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World Environment Day 2019 : विश्व पर्यावरण दिवस आज- ये हैं इंडियन लेडी टार्जन, कहा जाता है 'वृक्ष माता'

World Environment Day 2019 : भारतीय संस्कृति प्रकृति उपासक रही है और इस संस्कृति को संजोने में सबसे अहम भूमिका महिलाओं ने निभाई है। यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर वे हमेशा से सजग और प्रयासरत रही हैं। सालूमरदा थिमक्का और जमुना टुडू भी ऐसी ही पर्यावरण प्रहरी महिलाएं हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन पर्यावरण संरक्षण को अर्पित कर दिया है। इन दोनों के प्रेरणादायी प्रयासों पर एक नजर।

World Environment Day 2019 : विश्व पर्यावरण दिवस आज- ये हैं इंडियन लेडी टार्जन, कहा जाता है वृक्ष माता
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World Environment Day 2019 : विश्व विख्यात दार्शनिक कार्ल मार्क्स के अनुसार कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के बिना नहीं हो सकता। भारतीय महिलाओं ने भी यह बार-बार सिद्ध किया है कि बड़े बदलाव लाने में वे भी पुरुषों के बराबर योगदान देती हैं। पर्यावरण संरक्षण में भी महिलाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। वर्षों से महिलाएं पर्यावरण प्रहरी बनकर प्रकृति की रक्षा कर रही हैं।

आज भी ऐसी कई महिलाएं हमारे आस-पास मौजूद हैं, इन पर्यावरण प्रहरी महिलाओं के जज्बे को देश, समाज ने भी सराहा है। ऐसी ही प्रेरणादायी महिलाएं हैं, वृक्ष माता के नाम से विख्यात कर्नाटक की सालूमरदा थिमक्का और झारखंड की लेडी टार्जन के नाम से मशहूर जमुना टुडू। इन महिलाओं ने किस तरह पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभाई, आप भी जानिए।

वृक्ष माता-सालूमरदा थिमक्का जीवन बन गया वृक्षारोपण का जुनून

कर्नाटक की 105 वर्षीय पर्यावरणविद, पद्मश्री से सम्मानित सालूमरदा थिमक्का के लिए पेड़-पौधे ही उनके बच्चे हैं। वे वृक्ष माता के नाम से जानी जाती हैं। अपने राज्य के रामनगर जिले में हुलुकल से कुडूर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ चार किलोमीटर की दूरी में वृक्ष माता अब तक 384 बरगद के पेड़ लगा चुकी हैं। वृक्षों के लिए उनके असीम प्रेम को देखते हुए इन्हें सालूमरदा नाम दिया गया है।

कन्नड़ भाषा में सालूमरदा का अर्थ है वृक्षों की पंक्ति। साधारण मजदूर के रूप में काम करने वालीं थिमक्का ने एकाकीपन से बचने के लिए बरगद के पेड़ लगाना शुरू किया था और आज भी वह अपने क्षेत्र में वृक्षारोपण करती हुई दिखाई दे जाती हैं। वृक्ष लगाने की शुरुआत तब हुई थी, जब सालूमरदा के ससुराल वालों ने उन्हें बच्चा ना होने पर ताने देना शुरू किया, ऐसे समय में इन्होंने वृक्षों को अपना सहारा बनाया।

सालूमरदा और उनके पति जो पेशे से किसान थे, दोनों ने पौधों को अपनी संतान माना और अपना जीवन उनके संरक्षण को समर्पित कर दिया। सालूमरदा कहती हैं, 'आज लगता है कि अच्छा ही है मेरा कोई बच्चा नहीं है। उसके कारण ही हमने पौधे लगाने आरंभ किए, जिनकी हम अपने बच्चों की ही तरह देखभाल करते हैं।'

सालूमरदा का नाम बीबीसी की 100 प्रभावशाली महिलाओं की सूची में सम्मिलित है। इस सूची में शामिल होने वाली सालूमरदा थिमक्का सबसे बुजुर्ग महिला हैं। सालूमरदा ने अपने जीवन के 80 वर्ष पर्यावरण को समर्पित किए हैं और अब तक इन्होंने 8 हजार से अधिक पौधे लगाए हैं, जो विशाल वृक्ष बन चुके हैं।

वृक्षारोपण के प्रति उनके जुनून की कहानी दूसरों को भी प्रेरणा देती है। जो वृक्ष सालूमरदा ने लगाए हैं, अब उनका संरक्षण कर्नाटक सरकार कर रही है। आर्थिक रूप से सालूमरदा बहुत अधिक समृद्ध नहीं हैं, मात्र पेंशन से अपनी जीविका चलाती हैं, लेकिन उन्हें गरीब कहना बिल्कुल अनुचित है क्योंकि उन्होंने इस संसार को जो संपदा दी है, वह अमूल्य है।

पद्मश्री सम्मान से विभूषित सालूमरदा थिमक्का अब तक कई और पुरस्कार भी प्राप्त कर चुकी हैं। वर्ष 1995 में उन्हें नेशनल सिटीजंस अवॉर्ड, साल 1997 में इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र अवॉर्ड, वीरचक्र प्रशस्ति अवॉर्ड, साल 2006 में कल्पवल्ली अवॉर्ड और साल 2010 में गॉडफ्रे फिलिप्स ब्रेवरी अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

लेडी टार्जन-जमुना टुडू पर्यावरण संरक्षण को समर्पित कर दिया जीवन

झारखंड के चाकुलिया पंचायत के मुटुरखाम गांव की निवासी जमुना टुडू को इस साल पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वह 2014 में फिलिप्स बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित ऐसी शख्सियत हैं, जिनका संपूर्ण जीवन पर्यावरण संरक्षण को समर्पित है। झारखंड में टिंबर माफिया से लोहा लेने के कारण उन्हें लेडी टार्जन कहा जाता है। जमुना का पर्यावरण से जुड़ाव बचपन से ही रहा, उनके जन्मस्थान ओडिशा के रायरंगपुर में पेड़ बेहद कम थे, इसलिए वे पेड़ों का महत्त्व जानती थीं।

शादी के बाद जब वे ससुराल मुटुरखाम आईं तो उन्होंने वहां विशाल जंगल देखा। लेकिन वो जंगल धीरे-धीरे खत्म हो रहे थे। टिंबर माफिया पेड़ काट कर लकड़ी ले जा रहे थे। उनसे यह देखा नहीं गया और उन्होंने पांच महिलाओं के साथ मिलकर जंगल बचाने का अभियान शुरू किया। जमुना की शुरुआत संघर्षों से भरी रही लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने लक्ष्य पर अडिग रहीं।

धीरे-धीरे उनके द्वारा गठित वन रक्षक समिति से गांव की 60 महिलाएं जुड़ीं, जिनकी संख्या अब 300 है। जमुना की कोई संतान नहीं है, वे पेड़-पौधों को ही संतान मानकर उनकी देखभाल करती हैं। उनके गांव में बेटी पैदा होने पर साल (एक प्रकार का पेड़) के 18 पेड़ लगाए जाते हैं और बेटी के विवाह के समय कम से कम 10 साल के पौधे, परिवार को भेंट किए जाते हैं। मात्र 10वीं कक्षा तक शिक्षित जमुना टुडू से प्रेरणा लेकर आज सैकड़ों लोग पर्यावरण संरक्षण में भागीदार बन रहे हैं।

लेखिका - मिशा शर्मा

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