Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

International Women Day: जानिए महिला सशक्तिकरण में महिला आयोग की भूमिका

अब राज्यों में राज्य महिला आयोगों की भूमिका बहुत महत्ती हो चुकी है। राज्य महिला आयोग ना सिर्फ महिला अपराधों के खिलाफ सक्रिय हैं, उन दिशाओं में भी प्रयासरत हैं, जो महिला विकास के लिए जरूरी हैं, उन्हें सशक्तिकरण की राह पर लाती हैं

International Women Day: जानिए महिला सशक्तिकरण में महिला आयोग की भूमिका
X

अब राज्यों में राज्य महिला आयोगों की भूमिका बहुत महत्ती हो चुकी है। राज्य महिला आयोग ना सिर्फ महिला अपराधों के खिलाफ सक्रिय हैं, उन दिशाओं में भी प्रयासरत हैं, जो महिला विकास के लिए जरूरी हैं, उन्हें सशक्तिकरण की राह पर लाती हैं।

इस बात के मद्देनजर महिला दिवस के अवसर पर सहेली ने दिल्ली, हरियाणा और छत्तीसगढ़ की महिला आयोग की अध्यक्षों के सामने कुछ सवाल रखे कि जब आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं ।

तो इन सकारात्मक परिवर्तनों के बावजूद भी आधी आबादी के आगे बढ़ने के मार्ग में बाधाएं क्यों हैं? ये बाधाएं कैसे दूर हों? सरकार, स्वयंसेवी संस्थाएं, इसमें क्या भूमिका निभा सकती हैं? महिलाएं स्वयं कैसे अपने मार्ग से ये बाधाएं दूर करें?

ये भी पढ़ेः International Women Day: 8 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है महिला दिवस, जानें इसके पीछे का इतिहास

महिला सशक्तिकरण में राज्य महिला आयोग कैसे अधिक से अधिक कारगर भूमिका निभा सकता है? इन सभी सवालों पर तीनों महिला आयोग की अध्यक्षों ने खुलकर जवाब दिए। ये जवाब हर महिला के लिए बहुत मायने रखते हैं।

सबसे बड़ी बाधा है असुरक्षा

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा कि महिला दिवस पर जब हम किसी महिला विशेष की सफलता की कहानी सुनते या पढ़ते हैं, तो बहुत अच्छा लगता है। इससे दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

लेकिन इतने सकारात्मक परिवर्तन के बावजूद आज भी आधी आबादी के सामने कई ऐसी विकट समस्याएं हैं, जो उनके आगे बढ़ने की राह में बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा है, असुरक्षा। आज आधी आबादी स्वयं को बहुत असुरक्षित महसूस करती है।
राजधानी दिल्ली में जब एक आठ माह की बच्ची के साथ रेप होता है और कोई प्रभावकारी प्रतिक्रिया समाज में नहीं होती है, सिस्टम में सन्नाटा पसरा रहता है, तो समझ में नहीं आता है कि कैसे हमारी बेटियां आगे बढ़ेंगी, कैसे पढ़ेंगी?

