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पुराने चीता हेलिकॉप्टर के सहारे सेना, दांव पर लगी रहती है सैनिकों की जान

मरम्मत की धीमी रफ्तार और स्पेयर पार्ट्स की कमी जैसे मुद्दों की वजह से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं।

पुराने चीता हेलिकॉप्टर के सहारे सेना, दांव पर लगी रहती है सैनिकों की जान
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नई दिल्ली. पश्चिम-बंगाल के सिलीगुड़ी से करीब 11 किमी. की दूरी पर स्थित सुकना में दुर्घटनाग्रस्त हुए सेना के चीता हेलिकॉप्टर ने दशकों पुरानी इस मशीन के सहारे पश्चिमी से लेकर पूर्वोत्तर के सीमाई इलाकों की मुश्किल होती हवाई निगरानी की ओर साफ इशारा कर दिया है। लेकिन बावजूद इसके सेना में इनका इस्तेमाल बदस्तूर जारी है। रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और पूर्वोत्तर में अपनी सेवाएं दे चुके सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह सही है कि चीता हेलिकॉप्टर पुराना हो चुका है। लेकिन जब तक इसकी जगह पर सेना को कोई नया हेलिकॉप्टर नहीं मिलता। तब तक इसी से काम चलाना पड़ेगा। गौरतलब है कि वायुसेना ने चीता हेलिकॉप्टरों का सियाचिन और सालतोरो पर्वत जैसे ऊंचे दुर्गम पहाड़ी इलाकों में इस्तेमाल करना बंद कर दिया है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी बीते कुछ वर्षों में सैन्य हेलिकॉप्टरों के हादसों का शिकार होने के तथ्य को संसद में स्वीकार किया है।
खतरनाक लेकिन काम चलाना पड़ेगा
रक्षा विशेषज्ञ और सेना में उप-सेनाप्रमुख रह चुके सेवानिवृत अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल राज कादयान ने कहा, यह सही है कि चीता हेलिकॉप्टर काफी पुराना हो चुका है। लेकिन फिर भी सेना इसका इस्तेमाल सरहदों पर हवाई निगरानी के लिए तब तक करती रहेगी। जब तक उसे नए हेलिकॉप्टर नहीं मिल जाते हैं। करीब चार दशक पुराने हो चुके चीता हेलिकॉप्टरों के प्रयोग को लेकर कादयान कहते हैं कि काम तो चलाना है। ये हानिकारक हैं। लेकिन जब तक यह तय नहीं होगा कि ये हेलिकॉप्टर उड़ान के योग्य नहीं हैं। तब तक इनका प्रयोग चलता रहेगा। अभी रूसी कामोव केए-200 हेलिकॉप्टरों को सेना में शामिल होने में समय लग सकता है। ऐसे में चीता की उड़ान जारी रहेगी।
रक्षा मंत्री का तर्क
रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बीते वर्ष राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में कहा था कि देश में सैन्य हेलिकॉप्टरों के दुर्घटनाग्रस्त होने के कुल 30 मामले सामने आए हैं। सुकना हादसे के बाद यह आंकड़ा 31 हो जाता है। इनमें करीब 53 लोगों की मौत हुई है। सभी हादसों मे पायलट पुरानी मशीन की तकनीकी कमियों के साथ जूझ रहे थे। हादसे तकनीकी खामी और मानव त्रुटि की वजह से हुए हैं। पर्रिकर ने दुर्घटनाआें को श्रेणी-1 का बताते हुए कहा कि दशकों पुरानी मशीन में पायलटों का अपर्याप्त प्रशिक्षण है। मरम्मत की धीमी रफ्तार और स्पेयर पार्ट्स की कमी जैसे मुद्दों की वजह से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं।
दो में से एक दुर्घटनाग्रस्त
पूर्वोत्तर में काफी समय तक तैनात रहे सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सुकना में जो हादसा हुआ है उसमें उड़ान के लिए दो हेलिकॉप्टर गए थे। इसमें से एक सुकना हेलिपैड पर लैंड करने से करीब 50 मीटर की दूरी पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। जबकि इससे पहले हेलिपैड पर लैंड हुआ एक अन्य हेलिकॉप्टर सुरक्षित है। उसमें 33वीं कोर के चीफ आॅफ स्टाफ (सीओएस) मेजर जनरल वी.साहनी और दो पायलट सवार थे। पूर्वाेत्तर में सेना चीन सीमा से लगे सुदूर-दुर्गम इलाकों में हवाई निगरानी के लिए चीता हेलिकॉप्टरों का प्रयोग करती है। इस तरह की उड़ान के समय दो हेलिकॉप्टर जोड़े में साथ जाते हैं। एक हेलिकॉप्टर में पायलट और को-पायलट को मिलाकर पांच लोगों के बैठने की व्यवस्था है। जब यह हादसा हुआ तब हेलिकॉप्टर उत्तरी सिक्किम से निगरानी का काम पूरा करके वापस लौट रहे थे। सुकना सेना की 33वीं कोर का रणनीतिक इलाका है। इसके तहत निगरानी के लिए नाथुला, गुरुदोंगमांग और यातोंग का इलाका आता है।
निगरानी का सही समय
अधिकारी ने कहा कि पूर्वोत्तर में चीता हेलिकॉप्टरों से निगरानी का ज्यादातर काम सितंबर से नवंबर के महीने के बीच में होता है। आसमान साफ रहने से उड़ान में मदद मिलती है। इसके बाद ठंड में इसमें कमी देखने को मिलती है। सेना की एक कोर में कुल करीब 10 हेलिकॉप्टर तैनात किए जाते हैं। इसमें दो फ्लाइट का एक बेड़ा बनाया जाता है। एक फ्लाइट में 5 हेलिकॉप्टर होते हैं। एक फ्लाइट को कोर के तहत आने वाली डिवीजन में तैनात किया जाता है और एक अन्य को कोर में रखा जाता है।
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