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हिसाब 2016: इस साल हुए ये महत्वपूर्ण रक्षा समझौते

इन समझौतों से सेना की ताकत में हुआ कई गुना इजाफा।

हिसाब 2016: इस साल हुए ये महत्वपूर्ण रक्षा समझौते
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नई दिल्ली. साल 2016 ने जाते-जाते रक्षा मंत्रालय को कई महत्वपूर्ण रक्षा सौदों की सौगात दी है। इससे न केवल सशस्त्र सेनाओं की आॅपरेशनल ताकत में इजाफा होगा। बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दुश्मन को करारा जवाब देने में भी मदद मिलेगी। इनमें सबसे पहले भारत और फ्रांस के बीच हुए राफेल लड़ाकू विमान सौदे का जिक्र आता है। यह रक्षा मंत्रालय के लिए साल 2016 का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सौदा रहा है। राफेल सौदे की विशेषताएं- सितंबर 2016 में भारत और फ्रांस के रक्षा मंत्रियों के बीच यहां राजधानी दिल्ली में 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर 59 हजार करोड़ रुपए (7.878 बिलियन यूरो) के समझौते पर हस्ताक्षर हुए। फ्रांस की ओर से राफेल विमानों का निर्माण और आपूर्ति डेसाल्ट एवीऐशन नामक कंपनी करेगी। समझौते के बाद पहला विमान भारत करीब 36 महीनों के बाद पहुंचेगा। सभी विमानों की आपूर्ति में करीब 66 महीनों का समय लगेगा। राफेल एक मध्यम-लघु बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान है, जिसमें स्टेट आॅफ द आर्ट बियॉंड विजुअल रेंज मैटेआर एयर टू एयर मिसाइल और स्कैल्प लांग रेंज एयर टू ग्राउंड क्रूज मिसाइल लगी हुई है। मैटेआर की मारक क्षमता 150 किलोमीटर से ज्यादा है और स्कैल्प 300 किलोमीटर से अधिक के इलाके में मौजूद अपने लक्ष्य पर सटीक निशाना लगा सकती है। समझौते में 50 फीसदी का आॅफसेट क्लॉज भी शामिल है। इससे भारतीय कंपनियों को 3 बिलियन यूरो कमाने का मौका मिलेगा और बड़ी मात्रा में यहां स्वदेश में रोजगार सृजन भी होगा।
145 एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर सौदा- राफेल के अलावा साल 2016 में रक्षा क्षेत्र में कुछ अन्य महत्वपूर्ण सौदे परवान चढ़े। इसमें नवंबर महीने में केंद्रीय मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति (सीसीएस) द्वारा स्वीकृत किया गया 145 एम-777 अल्ट्रा लाइट होवित्जर तोपों का समझौता भी शामिल है। इसकी कुल कीमत 5 हजार करोड़ रुपए है और इनकी आपूर्ति अमेरिका की बीएई सिस्टम्स नामक कंपनी करेगी। इस समझौते का इसलिए भी विशेष महत्व है। क्योंकि इसके होने के बाद सेना को करीब चार दशक बाद दुर्गम पहाड़ी इलाकों में आवश्यकता पड़ने पर दुश्मन से दो-दो हाथ करने में मदद मिलेगी। 80 और 90 के दशक के बीच में हुए बोफोर्स तोप दलाली मामले के बाद से लेकर अब तक सेना के लिए नई तोपों की खरीद नहीं की गई है। यह समझौता आधिकारिक तौर पर भारत और अमेरिका के बीच हुआ अंतर सरकारी समझौता (आईजीआई) है। नवंबर 2016 के बाद अगले तीन महीनों में बीएई कंपनी की ओर से भारत को तीन तोपें दी जाएंगी। इनके यहां के पर्वतीय और मरूस्थलीय इलाकों में भारतीय गोलाबारूद के साथ परीक्षण किए जाएंगे। 145 तोपों में से 20 को अगले दो सालों में भारत को सौंपा जाएगा। इसके बाद बची हुई 120 तोपों को अगले 48 से 54 महीनों में यहां देश में बीएई सिस्टम्स और महिंद्रा के फरीदाबाद स्थित डिफेंस प्लांट में तैयार किया जाएगा।