अगर हम आधी आबादी को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं, तो सबसे पहले उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। इस समस्या का हल हमें हर स्तर पर निकालना होगा।
लेकिन शुरुआत सिस्टम से करनी होगी। आज बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वाले लोगों में कानून का, पुलिस का कोई डर ही नहीं है। दिल्ली पुलिस का ही आकड़ा है, 2012-2014 के दौरान बच्चों और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के 31,446 मामले सामने आए।
लेकिन इनमें से 150 से भी कम मामलों में अपराधियों को सजा मिली। अब आप सोचिए, जब इतने कम मामलों में सजा मिलेगी, तो अपराध करने वालों के मन में कानून का डर कैसे पैदा होगा? ऐसे में जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा मामलों में अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए, छह महीने के अंदर केस का निपटारा होना चाहिए।
साथ ही छोटी बच्चियों के साथ होने वाले बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा होनी चाहिए। इससे अपराधियों को कड़ा संदेश जाएगा, मन में कानून का डर पैदा होगा। मैं आठ माह की बच्ची के साथ हुई रेप की घटना को लेकर काफी दिनों से सत्याग्रह कर रही हूं।
कई लोग हमसे जुड़े हैं। करीबन एक लाख से ज्यादा लोगों ने प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा है, जिसमें मांग की गई है कि छोटी बच्चियों से रेप करने वाले लोगों को छह महीने के अंदर फांसी की सजा दी जाए। यह तो रही सिस्टम के लेवल की बात।
लेकिन पारिवारिक, सामाजिक स्तर पर भी बदलाव की बहुत जरूरत है। महिलाओं को दोयम समझने वाली मानसिकता को दूर करना होगा। यौन हिंसा को लेकर हमारे समाज में जो चुप्पी रहती है, उसे तोड़ने के लिए प्रयास करने होंगे।
स्कूल में भी बच्चों को जागरूक करना होगा। हम भी एक कैंपेन ‘रेप रोको’ के जरिए ऐसी ही कोशिश कर रहे हैं। इस मुहिम के तहत पिछले दिनों दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में चार लड़कियां ‘रेप रोको’ की तख्ती लिए खड़ी हुईं।
अचानक कुछ लड़के वहां आकर उनसे कहने लगे कि लड़कियां छोटे-छोटे कपड़े पहनती हैं, तो उनके साथ ऐसा ही होगा। उन लड़कों की यह बात सुनकर आस-पास मौजूद महिलाओं ने, लड़कियों ने, पुरुषों ने अपनी-अपनी बात रखी और उन लड़कों को चुप कराया।
इस तरह के प्रयास से महिलाओं से जुड़ी समस्याओं पर बात सबके सामने रखी जानी चाहिए। घर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक ऐसे प्रयासों की जरूरत है, जिससे महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आए।
लेकिन यह सभी प्रयास तब तक अंजाम तक नहीं पहुंचेंगे, जब तक महिलाएं स्वयं के लिए आवाज नहीं उठाएंगी। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में एक घटना हुई, जहां एक लड़की को एक व्यक्ति परेशान कर रहा था।
ऐसे में लड़की ने मुंहतोड़ जवाब दिया, इस तरह की घटनाओं से हर लड़की को, महिला को प्रेरणा लेनी चाहिए। यह बहुत बड़ा सच है कि जब तक हम अपने लिए नहीं सोचेंगे, आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक दूसरे लोग भी हमारे जीवन को नहीं बदल पाएंगे, उनके प्रयास भी हमारे काम नहीं आ पाएंगे।
आधी आबादी को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। इस संघर्ष में दिल्ली महिला आयोग पूरा सहयोग महिलाओं को दे रहा है। कई लोग ऐसा सोचते हैं कि महिला आयोग बहुत अधिकार संपन्न नहीं है।
मैं भी जब अध्यक्ष बनी थी, तो कहा जाता था कि महिला आयोग शक्तिविहीन होता है। लेकिन जब मैंने महिला आयोग के अधिकारों को जाना, कानून को पढ़ा, तो लगा कि हम बहुत कुछ बदल सकते हैं, महिलाओं के जीवन को बेहतर बना सकते हैं।
तब से दिल्ली महिला आयोग, महिलाओं की बेहतरी के लिए हर तरह से प्रयासरत है। इसके अलावा मेरा मानना है कि नीति निर्धारण में भी अगर महिलाओं की भूमिका बढ़ेगी, तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार होगा, उनके हित में कानून बनेंगे। जब हम महिलाओं से जुड़ी हर समस्या को दूर करेंगे, तभी वह आत्मविश्वास के साथ सफलता की राह पर आगे बढ़ पाएंगी।

दूर करना होगा लैंगिक भेदभाव

हर्षिता पांडे, अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग ने कहा कि महिला दिवस (8 मार्च), आधी आबादी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन हम महिलाओं ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, उनसे प्रेरणा लेते हैं। साथ ही आधी आबादी के जीवन से जुड़ी समस्याओं पर विचार करते हैं।

विचार करने पर हम पाते हैं कि अब भी आधी आबादी का जीवन मुश्किलों से भरा हुआ है, उनकी आगे बढ़ने की राह में कई बाधाएं हैं। सबसे पहली बाधा जेंडर डिस्क्रिमिनेशन यानी लैंगिक भेदभाव की है। इस समस्या को दूर करने की जरूरत है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि योग्यता का आधार महिला या पुरुष नहीं होता है।

