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नागरवाला कांड से लेकर नीरव मोदी के घोटाले तक का लेखा-जोखा, इंदिरा गांधी का भी था नाम

बैंकों राशि के दुरूपयोग की पहली घटना नागरवाला कांड के नाम से 24 मई 1971 को सामने आई।

नागरवाला कांड से लेकर नीरव मोदी के घोटाले तक का लेखा-जोखा, इंदिरा गांधी का भी था नाम
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देश के 14 बड़े निजी बैंकों का जब 1969 में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीयकरण किया था तो कहा गया था कि यह क्रांतिकारी कदम है और इससे देश का विकास होगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पहले बैंकों की पूंजी का सार्वजनिक उद्यमों के लिए दोहन किया गया। इसके बाद जब राजनेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार और बदइंतजामी से सरकारी उद्योग धंधे डूबने लगे तो आर्थिक सुधार के नाम पर सरकार ने उन्हें बेचने (विनिवेश) की नीति बनाई।

बैकों का लाखों करोड़ रुपये डकारे बैठे इन उद्यमों को बेचना शुरू कर दिया। भ्रष्टाचार और लूट-खसोट की होड़ में नेताओं ने अपनी तिजोरियां भरी। बैंकों राशि के दुरूपयोग की पहली घटना नागरवाला कांड के नाम से 24 मई 1971 को सामने आई। जब भारतीय स्टेट बैंक की संसद मार्ग शाखा से 60 लाख रुपये बिना किसी लिखा-पढ़ी के निकाल लिए गए।

तब सफाई दी गयी कि बैंक के प्रबन्धक को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फोन कर ऐसा करने को कहा था। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऐसे किसी फोन से इनकार कर दिया। पर मामले की जांच दौरान इस कांड से जुड़े सभी व्यक्तियों की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत हो गई। दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब बैंकों के बोर्डों में कांग्रेस सरकारों ने अपने चहेतों को डायरेक्टर बनाकर नियुक्त करना शुरू कर दिया।

कई डायरेक्टरों ने बैंकों की निगरानी करने के बजाय मनमाने ढंग से कर्ज बांटना शुरू कर दिया। कांग्रेस के मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में जिस तरह बैंकों ने कर्ज बांटा उसकी तो कोई मिसाल नहीं मिलती है। 2013 में रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर डा. केसी चक्रवर्ती ने कहा था कि एक करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटालों का हिस्सा 2004-05 से 2006-07 के बीच 73 फीसदी था, जो 2010-11 और 2012-13 में 90 प्रतिशत हो गया।

रिजर्व बैंक की फाइनेंशियल स्टैबिलटी रिपोर्ट, जून 2017 के अनुसार एक लाख से ऊपर के घोटाले का कुल मूल्य पिछले पांच वर्षो में 9750 करोड़ से बढ़कर 16,770 करोड़ तक पहुंच गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2016-17 में घोटाले की कुल राशि का 86 फीसदी हिस्सा लोन से जुड़ा था। 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जब बैंकों के एनपीए का पता लगा तो उन्होंने इसके सुधार के लिए कदम उठाना शुरू किया। बैंक के बड़े कर्जदारों को इसकी भनक मिलते ही उन्होंने देश छोड़कर भागने में ही अपनी भलाई समझी। बैंकों ने जब विजय माल्या जैसे लोगों को कर्ज चुकाने का नोटिस भेजा और मामला जब तक अदालत पहुंचता तब तक वह भाग निकला। ताजा मामला नीरव मोदी और मेहुल चैकसी का है।

बैंक जब तब तक मामले की सीबीआई में रिपोर्ट दर्ज कराता उससे पहले वह अपने परिवार सहित विदेश भाग गया। उस पर दोहरी नागरिकता का भी आरोप है। किसी आरोपी को दूसरे देश में भाग जाने पर कानून की लम्बी प्रक्रिया के पूरा करने और उस देश के साथ प्रत्यार्पण संधि होने पर ही गिरफ्तार कर लाया जा सकता है। हालांकि इस मामले में बैंक के पूर्व निदेशक दिनेश दुबे ने कहा है कि 2013 में ही उन्होंने मेहुल चैकसी की फर्म गीतांजलि जेम्स को कर्ज देने का विरोध किया था पर उनकी बात को बैंक और वित्त मंत्रालय ने नही सुना और उनसे इस्तीफा ले लिया।

