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International women''s Day 2019 Essay : महिला दिवस पर निबंध की यहां से करें तैयारी

किसी के लिए भी बड़े बदलाव और कामयाबी का सफर आसान नहीं होता, जद्दोजहद से भरा होता है। लेकिन जब बात महिलाओं की हो, तो मंजिल तक पहुंचना, बदलाव के प्रयास करना और ज्यादा मुश्किल हो जाता है। दरअसल, उनकी राह में परंपरागत सोच, समाज का संकीर्ण नजरिया आड़े आता है। लेकिन मन में ठान लिया जाए, तो कुछ भी मुश्किल नहीं। अगर महिला दिवस 2019 के मौके पर आपको भी निबंध लिखना है तो यहां से बेहतरीन तरीके से तैयारी कर सकते हैं।

International women
किसी के लिए भी बड़े बदलाव और कामयाबी का सफर आसान नहीं होता, जद्दोजहद से भरा होता है। लेकिन जब बात महिलाओं की हो, तो मंजिल तक पहुंचना, बदलाव के प्रयास करना और ज्यादा मुश्किल हो जाता है।
दरअसल, उनकी राह में परंपरागत सोच, समाज का संकीर्ण नजरिया आड़े आता है। लेकिन मन में ठान लिया जाए, तो कुछ भी मुश्किल नहीं। हमारे देश में भी साल-दर-साल महिलाएं कामयाबी के नए कीर्तिमान बना रही हैं।
सफलता के शिखर को छूने वाली महिलाएं बदलाव के नए दौर की वाहक बन रही हैं। साधारण परिवारों की ये महिलाएं असाधारण उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। बिना सहूलियतों के संघर्ष कर अपनी राह बना रही हैं, साथ ही दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन रही हैं। इस साल भी कई महिलाओं ने ऐसी मिसालें कायम की हैं, जो आधी आबादी को सशक्त बनाती हैं।

रच रही हैं इतिहास

मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो ना संसाधनों की कमी खलती है और ना ही रुकावटें आड़े आती हैं। जरूरत सिर्फ अपने आत्मबल को पहचानने की है, अपने आसमान की ओर कदम बढ़ाने की है, जिससे हिम्मत के पंख फैलाकर उड़ान भरी जा सके।
हाल ही में भारतीय वायु सेना की फ्लाइंग ऑफिसर अवनी चतुर्वेदी ने ऐसा ही कर दिखाया है। एक सामान्य मध्य वर्गीय परिवार से संबंध रखने वाली इस बेटी ने मिग-21 फाइटर प्लेन उड़ाकर इतिहास रचा है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर निबंध, बदल जाएगी सोच

वह फाइटर प्लेन को अकेले उड़ाने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। सचमुच यह अपनी भीतरी शक्ति को पहचानने की बदौलत ही तो संभव है कि एक साधारण लड़की अनगिनत चुनौतियों को पार करके फाइटर पायलट बन गगन छुए।
इंजीनियर पिता और होममेकर मां की बेटी अवनी की पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सामान्य थी। लेकिन उसने अपनी ट्रेनिंग से लेकर कार्यक्षेत्र चुनने तक, खुद निर्णय लिए और आगे बढ़ने की हिम्मत की। आज अवनी चतुर्वेदी, युवतियों के लिए एक मिसाल बन गई हैं।

दूसरों के लिए प्रेरणा

पिछले दिनों विश्व कप जिमनास्टिक्स प्रतियोगिता में अरुणा बी. रेड्डी व्यक्तिगत पदक जीतने वाली पहली भारतीय जिमनास्ट बनीं। अरुणा इतनी साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आती हैं कि जिमनास्ट बनने के सपने को पूरा करने के लिए उनके पिता ने अपना घर तक बेच दिया था।
कुछ ही साल पहले अपने पिता को खो देने वालीं अरुणा बहुत हिम्मत बटोरते हुए यहां तक पहुंची हैं। व्यक्तिगत जीवन में इतना बड़ा धक्का सहने के बावजूद अपने आत्मबल के सहारे उन्होंने जिमानस्टिक में कामयाबी पाई और देश का नाम रोशन किया।
अरुणा की यह कामयाबी व्यक्तिगत नहीं है, इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी। उन्हें देखकर दूसरी महिलाएं, लड़कियां भी तयशुदा धारणाओं को तोड़ समानता, सम्मान और अपनी राह आप चुनने का फैसला करेंगी।
हाल ही में जिमनास्ट दीपा करमाकर ने भी कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले आए अरुणा के पदक से जिमनास्टिक्स टीम का हौसला बढ़ेगा। यकीनन खेल हों या दूसरे क्षेत्र महिलाओं का यही जज्बा हर साल, हर कदम उन्हें और सशक्त बना रहा है, सफल होने में मदद कर रहा है।

