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अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस: महिलाओं और पुरुषों की बराबरी से देश की तरक्की को लगेंगे नए पंख

हाल ही में प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की चर्चा करते हुए कहा कि देश, महिला विकास से अब महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास की तरफ बढ़ रहा है। न्यू इंडिया का मतलब ही सशक्त नारी और उसका समग्र विकास है।

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस: महिलाओं और पुरुषों की बराबरी से देश की तरक्की को लगेंगे नए पंख
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हाल ही में प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की चर्चा करते हुए कहा कि देश, महिला विकास से अब महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास की तरफ बढ़ रहा है। न्यू इंडिया का मतलब ही सशक्त नारी और उसका समग्र विकास है।

प्रधानमंत्री के कथन से स्पष्ट होता है कि आधी आबादी की भूमिका देश के विकास में कितनी महत्वपूर्ण है। इस बात को जनवरी में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के 48वें सम्मेलन में जारी साझा पत्र से और भी बल मिलता है।

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साझा पत्र में कहा गया, ‘वर्कफोर्स में अगर महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो तो भारत की जीडीपी का आकार 27 प्रतिशत बढ़ जाएगा।’ लेकिन इतनी सकारात्मक संभावनाओं के बावजूद, धरातल पर स्थिति बिल्कुल उलट है।

सच्चाई यह है कि आज भी कार्यक्षेत्र में लैंगिक और आर्थिक असमानता बरकरार है, जो महिलाओं की आगे बढ़ने की राह में बहुत बड़ी बाधा है। जीडीपी में योगदान देने के लिए पहले वर्कफोर्स में महिलाओं को समान अवसर और समान काम के लिए समान वेतन की व्यवस्था को सुनिश्चित करना होगा।

उजले के साथ स्याह पक्ष

हर साल ग्लोबल बिजनेस मैगजीन फोर्ब्स, मोस्ट पावरफुल वूमेन की लिस्ट जारी करती है। इसमें कई भारतीय महिला उद्यमियों के नाम शामिल होते रहे हैं। पिछले वर्ष भी फोर्ब्स की लिस्ट में आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर, एचसीएल एंटरप्राइजेज की सीईओ रोशनी नडार और बायोकॉन लिमिटेड की चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ के नाम शामिल थे।

इन्हें देखकर लगता है कि भारतीय कार्यक्षेत्र में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी है। लेकिन हकीकत कुछ और भी है। कार्यक्षेत्र में महिला-पुरुष के बीच वेतन का अंतर बहुत ज्यादा है, साथ ही महिलाओं को खुद को साबित करने के लिए कार्यक्षेत्र में ज्यादा समय भी देना पड़ता है।

यह बात पिछले साल जारी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के जेंडर इंडेक्स में सामने आई। इसके अनुसार भारत में महिलाएं रोज औसतन 537 मिनट काम करती हैं, जबकि पुरुष 442 मिनट ही काम करते हैं। इसके बावजूद महिलाओं को 66 प्रतिशत और पुरुषों को 12 प्रतिशत काम के पैसे नहीं मिलते हैं।

जहां तक बात औसत मासिक आय की है, तो महिलाओं को 5,400 रुपए और पुरुषों को 8,100 रुपए मिलते हैं। यह स्थिति तब है, जब महिलाएं, पुरुषों से ज्यादा समय देती हैं। यह आंकड़ा बहुत ही निराशाजनक है और वर्कफोर्स में सक्रिय महिलाओं को हतोत्साहित करता है।

समझें महिला भागीदारी का महत्व

वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है, इस बात को समझना जरूरी है। प्रसिद्ध उद्यमी रतन टाटा का कहना है कि वर्कफोर्स में सीनियर पोजिशन पर महिलाओं को अधिक संख्या में होना चाहिए, तभी बड़े बदलाव संभव हैं।

चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के फाउंडर जैक मा का भी मानना है कि सफलता के लिए कंपनी को समझदारी और प्यार से चलाना होता है और ये दोनों गुण महिलाओं में सहज रूप से होते हैं। यही वजह है कि अलीबाबा की सीनियर मैनेजमेंट टीम में 37 प्रतिशत महिलाएं हैं।

कहने का सार यही है कि देश के वर्कफोर्स में आर्थिक बढ़ोतरी के लिए मौजूदा परिदृश्य को बदलना होगा। महिलाओं के साथ भेदभाव को दूर करना होगा। उनके काम के महत्व को समझना होगा और पुरुषों के समान ही पारिश्रमिक-पदोन्नति के अवसर देने होंगे।

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वैश्विक है समस्या

ऐसा नहीं है कि आय के आधार पर असमानता हमारे ही देश में मौजूद है, यह समस्या वैश्विक है। पिछले दिनों ब्रिटेन की एक महिला टीवी शो प्रेजेंटर अनीता आनंद को उनके शो से अचानक हटा दिया गया, क्योंकि उन्होंने शो से पहले ट्वीट करके सार्वजनिक रूप से आय में असमानता का मामला लोगों के सामने रख दिया।

हालांकि अनीता को इसी मुद्दे पर शो में बात करनी थी। इससे स्पष्ट होता है कि कार्यक्षेत्र में आय में असमानता के मुद्दे पर महिलाओं को पूरी दुनिया में अभी लंबा संघर्ष करना होगा।

भारत की भूमिका वैश्विक पटल पर अहम

इन दिनों भारत की भूमिका वैश्विक पटल पर बहुत अहम मानी जा रही है। देश के आर्थिक महाशक्ति बनने की संभावनाएं देखी जा रही हैं। लेकिन यह सपना तब तक साकार नहीं होगा, जब तक देश के आर्थिक विकास में महिलाओं की समान भागीदारी नहीं होगी। इसके लिए जरूरी है कि कार्यक्षेत्र में उनके साथ भेदभाव को दूर किया जाए।

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