मोदी योग करेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस: कैसे हुई योग की शुरुआत, जानें 10 हजार साल पुराना इतिहास
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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस यानि International Yoga Day 2018 हर साल 21 जून को पुरी दुनिया में मनाया जाता है। इसको लेकर इस बार भी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इस बार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में पीएम मोदी योग करेंगे।

बता दें कि 21 जून साल का सबसे लम्बा दिन होता है। इस वजह से दुनिया के कई देशों में इस दिन का खास महत्व होता है। साल 2014 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने की पहल की थी। बता दें कि 193 सदस्य देशों में से 177 देशों ने भारत के इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। जिसके बाद यूएन ने इसकी घोषणा कर दी थी।

जानें योग का अर्थ

कहते हैं कि योग का अर्थ होता है परमात्मा में लीन। योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द युजष् से हुई थी। इसका अर्थ होता है जोड़ना। वैसे तो योग शब्द का अर्थ दो तरह से बताया गया है। पहला जोड़ और दूसरा समाधि। इसका अर्थ हुआ कि एक चीज को दूसरी चीज से जुड़ना।

जानें क्या है योग

अगर साफ शब्द में कहा जाए तो योग का अर्थ होता है शारीरिक व्यायाम करना। जहां लोग अपने को स्वस्थ रखने के लिए अपने शरीर को मोडते, मरोड़ते, खिंचते हैं और श्वास लेने के जटिल तरीके अपनाते हैं। जिससे आपका शरीर और मन दोनों की ठीक रहते हैं। यहीं नहीं ये आपकी पूरी दिनचर्या को भी अच्छा बनाकर रखता है। योग विज्ञान में जीवन शैली का पूर्ण सार आत्मसात किया गया है।

इतिहासकारों की माने तो ऐसा कहा जाता है कि जब से सभ्‍यता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग की उत्‍पत्ति हजारों साल पहले हुई थी। कहते हैं कि योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी के रूप में मना गया है। वहीं उन्हें पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है।

जानें योग का इतिहास

अगर योग के इतिहास की बाद करें तो ये 10 हजार साल पुराना इतिहास है। जो सदियों से चला आ रहा है। योग का इतिहास सबसे पुराने जीवन्त साहित्य ऋग्वेद में पाया जाता है। जो सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के दर्शन कराता है। तभी से योग किया जा रहा है और यहीं नहीं भारत को योगियों का देश भी कहा जाता है। विदेशों से लोग यहां योग का अभ्यास करने और सिखने आते हैं।

इतिहास की बात करें तो योग की पहचान सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के दौरान पशुपति मुहर (सिक्का) पर योग मुद्रा में विराजमान एक आकृति है। वह उस प्राचीन काल में योग की व्यापकता की पुष्टि करता है। जो बताता है कि योग की शुरूआत हो चुकी थी।

उसके बाद इसका इतिहास बढ़ता गया और बाद में योग का हिस्सा बनने वाले प्रथाओं-अभ्यास का सबसे पुराना उल्लेख, प्राचीनतम उपनिषद- बृहदअरण्यक में मिलता है। कहते हैं कि भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही योग का प्रारम्भ माना जाता है।

उसके बाद भगवान कृष्ण, महावीर और बुद्ध ने इसे अपनी तरह से आगे बढ़ाया। उन्होंने भी योग को अपने ठंग से बताया और इसके लाभ के बारे में जगरुक किया। कृष्ण का योग साधना है। एक ही जगह बैठ कर लीन हो जाना।

इसके पश्चात पतंजलि ने इसे एक नई पहचान दी। पतंजलि को योग के पिता के रूप में माना जाता है। इस रूप को ही आगे चलकर सिद्धपंथ, शैवपंथ, नाथपंथ वैष्णव और शाक्त पंथियों ने अपने-अपने तरीके से विस्तार दिया। बाबा रामदेव ने योग के बारे में लोगों को जगरुक किया।

बता दें कि इतिहास में योग का अपना ही एक महत्व है। योग धीरे-धीरे एक अवधारणा के रूप में उभरा है और भगवद गीता व महाभारत के शांतिपर्व में योग का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जहां 20 से भी अधिक उपनिषद और योग के बारे में बताया गया है। बता दें कि गुरुदेव ने भी योगसूत्र उपनिषद पर बहुत चर्चा की है।

ये है योग के प्रकार

1. 'ज्ञान योग' या दर्शनशास्त्र

2. 'भक्ति योग' या आनंदमय भक्ति का पथ

3. 'कर्म योग' या सुखमय कर्मों पथ

4. राजयोग, जिसे आगे आठ भागों में बांटा गया है। इसे अष्टांग योग भी कहते हैं।

योग क्यों है जरूरी

कहते हैं बुढ़े, महिला, पुरूष या युवा स्वस्थ (फिट) या कमजोर सभी के लिए योग का शारीरिक अभ्यास बहुत जरुरी है। जिससे सभी लोग स्वस्थ रहते हैं। बहुत से लोगों के लिए योग के बहुत से मायने हो सकते हैं। हमें योग के जरिये आपके जीवन की दिशा तय करने में मदद करने के लिए दृढ़ है।

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