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Women's day 2020 Kavita: विश्व महिला दिवस के लिए खास पेशकश, कविता 'काश ऐसा हो पाता फिर'

Women's day 2020 Kavita: लेखिका श्वेता रामटेके राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं और पेशे से लेक्चरर हैं। इस कविता के माध्यम से लेखिका हर महिला के दिल में दबी इच्छाओं को अपने शब्दों में बयान कर रही हैं।

Womenकाश ऐसा हो पाता फिर

Women's day 2020 Kavita : देश में आए दिन कई दुष्कर्म की घटनाएं सामने आती हैं। जिससे न सिर्फ महिलाओं का, बल्कि उनके परिवार के बाकी सदस्यों का भी आत्मविश्वास डगमगा जाता है। 'काश ऐसा हो पाता' कविता के माध्यम से लेखिका श्वेता रामटेके अपनी इसी भावना को उजागर कर रही हैं। लेखिका श्वेता रामटेके राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं और पेशे से लेक्चरर एलबी हैं। वो अपने शब्दों के जरिए महिला सशक्तिकरण को जागृत करना चाहती हैं। साथ ही इस कविता के माध्यम से लेखिका हर महिला के दिल में दबी इच्छाओं को अपने शब्दों में बयान कर रही हैं। तो आइए विश्व महिला दिवस के मौके पर उनकी इसी कविता का आनंद लें और एक महिला के दिल में छुपी भावनाओं को समझने की कोशिश करें।



काश ऐसा हो पाता।

नन्ही-सी किलकारी के इंतजार में हर शख्स इठलाता।

कोई बेटियों की मांओ को भी सिर आँखों पर बैठाता।

ससुर बलाएँ लेते, सास माथे को चूमती।

तो गलियों की नुक्कड़ में पड़ी कलियां घरों को रौशन कर रही होती।

काश ऐसा हो पाता।


जिस्म में वही ताकत वही अहम भर जाता।

तो अबला और निर्बला शब्द शब्दकोश की दुनिया से मिट जाता।

निर्भया निर्भीक हो गुजरती सड़कों पे।

न घूरती निगाहें होती और न गंदे इरादे उसका पीछा किया करते।

काश ऐसा हो पाता।


घर से निकलते वक्त न टोकती आवाजें।

न बुलंदी को रोकती होती कोई राहें।

और न होती जहन में दोनो दहलीज़ो की कोई फिकर।

सलीके सिखाते फबकियों को सुन वो होती न सिहर सिहर।

काश ऐसा हो पाता।


न बिन मर्ज़ी रजामंदी बनकर कुबुल करा दी जाती।

न सात वचनों की रश्में शरीयत की अधूरी रकमें डोली दरों में छोड़ी जाती।

न प्रेम का हक बदल कर महज फर्ज रह जाता।

न तीन अलफाज़ो में सिमट कर वो कहर बरसाता।

काश ऐसा हो पाता।


न संस्कारो का पूरखौता होता, न त्याग का कठोर वचन होता।

और न होता मर्यादा का उलंघन और न परीक्षा का अग्नि कुंड होता।

प्रति उत्तर की ध्वनि फिर कानों में गुंजती..

कि हर तरफ तेरा ही जोर है, तेरा ही यशगान चहुँ ओर हैं।

तु ही चंडी तु भवानी तु ही तो सावित्री तु ही झांसी की भी रानी।


तुझमें भी सुप्त अहम है तुझमें भी ताकत है।

आजमा ले खुद को ये कंहा पुरुषों से कम है।

दोनों ही प्रकिति की रचना किसी के लिये गुण हैं किसी के लिए ये दोष है।

अब नहीं वो बेड़ियां अब न रहे वो हालात है।

अब हर चीखो पर बनते कानून और हवालात हैं।


संस्कार संस्कृति की विरासत हैं दायरे में रहना ये बिलकुल जायज़ है।

अगर ये न हो तो सब बिखर जाते आदम थे आदम ही रह जाते।

अब बदलती सोच है बेटी अब नहीं बोझ हैं।

ससुराल में भी बहू हंसती खिलखिलाती लाज के घुंघट से निकल अंतरिक्ष को पार कर जाती।


अब तो पर्वत की चढ़ती चोटियां और समंदर की नापती गहराइयाँ।

अब खड़ी सीमाओं में करती दुश्मनों सामना।

छूने के संकेतो से सीखती संदिग्ध को भापना।

और अब बढ़ती मंगल और चांद की ओर हैं।

तु जिस जहां में रहती हैं वो जमाने का पिछड़ा छोर हैं।


यकीं करो थोड़ा तो कठिन है सरल न सही पर ये मुमकिन है।

कोमल हथेली को पंजे का नाम दे।

शरमाती पलकों की तयोरियाँ चढ़ा कर तु घर से निकल और ख़ुशी से आगे निकल।

न रुक न झुक न पलट न ठिठक ,बढ़ और बढ़े चल

फिर तेरा हौसला नया रंग लाएगा एक दुजे के बढ़ते बढ़ते कारवाँ बढता ही जाएगा।

ये कारवां बढ़ता ही जाएगा।


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