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World Environment Day 2019 Theme : धरती को बचाने के लिए आप भी उठाएं ये ग्रीन स्टेप्स

World Environment Day 2019 Theme: 5 जून 2019 (5 June 2019) पर्यावरण दिवस की थीम - 'वायु प्रदूषण' रखी गई हैं। यह धरती हम सबकी है। इसकी हरीतिमा ही इसका सौंदर्य है, उसी से हम सबका जीवन संभव है। आजीवन हम सब इससे कितना कुछ लेते रहते हैं, फिर हमारा भी तो कर्त्तव्य है कि इसकी हरियाली को बनाए रखें, उसके लिए हर संभव प्रयास करें। हर साल पर्यावरण दिवस पर लोगों को पर्यावरण बचाने,बिगड़ते पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक किया जाता है। 5 जून 2019 (5 June 2019) को पूरी दुनिया में विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day 2019) मनाया जाएगा। वैसे ही जैसे हमारी दादी-नानी किया करती थीं। आइए, उसी परंपरा को आगे बढ़ाएं और अपनी धरती की गोद को हरियाली से भर दें।

World Environment Day 2019 Theme : धरती को बचाने के लिए आप भी उठाएं ये ग्रीन स्टेप्स
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World Environment Day Theme 2019: 5 जून 2019 (5 June 2019)को पूरी दुनिया में विश्व पर्यावरणइस बार विश्व पर्यावरण दिवस की थीम (World Environment Day Theme) 'वायु प्रदूषण' (Air Pollution) रखी गई हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक किया जाता है। 5 जून 2019 (5 June 2019) को पूरी दुनिया में विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day 2019) मनाया जाएगा।

इस साल की थीम 'एयर पॉल्यूशन'

इस साल यूनाइटेड नेशंस ने पर्यावरण दिवस की थीम-बीट एयर पॉल्यूशन को बनाया है ताकि वायु प्रदूषण को लेकर लोगों को जागरूक किया जा सके। वायु प्रदूषण के सकंट को दूर करने का सबसे सरल उपाय है, अधिक से अधिक वृक्षारोपण।

ऐसा तभी संभव है, जब हम भी दादी और मां की तरह ही वृक्ष, जंगल और प्रकृति का महत्व समझें। आइए, इस पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण प्रहरी बनकर संकल्प लें अपनी वंसुधरा को हरा-भरा बनाने का।

आज भी याद हैं मुझे अपने बचपन के दिन, जब मैं अपनी दादी या मां के मुख से जंगल जाकर वन देवता की पूजा की बात सुना करती थी। मेरे भीतर एक कौतुहल रहता था कि ये वन देवता कौन हैं, कभी देखा नहीं? एक दिन दादी मां ने कहा, 'आज त्योहार है, तू भी चल, हम सब वन देवता की पूजा करेंगे।' दादी ने जैसे ही वन देवता का नाम लिया, मैंने दादी से सवाल किया-'यह कौन से देवता हैं दादी। आप इनका नाम अकसर लेती हैं। आज आप उन्हें हमें जरूर दिखाएं।'

'हां.. हां.. चल आज तुझे वन देवता के दर्शन कराती हूं।' दादी ने जवाब दिया था। पूजा की थाली लेकर मैं बड़ी आतुरता से दादी के पीछे-पीछे चल पड़ी थी। दादी-मां और मैं, छोटी-बड़ी पगडंडियों को पार करते हुए कुछ ही देर में हरे-भरे जंगल में पहुंच गए।

बड़े-बड़े पेड़, रंग-बिरंगे फूलों वाले पौधे, उन पर बैठी सुंदर तितलियां, चिड़ियों की चहचहाहट, पानी का बहता सोता, ये सब मिलकर पूरे वातावरण को मनमोहक बना रहे थे। मैंने दादी और मां को देखा, दोनों ने पूजा की थाली से रोली निकालकर एक पेड़ पर लगाई, फिर अक्षत अर्पित किए, धूप बत्ती जलाई।

