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International Women''s Day Essay: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर निबंध, बदल जाएगी सोच

समाज बदलना चाहिए, सूरत बदलनी चाहिए, स्त्री-पुरुष को बराबर का दर्ज़ा होना चाहिए, हमारे घरों में रिश्तों पर पाबंदियां नहीं हैं, हमने तो अपनी पत्नी और बेटी को पूरी छूट दे रखी है। -अकसर कुछ पुरुषों को ऐसा कहते सुना जा सकता है। सवाल है, ‘ये छूट’ देने का अधिकार पुरुष समाज को किसने दे दिया?

International Women
समाज बदलना चाहिए, सूरत बदलनी चाहिए, स्त्री-पुरुष को बराबर का दर्ज़ा होना चाहिए, हमारे घरों में रिश्तों पर पाबंदियां नहीं हैं, हमने तो अपनी पत्नी और बेटी को पूरी छूट दे रखी है। -अकसर कुछ पुरुषों को ऐसा कहते सुना जा सकता है। सवाल है, ‘ये छूट’ देने का अधिकार पुरुष समाज को किसने दे दिया?
महिलाओं के प्रति कितना अलोकतांत्रिक हो जाता है यह पुरुषवादी समाज! तभी तो अपने अधिकारों की बात करने वाली या अन्याय और शोषण का विरोध करने वाली किसी शादी-शुदा महिला को बड़ी आसानी से तलाक का कारण ठहरा दिया जाता है।
सवाल है, आखिर हर टूटन के लिए स्त्री को ही जिम्मेदार क्यों ठहराया जाता है? कहां से आती होगी ऐसी सोच, जिसमें खुलकर सांस लेने को भी गुनाह करार कर दिया जाता है? कई बार पुरुषों की इस सोच में महिलाएं भी साथ देती हैं।
ये नजर और नजरिए का अद्भुत संगम है। जहां एक स्त्री ही, दूसरी स्त्री के सामने बाधक बन खड़ी हो जाती है। वास्तव में स्त्री के सोचने-समझने के ढंग का निर्माण, सही-गलत का निर्धारण, परिवार-समाज उसके जन्म से पहले ही कर देता है।

संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त

कड़वा सच यही है कि हमारा समाज और इसका ताना-बाना, इसकी जटिलताएं, लड़की के जन्म से पहले ही जकड़ने को बेताब हो जाती हैं। सामाजिक सत्ताएं, स्त्री के व्यक्तित्व का निर्धारण करती हैं। उन्हें किस बात पर हंसना है, किस बात पर रोना है और कब गुस्सा करना है, यह निर्धारित कर दिया जाता है।
इस जकड़न से लड़ने पर हम खुद ही लहू-लुहान हो जाते हैं। यही नहीं एक स्त्री को रची-बसी भूमिकाओं में धकेलने वाला समाज, उन भूमिकाओं की ओर बढ़ने या सहयोग देने वाले पुरुष का भी मजाक उड़ाता है। यानी अगर कोई पुरुष किसी महिला का सहयोग, सहायता या ध्यान रखे तो उसे भी उपेक्षित किया जाता है।

गर्व स्त्री होने का

कई बार तो ऐसा लगता है कि महिला दिवस और बेटी दिवस जैसे अवसर इस बात का अहसास कराते हैं कि इस समाज से अपना अधिकार मांगने के लिए हम विवश हैं। हम उनसे कमतर हैं, यह भी साबित होता है। पूरी दुनिया में जब हमारी आबादी आधी है, बराबर है तो हमें अधिकार कोई और क्यों देगा?
यह बाज की बात नहीं, सदियों से हमारा होना छीना जा रहा है, जिससे हम बेखबर हैं। इस खूबसूरत धरा पर विराजी बेटियां आसमान तो निहार रहीं पर पूरा नहीं| हमें अहसास भी नहीं होने दिया जाता है कि हमारी जिंदगी से हम ही मिसिंग हैं। आज की स्त्री एक ऐसी सुपर वूमेन है, जो घर से बाहर तक सब मुस्कुराते हुए संभालती है।
भले ही आधुनिक सोच रखती हो, पार्टियां करती हो पर अपनी खुशी से मंगलसूत्र, करवाचौथ और छठ व्रत रखना नहीं भूलती। ऐसी बहुआयामी स्त्री होने का हम गर्व क्यों न करें! हमें क्यों न मिले भरपूर उड़ान के लिए खुला आकाश!

महिलाएं भी बदलें अपनी सोच

समाज में हावी पुरुषवादी सोच के बावजूद कई बार स्वयं महिलाएं भी बगैर सोचे-समझे पुरुषवादी विरोध का झंडा उठा लेती हैं। परिवार-समाज में रिश्तों और संवेदनाओं की भी अपनी अहमियत होती है। जब कभी कोई पति अपनी पत्नी से कहे, ‘तुम ये सामान मत उठाओ, तुमसे नहीं होगा’ तो इसमें उसका प्यार भी होता है, अहंकार नहीं।
इसी तरह जब बेटा मां से कहे, ‘मां तुम ये सब काम मत किया करो,’ तो उसमें उसका वात्सल्य-लगाव नजर आता है, न कि वह आपको स्त्री होने की अनुभूति कराता है। कई स्त्री विमर्श की पैरोकार महिलाएं सशक्त बनने का दिखावा करने के लिए, विरोध के लिए पुरुष विरोध करने लगती हैं।
बात-बात पर पुरुषों के विरुद्ध मोर्चा निकालने के लिए तैयार हो जाती हैं। सवाल है क्या केवल पुरुषों का विरोध कर संतुलित या सभ्य समाज का निर्माण संभव है?
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