गैर पारंपरिक क्षेत्रों में बढ़ते कदम

हर दिन देश के कोने-कोने से अनगिनत खबरें आती हैं, जो आधी आबादी के सशक्त होने की कहानी बयां करती हैं। बदलते भारत में सशक्त महिलाओं की झलक बीते गणतंत्र दिवस के मौके पर भी दिखी। गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार बाइक पर हैरतअंगेज करतब दिखाने के लिए बीएसएफ के महिला दस्ते को शामिल किया गया।
वहीं जयपुर का गांधी नगर रेलवे स्टेशन देश का पहला ऐसा गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशन बन गया है, जिसे पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित किया जा रहा है। टिकट बेचने से लेकर टिकट की चेकिंग तक सभी कार्य यहां महिलाओं द्वारा ही किए जाते हैं।
यह बहुत ही सुखद है कि आज महिला विजेता बनकर हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। इससे उनके व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक परिवेश दोनों में ही सकारात्मक बदलाव दिख रहा है।

समाज के लिए सार्थक भूमिका

स्त्री मन का विशेष भाव है, दूसरों के लिए पहले सोचना। तभी तो दूर-दराज के गांवों से लेकर महानगरों तक, आम परिवारों की महिलाएं खुद की ही नहीं औरों की जिंदगी में भी सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयासरत हैं।
ऐसे लोगों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने समाज के लिए सार्थक भूमिका निभाई है। हाल ही में जिन महिलाओं को पद्म पुरस्कार मिले हैं, उनमें कई नाम ऐसे हैं, जो बिना संसाधनों के भी समाज की पीड़ा बांटने की कोशिश कर रही हैं।
पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाके से आने वालीं गरीब महिला सुभाषिणी मिस्त्री को इस साल यह पुरस्कार गरीबों के लिए अस्पताल बनाने के लिए मिला। सुभाषिणी ने यह अस्पताल, 20 साल तक घरेलू सहायिका और दिहाड़ी मजदूर के तौर पर मेहनत करके जुटाए पैसों से बनवाया।
सोचिए तो कितना आत्मबल चाहिए खुद जूझते हुए यूं दूसरों का जीवन सरल बनाने के कार्य में जुटने के लिए। हमारे देश में जहां अस्पतालों की कमी है, वहीं मातृत्व और प्रसव से जुड़ीं सुविधाएं भी दूर-दराज के गांवों तक नहीं पहुंच पाई हैं।
ऐसे में कोई महिला बिना चिकित्सा सुविधाओं के प्रसव से जुड़ी परेशानियों में महिलाओं की मददगार बन सके तो यह वाकई सम्मानीय भी है और सराहनीय भी। सुलगत्ती नरसम्मा ऐसा ही एक नाम है।
90 वर्ष से ज्यादा उम्र की इस कृषि मजदूर सुलगत्ती नरसम्मा को बिना किसी मेडिकल सुविधा के कर्नाटक के पिछड़े क्षेत्रों में प्रसव सहायिका के तौर पर सेवाएं देने के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। वे पिछले 70 वर्षों से मजदूर महिलाओं का प्रसव करा रही हैं।
यह कितना सुखद है कि जिन हालातों में अपने ही जीवन से हारने की सोच घेर लेती है, इन महिलाओं ने औरों के लिए सोचने और जीने की ठानी। ऐसे मानवीय भाव ना केवल दूर-दराज के इलाकों की समस्याओं की ओर ध्यान खींचने वाले हैं बल्कि दूसरे लोगों को भी प्रेरित करने वाले हैं।
इन सभी महिलाओं का दृढ़ संकल्प, धारा से विपरीत कुछ करने का प्रयास सभी के लिए प्रेरणादायी है। इससे न सिर्फ इनका जीवन बदला है, आधी आबादी को सशक्त बनने की राह भी मिली है।

अंतरिक्ष में भी मिला बराबरी का हक

बराबरी का हक पाने की लड़ाई भारत ही नहीं दुनिया भर की महिलाएं लड़ रही हैं। अपनी ख्वाहिशों के आसमान में ऊंची उड़ान भरने का हौसला जुटाने की जद्दोजहद दुनिया के हर कोने में बसी स्त्री के हिस्से आई है। इस संघर्ष में आधी आबादी ने धरती पर ही नहीं अंतरिक्ष तक में जगह बनाने के लिए अपनी काबिलियत साबित की है।
गौरतलब है कि करीब आधी सदी पहले नासा ने महिलाओं को अंतरिक्ष में भेजने से इंकार कर दिया था। लेकिन अब अमेरिका की इस स्पेस एजेंसी ने कहा है कि इक्कीसवीं सदी में चांद पर पैर रखने वाली अंतरिक्ष यात्री कोई महिला ही होगी। यह वैश्विक स्तर पर जेंडर गैप मिटाने और महिलाओं की क्षमता को कम आंकने की सोच पर लगाम लगाने के लिए एक सराहनीय प्रयास है।
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