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International Women''s Day Speech : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सबसे बेहतरीन भाषण हिंदी में

भारतीय गणतंत्र अपने 69 साल पूरे करके 70वें साल में दाखिल हो चुका है। लेकिन क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि इन 70-71 सालों में आज तक सुप्रीम कोर्ट की एक भी मुख्य न्यायाधीश कोई महिला नहीं बनी? यह सवाल इसलिए खड़ा होता है और चिंता पैदा करता है क्योंकि सबसे ज्यादा जिस क्षेत्र को नारी सशक्तिकरण का श्रेय दिया जाता है, वह कोई और नहीं बल्कि न्यायपालिका का ही क्षेत्र है। न्यायपालिका नर-नारी समानता या लैंगिक न्याय के अकसर लंबे-लंबे आख्यान देती है, उदाहरण पेश करती है लेकिन खुद पलटकर शायद कभी पिछले सात दशकों के अपने ही इतिहास पर नजर नहीं डालती कि उसे पता चले कि आखिर संविधान लागू होने के 40 साल बाद जाकर क्यों सर्वोच्च न्यायालय को अपनी पहली न्यायाधीश (6 अक्टूबर 1989 को) फातिमा बीबी के रूप में मिलीं, जो सन 1992 में सेवानिवृत्त हो गईं।

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International Women's Day Speech : भारतीय गणतंत्र अपने 69 साल पूरे करके 70वें साल में दाखिल हो चुका है। लेकिन क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि इन 70-71 सालों में आज तक सुप्रीम कोर्ट की एक भी मुख्य न्यायाधीश कोई महिला नहीं बनी? यह सवाल इसलिए खड़ा होता है और चिंता पैदा करता है क्योंकि सबसे ज्यादा जिस क्षेत्र को नारी सशक्तिकरण का श्रेय दिया जाता है, वह कोई और नहीं बल्कि न्यायपालिका का ही क्षेत्र है। न्यायपालिका नर-नारी समानता या लैंगिक न्याय के अकसर लंबे-लंबे आख्यान देती है, उदाहरण पेश करती है लेकिन खुद पलटकर शायद कभी पिछले सात दशकों के अपने ही इतिहास पर नजर नहीं डालती कि उसे पता चले कि आखिर संविधान लागू होने के 40 साल बाद जाकर क्यों सर्वोच्च न्यायालय को अपनी पहली न्यायाधीश (6 अक्टूबर 1989 को) फातिमा बीबी के रूप में मिलीं, जो सन 1992 में सेवानिवृत्त हो गईं।

कब बनेगी कोई महिला सर्वोच्च न्यायलय की मुख्य न्यायधीश

सर्वोच्च न्यायालय में किसी महिला का मुख्य न्यायधीश न होने का सवाल इसलिए और भी चिंता पैदा करता है, क्योंकि जिस तरह की तथ्यात्मक स्थितियां वर्तमान में हैं, उसको देखते हुए साल 2022 तक भी कोई महिला मुख्य न्यायाधीश नहीं बन सकती।

चूंकि साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायमूर्ति धनंजय चंद्रचूड़ मुख्य न्यायाधीश बनेंगे, इनके बाद साल 2024 में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना। इसलिए तारीखों के आधार पर कहा जा सकता है कि 14 मई 2025 तक भी सुप्रीम कोर्ट में किसी महिला के मुख्य न्यायाधीश बनने की उम्मीदें नहीं हैं, बशर्तें कोई अनहोनी न हो जाए। इस तरह देश में संविधान लागू होने की पौन सदी गुजर जाएगी, तब भी देश को अपनी पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के पाने का इंतजार रहेगा।

उच्च न्यायलयों में भी बहुत कम है महिला न्यायाधीशों की संख्या

केवल देश की सर्वोच्च अदालत में ही महिला न्यायाधीशों की संख्या कम नहीं है, देश के 24 उच्च न्यायालयों में भी बहुत कम है। देश के 24 उच्च न्यायालयों में 1 अक्टूबर 2018 तक कुल 891 जज थे। इनमें सिर्फ 81 जज महिलाएं थीं यानी कुल जजों की महज 9 फीसदी और अगर उच्च न्यायालयों के कुल जजों की निर्धारित संख्या 1221 को देखें तो उस लिहाज से तो महिलाएं महज 6.6 फीसदी ही थीं। हालांकि देश के इतिहास में यह पहला मौका है, जब सुप्रीम कोर्ट में तीन-तीन महिला जज एक साथ हैं- न्यायमूर्ति आर. भानुमति जो अगले साल 19 जुलाई को रिटायर होंगी।