आखिर में नैवेद्य (प्रसाद) में बनाए गए गुलगुलों के छोटे-छोटे टुकड़े किए और चारों दिशाओं में डाल दिए। इसके बाद कुछ बीज लेकर मिट्टी में जगह-जगह दबाए और पास ही बहते सोते से हाथों में पानी लाकर उन पर छिड़का। दादी को ऐसा करते देख, मुझे बड़ी हैरानी हुई थी।

मैंने जब दादी से पूछा, 'आप तो मुझे वन देवता के दर्शन कराने वाली थीं, आपने तो बिना किसी देवता के पूजा कर ली? कहां हैं आपके वन देवता, मुझे तो नजर नहीं आ रहे हैं। अगर कहीं हैं भी तो आप उनकी पूजा क्यों कर रही हैं? इससे क्या फायदा होगा?'

मेरी भोली बातें सुनकर दादी हंसकर बोली थीं, 'बेटा, यह जंगल ही हमारे वन देवता हैं। इनकी ही तो पूजा की है अभी मैंने और तुम्हारी मां ने। तुम फायदे की बात पूछ रही हो। वन देवता से ही हमारा जीवन है। अपने चारों तरफ इस हरे-भरे मनभावन जंगल को देखो।

यहां मौजूद पेड़-पौधे न सिर्फ हमें फल-फूल देते हैं, शुद्ध वायु भी देते हैं, जो हमारे स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है। अगर वायु अशुद्ध होगी तो हम हमेशा अस्वस्थ रहेंगे। अभी जो बीज हमने जंगल की मिट्टी में रोपे हैं, वे भी कुछ समय बाद अंकुरित होकर पौधे बन जाएंगे फिर वृक्ष।

इस तरह जंगल सदैव हरा-भरा रहेगा। वन देवता की ऐसी पूजा हम पीढ़ियों से करते आ रहे हैं, आगे तुम भी ऐसा ही करना। इस पूजा का उद्देश्य यही है कि प्रकृति ने हमें जितना दिया है, उसके प्रति हम आभार प्रकट करें।'

दादी की विरासत

गांव से शहर आकर भी दादी की ये बातें वर्षों बाद भी मेरे मन-मस्तिष्क में बसी हुई हैं। जब भी दादी की याद आती है तो उनकी एक खास छवि मेरे मन में उभरती है। सुबह वह नहा-धोकर तुलसी के पौधे को जल देती थीं, उसकी पूजा करती थीं। नाश्ता करने के बाद बागीचे के सभी पेड़-पौधों को सींचतीं। वह सुंदर-सा बागीचा मेरा प्रिय स्थान हुआ करता था।

मैं भी दादी संग अपने नन्हे-नन्हे हाथों से पौधों को पानी दिया करती थी। पानी डालते ही पौधे की हरी रंगत और निखर आती थी। जब पर्यावरण दिवस आता है तो दादी की सारी बातें याद आती हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए उनके प्रयासों का महत्व आज समझ में आता है।

साथ ही मां की भी याद आती है, जो दादी की ही परंपरा को आगे बढ़ाती रहीं, वह भी हर वर्ष वन देवता की पूजा करती थीं। मां तो हर साल वट सावित्री का व्रत भी रखतीं। बरगद के पेड़ की पूजा करती थीं।

मां कहती थीं कि वट यानी बरगद की पूजा करने से दांपत्य जीवन सुखी रहता है, परिवार में खुशहाली बनी रहती है। साथ ही मां यह भी बताया करती थीं कि भारतीय संस्कृति में बरगद को देववृक्ष माना जाता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि यह वृक्ष दीर्घायु होता है, वर्षों तक हरा-भरा रहता है। कई वर्षों तक वायु को शुद्ध करने का काम करता है, जो हमारे जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। यही कारण है कि बरगद पूजनीय है।

