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World Labour Day : मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसे मजदूरी मिल जाए तो दुनियां खूबसूरत हो जाए

देश के संविधान में न्यूनतम मजदूरी के तमाम नियम कानून गढ़े गए हैं पर जमीनी सच्चाई उससे बिल्कुल अलग है। आज भी मजदूरों के अधिकारों को छोटे से लेकर बड़े धन्ना सेठों ने दबाकर रखा है। 90% मजदूरों को तो पता ही नही होता कि उनको काम के एवज में जो मजदूरी मिल रही है वो कम है।

World Labour Day :  मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसे मजदूरी मिल जाए तो दुनियां खूबसूरत हो जाए
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हम सोशल मीडिया के तमाम माध्यमों से मजदूर दिवस की बधाई देकर अपने आपको उनका हितैषी साबित कर लेते हैं तमाम लोगों को यह एहसास भी दिलवा देते हैं कि मजदूर भी हमारे वर्ग, समाज का हिस्सा हैं पर जब भी उनके वास्तविक अधिकार को कोई हड़पने की कोशिश करता है तो हम मूकदर्शक सा बनकर बस तमाशा देखते रहते हैं।

देश के संविधान में न्यूनतम मजदूरी के तमाम नियम कानून गढ़े गए हैं पर जमीनी सच्चाई उससे बिल्कुल अलग है। आज भी मजदूरों के अधिकारों को छोटे से लेकर बड़े धन्ना सेठों ने दबाकर रखा है। 90% मजदूरों को तो पता ही नही होता कि उनको काम के एवज में जो मजदूरी मिल रही है वो कम है।



शहर के लेबर चौराहों पर सुबह ही एक बड़ी संख्या रोटी के इंतजाम के लिए इकट्ठा हो जाती है जिन्हें औने पौने दाम पर लोग अपने घरों में 8-10 घंटो की कड़ी मेहनत करवाते हैं और कई बार पैसा कल देंगे कहकर वापस भेज देते हैं। परसाई जी ने कहा है कि "मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसे मजदूरी मिल जानी चाहिए" पर हमारे समाज को इससे तनिक भी असर नहीं पड़ता।

कई बार मजदूर संघ अपने अधिकारों को लेकर आन्दोलन करता है पर उनपर राजनीति से प्रेरित लांछन लगाकर हम उनकी आवाज को उठाने के बजाय सिरे से खारिज कर देते हैं। इससे न सिर्फ़ उनके अधिकारों का हनन होता है बल्कि कहीं न कहीं हम उन्हें मुख्यधारा में आने से भी रोकते हैं।

दुनिया भर में मजदूरों के अधिकारों को लेकर क्रान्ति हुई है। सत्ता परिवर्तन हुआ है। वामपंथी पार्टियों का जन्म भी इसी कारण हुआ है। पर वर्तमान में सारी पार्टियां मजदूरों के अधिकार को वापस दिलाने की बात तो करते हैं पर उनके हित में फैसला लेने में हिचकते हैं।

हम अपने आसपास नजर दौड़ए तो देखेंगे कि मजदूरों की स्थिति लगातार बदहाली के कगार पर ही पहुंच रही है। हमें अब न सिर्फ उनके लिए आवाज़ बुलंद करना होगा बल्कि उनके अधिकारों को कोई मारे न इसके लिए भी सजकता से सोचना होगा। मजदूर वर्ग है तभी हमारा अस्तित्व है इस बात को जेहान में हमेशा बैठा के रखना होगा।



मजदूर दिवस की शुरुआत

एक मई को मजदूर दिवस मनाने की परपंरा आज से 130 साल पहले शुरु हुई थी। उस समय मजदूरों का जबरदस्त शोषण हो रहा था। बड़ी कंपनियों में मजदूर एक बार अन्दर आ जाते तो काम खत्म होने के बाद ही उन्हें बाहर जाने दिया जाता।

काम के घंटों की कोई सीमा नहीं तय थी। 1 मई 1886 को अमेरिका की सड़कों पर करीब तीन लाख से ज्यादा मजदूर इस मांग के साथ उतर आए कि उनसे 8 घंटे ही काम लिया जाए।

उनके इस प्रदर्शन को खत्म करने के लिए गोलियां चलवा दी गई। तमाम मजदूर मारे गए, बड़ी संख्या में घायल हुए। इस आन्दोलन के बाद मजदूरों के तमाम संगठनों ने आवाज उठाना शुरू कर दिया।

पेरिस में 1889 को आतंर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन हुआ। जिसमें अमेरिका के हेय मार्केट में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी गई और 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरुआत हुई।

अमेरिका, रुस ही नहीं बल्कि दुनिया के 80 से ज्यादा देश इस दिन को मई दिवस के रूप में मानते हुए राष्ट्रीय अवकाश रखते हैं। भारत में किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान ने 1 मई 1923 से इसकी शुरुआत की।

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