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International Women''s Day: ''पहले औरत के पंखों को काट दिया जाता है, फिर इल्जाम लगाते हैं कि उसे उड़ना नहीं आता''

आज हमारे मस्तिष्क में स्त्री की छवि, दूसरों पर निर्भर एक अबला की बनी हुई है।

International Womens Day: पहले औरत के पंखों को काट दिया जाता है, फिर इल्जाम लगाते हैं कि उसे उड़ना नहीं आता
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इस दुनिया की पहली नारीवादी चिंतक सिमोन द बोउआर ने कहा था, ‘पहले औरत के पंखों को काट दिया जाता है और फिर उस पर इल्जाम लगाया जाता है कि उसे उड़ना नहीं आता।’ आज भी यह कथन उतना ही सत्य है, जितना पिछली सदी के मध्य में था। आज भी हमारे मस्तिष्क में स्त्री की छवि, दूसरों पर निर्भर एक अबला की बनी हुई है।

मां के रूप में भले ही समाज में उसको पूजा जाता हो, लेकिन एक स्त्री के रूप में अधिकांशत: उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, यह हमारे समाज की भयावह सच्चाई है। यही कारण है कि सिमोन का नारीवादी चिंतन आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

आज भी महिलाएं लैंगिक असमानता के चलते उपेक्षित हो रही हैं। जब तक समाज की यह मानसिकता नहीं बदलेगी, महिलाओं से जुड़ी तमाम समस्याएं दूर नहीं होंगी, आधी आबादी का जीवन नहीं बदलेगा, उनकी तरक्की की राहें नहीं खुलेंगी।

क्या है लैंगिक असमानता

लैंगिक असमानता का मतलब है, लिंग के आधार पर भेदभाव। हमारे समाज में सदियों से महिलाओं को कमजोर वर्ग माना जाता रहा है। उन्हें घर में रहने और चूल्हे-चौके तक सीमित करने के पीछे इसी सोच की भूमिका रही है। जबकि हमारे कृषि प्रधान देश में फसल उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कम नहीं रहती है। फिर भी उनके योगदान को हमेशा कम करके आंका जाता है।

घर-परिवार में भी महिलाओं की आर्थिक और समाजिक भागीदारी नाममात्र की होती है। ज्यादातर मामलों में उनकी राय जानना भी जरूरी नहीं समझा जाता, परिवार से जुड़े सभी अहम फैसले पुरुष सदस्य ही लेते हैं। परिवार में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव करना भी आम बात है। शहर में भले ही स्थितियां कुछ बेहतर हों, लेकिन गांवों-कस्बों में तो स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

बेटियों से, महिलाओं से घर के सारे काम-काज कराए जाते हैं, उन पर ढेरों पाबंदियां भी लगाई जाती हैं। वहीं बेटों को, पुरुषों को पूरी छूट और आजादी दी जाती है। इसके अलावा बेटियों की पढ़ाई-लिखाई पर ज्यादा पैसे खर्च करना भी घाटे का सौदा माना जाता है, क्योंकि उन्हें पराया धन समझा जाता है।

कुछ माता-पिता अपनी बेटियों की शिक्षा पर खर्च करते भी हैं, लेकिन जब बेटियां नौकरी करती हैं, तो योग्य पढ़े-लिखे होने के बावजूद उन्हें अक्सर कम कौशल वाली नौकरियां दी जाती हैं। इस तरह आधी आबादी के लिए सामाजिक और आर्थिक तरक्की के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। ये सारी गतिविधियां लैंगिक असमानता की मानसिकता से ही जन्मती हैं।

पुरुषवादी सोच है जिम्मेदार

लैंगिक असमानता की इस मानसिकता की सबसे बड़ी वजह है, हमारे समाज का पुरुष प्रधान होना। प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे कहती हैं, ‘पुरुष प्रधान व्यवस्था एक ऐसी सामाजिक संरचना है, जिसमें पुरुष, स्त्री पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है, शोषण करता है।’ वास्तव में यह व्यवस्था एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती रहती है।

जिस कारण आधी आबादी की आगे बढ़ने की राह बाधित होती है। वे विकास में भागीदार बनने और निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रहती हैं। इसी व्यवस्था के चलते शिक्षा और अपनी कार्य क्षमता को बढ़ाने के लिए मौजूद प्रशिक्षणों से दूर रहती हैं। जो महिलाएं शिक्षित हो भी जाती हैं, उन्हें भी समाज-परिवार नौकरी के बजाय घर संभालने की सलाह देता है। इसी के साथ समाज में बाल विवाह जैसी तमाम कुरीतियां और प्रथाएं भी पुरुषवादी मानसिकता से उपजी हैं।