न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा जो 13 मार्च 2021 तक जज रहेंगी और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी 23 सितंबर 2022 तक देश की सर्वोच्च अदालत में न्यायमूर्ति का पद सुशोभित करेंगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान में 28 न्यायाधीशों (जिनमें चीफ जस्टिस भी शामिल हैं) की सूची में भी 3 महिला न्यायाधीशों की संख्या बहुत प्रभावशाली नहीं है।

जहां तक अब तक के सर्वोच्च न्यायालय की सभी 8 महिला न्यायाधीशों की बात करें तो यह संख्या भी महज 2.7 फीसदी के आस-पास है। कहने का मतलब यह कि आजादी के बाद से अभी तक भारत की न्यायपालिका में ऊंचे पदों पर 3 फीसदी महिलाएं भी नहीं पहुंचीं।

अभी तक जो महिला न्यायाधीश देश की सर्वोच्च अदालत की न्यायाधीश बनी हैं, उनमें क्रम से-फातिमा बीबी, सुजाता वी. मनोहर, रूमा पाल, ज्ञान सुधा मिश्रा, रंजना प्रकाश देसाई, आर. भानुमति, इंदू मल्होत्रा और इंदिरा बनर्जी हैं।

एक संयोग के चलते नहीं बन पाईं मुख्य न्यायाधीश

देश में एक साल पहले तक 17,000 जज थे, जिनमें 4,700 महिलाएं थीं। यहां निश्चित रूप से देखें तो यह एक अच्छा आंकड़ा दिखता है। लेकिन देश के मुख्य न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं की संख्या देखें तो पता चलता है कि जो महिलाएं न्यायपालिका में अपनी मौजूदगी भी दर्ज करा रही हैं, उनमें से भी ज्यादातर निचले स्तर पर ही भागीदारी पा सकी हैं।

सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि देश को सर्वोच्च न्यायालय की अपनी पहली मुख्य महिला न्यायाधीश इस सदी की शुरुआत के पहले ही मिल जाती, लेकिन संयोग की बात रूमा पाल देश की पहली मुख्य न्यायाधीश बनने से रह गईं।

वास्तव में 29 जनवरी सन 2000 को मुख्य न्यायाधीश ए.एस.आनंद द्वारा तीन नए न्यायमूर्तियों दुरैस्वामी राजू, रूमा पाल और वाई.के.सभरवाल को शपथ दिलाई जानी थी। अचानक शपथ ग्रहण की तारीख 29 की बजाय 28 जनवरी कर दी गई।

शायद स्वर्ण जयंती समारोह की वजह से। दुरैस्वामी राजू और वाई.के.सभरवाल को 28 जनवरी को सुबह शपथ दिलाई गई। दुरैस्वामी राजू और वाई.के.सभरवाल को समय रहते शपथ ग्रहण की तारीख में परिवर्तन की सूचना मिल गई परंतु रूमा पाल को नहीं मिली।

उसी दिन यह तय हो गया था कि अगर कोई अनहोनी नहीं हुई तो दुरैस्वामी राजू (जन्म 02-07-1939) एक जनवरी 2004 को रिटायर हो जाएंगे और उस दौरान पदासीन मुख्य न्यायाधीश आर.सी. लाहोटी के सेवानिवृत्त होने के बाद, एक नवंबर, 2005 को वाई.के.सभरवाल (जन्म 14-01-1942) भारत के नए मुख्य न्यायाधीश बनेंगे और 13-01-2007 तक इस पद पर रहेंगे।

इस बीच, रूमा पाल (जन्म 03-06-1941) 2 जून 2006 को, सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति के रूप में रिटायर हो जाएंगी। रूमा पाल को शपथ लेने में कुछ घंटों की देरी से देश के न्यायिक इतिहास की धारा ही उलट गई। लोग इसे ‘संयोग’ कह सकते हैं।

लेकिन आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इन 69 सालों में भारत के कानून मंत्री (भीमराव रामजी आंबेडकर से लेकर रविशंकर प्रसाद तक) और राष्ट्रीय विधि आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पदों पर भी हमेशा पुरुषों का ही कब्जा रहा है।

भारत के अटॉर्नी जनरल और सोलिसिटर जनरल का पद भी मानों पुरुषों के लिए ही आरक्षित रहा है। हां, कुछ समय पहले, इंदिरा जयसिंह को अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल बनाकर, महिला सशक्तिकरण की जय-जयकार अवश्य की गई थी। मतलब यह कि सभी महत्वपूर्ण निर्णय-स्थलों पर पुरुषों का वर्चस्व बना रहा है।

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