यदि तब यूपीए सरकार ने कार्रवाई की होती तो इतना बड़ा घोटाला न हो पाता। तीसरा सबसे बड़ा मामला रोटोमैक के प्रमोटर विक्रम कोठारी और उनके बेटे का है जिन्हें सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है। मोदी सरकार ने अब यह फैसला लिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 50 करोड़ रुपये से अधिक के सारे एनपीए खातों की जांच की जाएगी।

सरकार ने यह जांच पीएमएलए, फेमा और अन्य प्रावधानों के उल्लंघन की जांच के लिए उन्हें प्रवर्तन निदेशालय और राजस्व खुफिया सूचना निदेशालय के साथ मिलकर चलने को कहा है। तमाम बैंकों को परिचालन और तकनीकी जोखिमों से निपटने के लिए 15 दिनों के भीतर एक पुख्ता व्यवस्था तैयार करने के निर्देश भी दिये गये हैं।

वित्तीय सेवा विभाग के सचिव राजीव कुमार ने कहा कि बैंकों के कार्यकारी निदेशकों और मुख्य तकनीकी अधिकारियों को जोखिम से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को व्यवस्थित करने के मकसद से एक कार्ययोजना तैयार करने के लिए कहा गया है। उधर रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को 30 अप्रैल तक स्विफ्ट प्रणाली को कोर बैकिंग प्रणाली के साथ जोड़ने का निर्देश दिया है। इससे लेन-देन को लेकर बैकों की अंदरूनी निगरानी प्रक्रिया मजबूत होगी।

बहरहाल अब मोदी सरकार ने बैंकों की मनमानी पर लगाम लगाना शुरू कर दिया है। इससे विपक्षी नेता घबराये हुए हैं क्योंकि जांच पड़ताल का शिकंजा अब उनके चहेतों तक भी पहुंच रहा है। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम को सीबीआई ने गिरफ्तार किया। बैंकों में घपले-घोटालों से पता चलता है कि हमारा बैकिंग प्रशासन और उसकी निगरानी व्यवस्था किस कदर भ्रष्टाचार में डूबी हुई है।

कांग्रेस के राज में यह सब ढका-मुंदा हुआ था, लेकिन अब मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ये मामले उजागर हो रहे हैं। बंैकों के लुटेरे भय से देश छोड़कर भाग रहे हैं। देश में लगभग 50 साल सत्ता में रहने और एक जिम्मेदार पार्टी के नाते कांग्रेस को सरकार के कदमों का स्वागत करना चाहिए, लेकिन वह देश में भ्रम फैला रही है। वह जानती हैं कि सरकारी बैंक रिजर्व बैंक और उसके आडिटरों की निगरानी में काम करती है।

जबकि भ्रष्टाचारियों की सम्पत्ति को जब्ती का कानून भी उसके राज में संसद पास होने के लिए नहीं रखा जा सका था। अब घोटालों के कई मामले सामने आ रहे हैं और लोग पकड़े भी जा रहे हैं उनकी सम्पत्तियां भी जब्त की जा रही हैं। लेकिन घोटालों के साथ बढ़ते डूबे कर्ज के बोझ को देखकर यह आवाज भी उठ रही है कि क्यों न इन बैंकों को निजी हाथों को सौंपकर सारा झंझट ही खत्म कर दिया जाए।

हालांकि वित्त मंत्री अरूण जेतली ने सरकारी बैंकों के निजीकरण की संभावना से इनकार किया है। लेकिन राजनीतिक दबाव, अक्षमता, भ्रष्टाचार और खराब तकनीक के कारण सरकारी बैंकों में धोखाधड़ी को आसान बना देते हैं। इसलिए इसके समाधान के लिए बैकों में सरकारी हिस्सेदारी 50 फीसदी से घटाकर नरसिम्हन समिति की सिफारिश के अनुसार 33 फीसदी से कम पर लाना होगा। हालांकि ऐसा करने पर भी पूरी तरह धोखाधडी रूक नहीं जायेगी। लेकिन काफी हद तक रोका जा सकता है। इससे नेताओं की भूमिका पर लगाम लग जायेगी।

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