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दुश्मनों से नहीं लड़ सकेंगी भारतीय महिला सेना

सेना में महिलाआें की तैनाती 1990 से शुरू हुई थी।

दुश्मनों से नहीं लड़ सकेंगी भारतीय महिला सेना
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नई दिल्ली. वायुसेना ने भले ही महिलाआें के लिए युद्धक भूमिका के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। लेकिन थलसेना और नौसेना फिलहाल इसके लिए तैयार नजर नहीं आ रही हैं। सेना ने युद्ध के अग्रिम मोर्च पर महिलाआें की तैनाती को लेकर स्पष्ट राय प्रकृट करते हुए कहा है कि भौगोलिक आधार पर फौज की तैनाती के हिसाब से कई प्रकार की समस्याआें का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर महिलाएं आएंगी तो उन्हें भी समान जिम्मेदारियों के हिसाब से काम करना होगा।
सेनाप्रमुख ने बताया चुनौतीपूर्ण
सेनाप्रमुख जनरल बिपिन रावत ने एक कार्यक्रम में कहा कि सेना में महिलाएं एवीएशन इंजीनियर्स, मेडिकल और एजूकेशन जैसी ब्रांच में शामिल की जाती हैं। लेकिन सीधे युद्धक भूमिका में इन्हें तैनात नहीं किया जाता है। अगर महिलाएं फौज के मौजूदा स्वरूप व चुनौतियों के बाद भी सेना में आना चाहती हैं। तो स्वयं निर्णय लें, हम उसे देखेंगे।
90 के दशक में हुई शुरूआत
सेनाआें की युद्धक इकाईयों में महिलाआें की तैनाती की शुरूआत वर्ष 1990 से हुई थी। करीब 1.3 मिलियन लंबी सशस्त्र सेनाओं में महिलाआें की संख्या केवल 2.5 फीसदी है। इसमें सेना में एक हजार 436 महिलाएं हैं, वायुसेना में 1500 और नौसेना में 532 महिलाएं हैं। नौसेना ने कुछ समय पहले अपनी कुछ महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन भी दी है। उधर वायुसेना में युद्धक भूमिका में महिलाओं की तैनाती के लिए तीन महिला अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण खत्म होने के बाद ये तीनों महिलाएं वायुसेना में इस वर्ष के मध्य तक बल के लड़ाकू विमान उड़ाती हुई नजर आएंगी।
सीमाओं पर मजबूरियां
जनरल रावत ने देश की पश्चिमी सीमा से लेकर पूर्वोत्तर स्थित चीन सीमा पर ड्यूटी के दौरान आने वाली समस्याआें के बारे में उदाहरण के जरिए बताते हुए कहा कि टैंक में गश्त के दौरान जवानों को उसी के अंदर रहना, खाना-पीना और सोना पड़ता है। कोई टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा जब हम अरूणाचल-प्रदेश का जिक्र करते हैं, तो वहां पर भारत-चीन के बीच पड़ने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सेना के जवानों की गश्त 10 दिन से लेकर अधिकतम 35 दिनों की होती है। इस दौरान पहाड़ के उबड़-खाबड़ रास्ते, हर पल बदलते मौसम से दो-चार होना पड़ता है। गश्त के दौरान जवानों के पास केवल नीले रंग की एक सीट होती है। गश्त के बीच में आराम करने के लिए इसी सीट का प्रयोग किया जाता है। यहां भी टॉयलेट इत्यादि की कोई सुविधा नहीं होती है। सेना के बड़े हिस्से में टॉयलेट की कोई सुविधा नहीं है। ऐसी परिस्थितियों के बावजूद अगर महिलाएं आना चाहें तो हम विचार करेंगे।
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