अब अहसास होता है कि किस तरह हमारे घरों की दादी और मां जैसी साधारण महिलाएं अपने प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण में सदियों से अपना अहम योगदान देती आ रही हैं, जिससे धरा पर सबका स्वस्थ जीवन बना रहे।

गांव बन गए पर्यावरण संरक्षण की मिसाल

पर्यावरण संरक्षण के लिए जहां सरकार, प्रशासन प्रयास करते ही हैं, वहीं अपने स्तर पर भी लोग प्रयास करते हैं, जो अपने आप में मिसाल हैं। बिहार के भागलपुर जिले के गांव धरहरा के ग्रामीणों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अनूठा प्रयास किया है।

वहां जब भी घर में बेटी का जन्म होता है तो उसका परिवार आम के पेड़ लगाता है। बेटी के साथ-साथ इन पेड़ों की देखभाल भी परिवार करता है। इसी तरह राजस्थान के राजसमंद जिले से 10 किलोमीटर दूर पिपलांत्री ग्राम पंचायत ने भी ऐसा ही काम किया है।

यहां भी बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाए जाते हैं। इन दोनों ही गांव के ग्रामीण खासकर महिलाएं, अपने लगाए पेड़-पौधों की देखभाल करती हैं। आज ये दोनों गांव बहुत हरे-भरे हैं। साथ ही यहां का लिंग अनुपात भी सुधर गया है।

उत्तराखंड के चमोली जिले के एक गांव बगोली के ग्रामीण भी बेटी की शादी के समय दूल्हा-दुल्हन से पौधा रोपने की एक रस्म करवाते हैं। इस तरह पर्यावरण संरक्षण के प्रति नवदंपती को जागरूक करते हैं।

अगर इस तरह की सोच के साथ हम सभी पर्यावरण को संरक्षित करेंगे तो हमारी धरा पूरी तरह हरी-भरी और स्वच्छ होगी और प्रदूषण की समस्या का अंत हो जाएगा।

आप भी उठाएं छोटे-छोटे ग्रीन स्टेप्स

अगर आप अपने पर्यावरण के प्रति गंभीर हैं और उसके संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहती हैं तो छोटे-छोटे ग्रीन स्टेप्स उठा सकती हैं।

- आप स्वयं तो पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास करें ही, अपने बच्चों को भी वृक्षारोपण का महत्व बताएं, उन्हें भी पर्यावरण प्रहरी बनाएं। बच्चों को एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल का जिम्मा दें। इससे वह प्रकृति से जुड़ाव महसूस करेगा और पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे चलकर प्रतिबद्ध होगा।

- घर का कचरा जलाना भी वायु प्रदूषण बढ़ाने का एक कारण है। इसलिए घर का कूड़ा-कचरा जलाएं नहीं। इसके बजाय गीले कूड़े को कंपोस्ट करें या जमीन में गड्ढा खोदकर डाल दें, यह नेचुरल तरीके से खाद बनाने का तरीका है। प्लास्टिक या मैटेलिक वेस्ट को कबाड़ी वाले को बेच दें, इससे वो रिसाइकिल हो जाएगा।

- अगर आपके घर के पास कोई पार्क या जगह खाली है तो वहां पर मोहल्ले की महिलाओं के साथ मिलकर पेड़-पौधे लगाएं, उनकी देखभाल करें, उस जगह को हरा-भरा बनाएं। इससे आपके ही आस-पास की वायु शुद्ध होगी और आप, आपका परिवार और मोहल्ले के लोग स्वस्थ रहेंगे।

- जब भी किसी को, किसी खास मौके पर कोई उपहार दें तो उसके साथ एक पौधा भी दें। इसके साथ उपहार लेने वाले व्यक्ति से भी आगे ऐसा करने को कहें। इस तरह उपहार के रूप में आप वृक्षारोपण को बढ़ावा दे पाएंगी।

लेखिका - पूनम बर्त्वाल

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