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जी-20 / 2022 में भारत रचेगा इतिहास, पहली बार मिला मेजबानी का मौका

सबसे बड़ी सफलता यह है कि आजादी के 75 साल पूरे होने पर 2022 में जी-20 सम्मेलन की मेजबानी का पहली बार अवसर भारत को मिला है।

जी-20 / 2022 में भारत रचेगा इतिहास, पहली बार मिला मेजबानी का मौका

कूटनीतिक व व्यापार के लिहाज से 13वें जी-20 शिखर सम्मेलन भारत के लिए सफल कहा जा सकता है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साथ कई निशाने साधे हैं। सबसे बड़ी सफलता यह है कि आजादी के 75 साल पूरे होने पर 2022 में जी-20 सम्मेलन की मेजबानी का पहली बार अवसर भारत को मिला है।

मेजबानी इटली को करना था, लेकिन जब पीएम ने भारत की इच्छा व्यक्त की तो जी-20 के सभी नेता मान गए। 90 फीसदी वैश्विक जीडीपी, दुनिया का 80 फीसदी व्यापार, दो तिहाई आबादी और करीब विश्व की आधी जमीन के स्वामी जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन की मेजबानी मिलना विश्व में भारत की बढ़ती ताकत व स्वीकार्यता को रेखांकित करता है।

विकसित व विकासशील देशों के संगठन जी-20 में शिरकत करने अर्जेंटीना गए पीएम ने पीस फॉर योगा से अपने दौरे की शुरूआत की। योग के लिए अर्जेंटीना की तारीफ कर पीएम इस लैटिन अमेरिकी देश को भारत के और करीब लेकर आए। अपने तीन दिन के इस दौरे के पहले ही दिन मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ आपसी ट्रेड व कच्चे तेल के दाम स्थिर रखने के मुद्दे पर सार्थक वार्ता कर भारत व सऊदी अरब के आपसी संबंध को और मजबूत किया।

पाकिस्तान के करीब माने जाने वाले सऊदी अरब से भारत के रिश्ते को निरंतर मजबूत करते रहना भारतीय कूटनीति की कामयाबी है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस के साथ जलवायु परिवर्तन मुद्दे पर प्रतिबद्धता दर्शा कर पीएम ने विश्व को स्पष्ट संदेश दिया कि ग्लोबल मुद्दों पर भारत गंभीर है।

पीएम ने भारत, अमेरिका और जापान के बीच पहली बार त्रिपक्षीय वार्ता कर जहां विश्व में नए त्रिशक्ति केंद्र के उभरने के संकेत दिए और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति कायम रखने के प्रयास करते दिखे, वहीं वे भारत, रूस व चीन के बीच 12 साल बाद त्रिपक्षीय वार्ता कर वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बिठाते दिखे।

अमेरिका और चीन में ट्रेड वार के चलते दोनों में बढ़ती दूरी के बीच भारत के लिए संतुलन के साथ विश्व में आगे बढ़ना जरूरी है। अमेरिका, रूस और जापान जहां भारत के स्वभाविक सहयोगी हैं, वहीं चीन निकट पड़ोसी है। ग्लोबल इकोनोमी में लगातार अपनी पैठ बढ़ाने वाले चीन के साथ भी तारतम्य बिठाकर चलना भारतीय नीति है।

हाल में चीन ने पीओके को भारत का हिस्सा बता कर, भारतीय गैर-बासमती चावल के आयात की अनुमति देकर और ब्रह्मपुत्र नदी जल स्तर के आंकड़े देने का वादा कर संकेत दिया है कि वह भारत के साथ तनाव नहीं बढ़ाना चाहता है।

भारत की भी कोशिश है कि चीन के साथ संबंध शांतिपूर्ण रहे। भारत केवल चीन की विस्तारवादी मानसिकता से असहज रहता है। अमेरिका की रूस व चीन के साथ तनातनी जैसी वैश्विक परिस्थिति में भारत के लिए अपनी आर्थिक व सामरिक हित की सुरक्षा करना आवश्यक है।

जी-20 सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जापानी पीएम शिंजो आबे, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग, फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमानुएल मैंक्रो और सऊदी अरब के प्रिंस सलमान के साथ सौहार्दपूर्ण माहौल में वार्ता कर दिखाया कि भारत वैश्विक ताकतों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।

जी-20 देशों का आतंकवाद और भगोड़े आर्थिक अपराधी के खिलाफ लड़ने, अमेरिकी विमुखता के बावजूद जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने, विश्व व्यापार संगठन व संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने सूचना व तकनीक में सहयोग बढ़ाने और मुक्त व्यापार व वैश्विक शांति को बढ़ावा देने का संकल्प भारत के लिए उपयोगी साबित होंगे। अमेरिकी संरक्षणवाद जैसे कठिन माहौल में जी-20 देशों में आपसी सहयोग भारत के विकास को गति देने में सहायक होगा।

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