बदलाव के लिए जरूरी कदम

कहने की जरूरत नहीं है कि पुरुषवादी सोच से मुक्त होकर लैंगिक समानता की तरफ बढ़ा जा सकता है। इसके साथ ही कुछ प्रयास इस दिशा में कारगर भूमिका निभा सकते हैं। लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए, महिलाओं के जीवन को बदलने के लिए शिक्षा ही सबसे कारगर उपाय है, इस बात को सरकारें भी समझती हैं। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारें बेटियों की शिक्षा और उनके विकास के लिए अनेक योजनाएं बनाती रही हैं।

साथ ही शिक्षा के द्वारा महिलाओं को राजनैतिक रूप से चेतनाशील और जागरूक बनाने की दिशा में भी सरकारें प्रयासरत हैं। इसी का परिणाम है कि पंचायती राज में पहले के मुकाबले महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। हालांकि ऐसे ज्यादातर मामलों में महिला सरपंच नाम भर की होती हैं, काम महिला सरपंच के पति के द्वारा ही संचालित होता है। लेकिन ऐसी महिला सरपंच भी हैं, जो बदलाव के लिए प्रतिबद्ध हैं, अपनी भूमिका का निर्वाह बखूबी कर रही हैं।

शिक्षा के बाद आर्थिक रूप से निर्भरता भी महिलाओं के लिए बहुत मायने रखता है। आर्थिक आत्मनिर्भरता, लैंगिक असमानता को दूर करने में बहुत ही कारगर भूमिका निभाती है। इसके लिए जरूरी है कि महिलाओं को कार्यक्षेत्र में समान अवसर मिलें, साथ ही समान काम के लिए समान वेतन की व्यवस्था को भी सुनिश्चित किया जाए। यानी, शिक्षा और आर्थिक निर्भरता लैंगिक असामनता को दूर करने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में इस दिशा में और गंभीरता से प्रयास करने और मौजूद खामियों को दूर करने की जरूरत है।

बदलें अपना नजरिया

यहां एक बात आधी आबादी को स्वयं भी समझनी होगी कि सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के लिए किए जाने वाले प्रयास तब तक सफल नहीं होंगे, जब तक महिलाएं अपने नजरिए में बदलाव नहीं लाएंगी। सबसे पहले खुद के जीवन को अहमियत दें, किसी से खुद को कम न समझें। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और सचेत बनें, अपने खिलाफ होने वाले अत्याचारों का विरोध करें, तभी लैंगिक समानता की समस्या दूर हो सकती है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर का कहना था, ‘मैं किसी समुदाय के विकास का आकलन उस समुदाय की स्त्रियों के विकास से करूंगा।’ यही सत्य भी है कि किसी देश, समाज के विकास का आकलन, आधी आबादी के बिना अधूरा है। ऐसे में आधी आबादी अपनी अहमियत को समझे और निरंतर बदलाव के लिए, अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए स्वयं प्रयासरत रहे, तभी किसी भी स्तर की असमानता की मानसिकता से मुक्त विकासोन्मुख समाज का निर्माण संभव है।

समानता के लिए पहल

यह सच है कि महिलाएं हर क्षेत्र में बेहतर काम कर अपनी कार्यकुशलता प्रमाणित कर रही हैं। तरक्की के पथ पर लगातार आगे बढ़ रही हैं, इसके बावजूद समानता की बात अभी दूर की कौड़ी लगती है। इस बात को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2017 से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारे समाज में लैंगिक असमानता को खत्म करने में अभी 200 साल से भी ज्यादा का वक्त लगेगा।

इसका मतलब है कि लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए हमारे प्रयास की रफ्तार बहुत धीमी है और मंजिल तक पहुंचने के लिए अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। हालांकि अपने देश में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी इस समस्या को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यही कारण है कि इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम ‘टाइम इज नाउ : रूरल एंड अर्बन एक्टिविस्ट ट्रांसफॉर्मिंग वूमेंस लाइफ’ रखी गई है। यूएन की वेबसाइट पर महिला दिवस को ध्यान में रखते हुए संदेश लिखा गया है, ‘अब हम और संतुष्ट नहीं रह सकते हैं।

आज बराबरी का ध्येय हासिल करना सबसे महत्वपूर्ण है।’ इस तरह कुछ समय से इंटरनेट पर भी ‘प्रेसफॉरप्रोग्रेस’ कैंपेन चल रहा है, इसका उद्देश्य भी वैश्विक स्तर पर लैंगिक असमानता को दूर करने लिए निरंतर प्रयास करना है।

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