200 कामोव हेलिकॉप्टरों का सौदा- बीते अक्टूबर महीने में गोवा में हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भारत और रूस के बीच 200 कामोव केए226 हेलिकॉप्टरों के संयुक्त उत्पादन को लेकर समझौता हुआ। इसमें रूस की ओर से रसियन हेलिकॉप्टर और भारत की ओर से एचएएल भागीदार होंगे। समझौते के तहत 60 हेलिकॉप्टर रसियन हेलिकॉप्टर भारत को सीधे सौंपेगा और शेष बचे हुए 140 हेलिकॉप्टरों का उत्पादन यहां भारत में किया जाएगा। कामोव हेलिकॉप्टरों के सशस्त्र सेनाओं में शामिल होने के बाद उनकी मारक क्षमता में कई गुना का इजाफा होगा। कामोव की खुबियां- यह एक छोटा दो इंजन वाला हेलिकॉप्टर है। यह 3.6 टन के वजन के साथ उड़ान भर सकता है। इसके अलावा यह अपने साथ एक टन विस्फोटक भार भी ले जा सकता है। कामोव की अधिकतम गति 120 किलोमीटर है। छह लोग इसमें आसानी से सफर कर सकते हैं। कामोव के आने से सेना और वायुसेना में पुराने पड़ चुके हेलिकॉप्टरों को फेज आउट करने में मदद मिलेगी।
एस-400 ट्रंफ मिसाइल एयर डिफेंस सिस्टम डील- इस डील पर भी ब्रिक्स सम्मेलन में भारत और रूस के बीच रजामंदी बनी थी। भारत रूस से ऐसे पांच एस-400 ट्रंफ मिसाइल सिस्टम खरीदेगा। जिनकी अनुमानित कीमत 30 हजार करोड़ रुपए हो सकती है। दोनों पक्षों के बीच आधिकारिक समझौते पर अगले वर्ष 2017 के मध्य तक हस्ताक्षर होने की संभावना है। यह एक प्रकार का मोबाइल प्लेटफार्म है, जिसके जरिए एक बार में आठ मिसाइलें दागी जा सकती हैं। इसमें लगे हुए उन्नत किस्म के रडार की मदद से दुश्मन की ओर से आ रहे लड़ाकू विमान को 600 किलोमीटर की दूरी से ही पकड़ा जा सकता है। इसके साथ ही 400 किलोमीटर की दूरी पर इस सिस्टम में लगी हुई मिसाइलें दुश्मन की ओर से भेजे गए लक्ष्य को पकड़ सकती हैं।
लेमोआ और मेजर डिफेंस पार्टनर-इन सौदों के अलावा गुजरते साल में भारत को अमेरिका की तरफ से दो अहम समझौतों की सौगात भी मिली हैं। इनका जिक्र करना भी यहां जरूरी हो जाता है। इसमें लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम आॅफ अग्रीमेंट (लेमोआ) पर हस्ताक्षर होने के बाद भारत और अमेरिका की सेनाएं एक-दूसरे के सुरक्षा ठिकानों का मरम्मत, समुद्री व हवाई यात्राओं के दौरान ठहराव के लिए कर सकेंगे। इसमें जाइंट ट्रेनिंग , जाइंट एक्सरसाइज और ह्यूमेनिटेरियन अस्सिटेंस के दौरान भी एक-दूसरे की सेनाआें को मदद की जाएगी। मेजर डिफेंस पार्टनर- साल 2016 में ही अमेरिका ने भारत को मेजर डिफेंस पार्टनर का स्टेटस दिया है। इसके जरिए अब भारत उच्च-किस्म की तकनीक को अमेरिका से आसानी से हासिल कर सकता है। पहले इसके लिए अमेरिका के कई विभागों की अनुमति लेनी पड़ती थी। जिसमें लंबा समय लगता था।
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