महिलाएं भी, पुरुषों के समान ही योग्य और सक्षम हैं। केवल महिला होने की वजह से हमारे साथ भेदभाव हो, तो यह गलत बात है। लेकिन ऐसा होता है, महिलाओं को कमतर आंका जाता है। छोटी-छोटी बातों में यह देखने को मिलता है। जैसे लोग किसी लड़के के रोने पर कहते हैं, क्या लड़कियों की तरह रोते हो।

ये भी पढ़ेः श्रीलंका: हिंसा के बाद आपातकाल, फेसबुक समेत सभी सोशल मीडिया साइट्स पर पाबंदी

इस तरह पुरुषों से कहा जाता है क्या हाथों में चूड़ियां पहन रखी हैं? इस तरह की बातों से महिलाओं को कमतर साबित किया जाता है। सबसे पहले इस तरह की सोच को बदलना होगा कि महिलाएं, पुरुषों से कमजोर होती हैं। इस भेदभाव को दूर करने की राह परिवार और समाज से होकर ही निकलेगी। इसमें मांएं सबसे अहम भूमिका निभा सकती हैं।

वे बेटों को समझाएं कि बहन भी उनके ही बराबर है। पिता भी इस प्रयास में सहयोग करें। जब बेटा-बेटी को लेकर भेदभाव घर-परिवार में खत्म होगा, तो समाज में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान मिलेगा। तभी हमारी बेटियां आगे बढ़ पाएंगी, हर क्षेत्र में स्वयं की योग्यता को साबित कर पाएंगी। दूसरी बाधा असुरक्षा की है।

आए दिन हम बलात्कार की घटनाओं के बारे में सुनते हैं, खबरों में पढ़ते हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग हमारे ही समाज में रहते हैं। ऐसे में जरूरी है कि समाज की सोच में बदलाव लाया जाए, स्त्रियों के प्रति समाज में सम्मान की भावना को बढ़ाया जाए। तभी हम महिलाओं को सुरक्षित माहौल दे पाएंगे।

ये भी पढ़ेः ज्योतिष शास्त्र: शनि और मंगल की युति, इस 1 राशि के लिए बेहद खतरनाक, इन राशियों की तरक्की के प्रबल योग

साथ ही प्रशासन और सरकारों को भी महिला सुरक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए। लैंगिक समानता और सुरक्षा जैसे पक्षों पर बात करने, बदलाव लाने के साथ-साथ मेरा मानना है कि आधी आबादी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए नीति-निर्धारण में महिलाओं की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी भी जरूरी है। आजादी के इतने वर्ष बाद भी नीति-निर्धारण में आधी आबादी की भागीदारी का प्रतिशत बहुत ही कम है।

इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। जब आधी आबादी नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका में होगी, तो महिलाओं के हितों को बेहतर तरीके से समझा जाएगा, उनके लिए पॉलिसीज भी बनाई जाएंगी। इस तरह बड़ा बदलाव महिलाओं के जीवन में होगा। आज हम सब देख रहे हैं कि विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार महिला मंत्री बखूबी संभाल रही हैं।

जहां तक महिला आयोग की कारगर भूमिका का प्रश्न है, तो हम महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमेशा प्रयासरत हैं। अब तक लोग हमें परंपरागत भूमिकाओं में देखते थे, अब हम महिलाओं से जुड़े विषय पर सुनवाई करते थे, पीड़िता को पूरा सहयोग देते थे। लेकिन अब महिला आयोग समस्या के निवारण पर भी ध्यान दे रहा है।

हम महिलाओं को सक्षम बनाने का प्रयास कर रहे हैं, इसके लिए अलग-अलग प्रकार के कार्यक्रम करते हैं, महिला चौपाल करते हैं, वहां महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं। इसके अलावा लैंगिक भेदभाव को दूर करने के लिए भी जागरूकता फैलाते हैं। इस बार महिला दिवस के अवसर पर महिला संसद का आयोजन कर रहे हैं, इस तरह महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

यह सब हम महिला आयोग के सीमित अधिकारों में कर रहे हैं, जैसे-जैसे हमारे अधिकार बढ़ेंगे, हम और भी अच्छे से महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करेंगे। महिला दिवस के अवसर पर मेरा सभी बहनों, बेटियों को संदेश है कि अपने आप को प्राथमिकता दीजिए, अपना महत्व समझिए। अपने जीवन को बदलने के लिए प्रयासरत रहिए, अपनी आवाज को बुलंद कीजिए। फिर देखिएगा कि आने वाली सदी हम महिलाओं की होगी।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story