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कौन है कुर्द लड़ाके, जो आईएसआईएस से लड़ रहे जंग

तुर्की की स्थापना करने वाले मुस्तफा कमाल पाशा ने देश में जो विचारधारा डाली है वह कुर्द विरोधी है इसकारण तुर्की में रह रहे 15-20 फीसदी कुर्दों को उनके अधिकार से वंचित रखा गया है। कुर्दिश नाम रखने पर पाबंदी है साथ ही कुर्दिश भाषा का प्रयोग करना अपराध की श्रेणी डाला गया है। तुर्की कुर्दों को पहाड़ी तुर्क मानती है इसलिए उनके साथ भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाती है।

कौन है कुर्द लड़ाके, जो आईएसआईएस से लड़ रहे जंग
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इस समय दुनिया की सबसे बड़ी खबर तुर्की का सीरिया में कुर्द लड़ाकों को निशाना बनाकर किया जा रहा हमला है। आईएसआईएस जैसे खतरनाक आतंकियों से लड़ रहे कुर्द लड़ाकों के ठिकानों को निशाना बनाकर तुर्की द्वारा किए जा रहे हमले को दुनिया के तमाम देशों ने गलत बताया। भारत ने भी तुर्की के इस तानाशाही रवैए से ऐतराज जाहिर किया है। इस बड़ी घटना के बाद लोगों में इस बात की उत्सुकता है कि कुर्द लड़ाके कौन हैं जिसे दुनिया का समर्थन मिल रहा है।

सीरिया पिछले 1 दशक से भयंकर आतंकवाद को झेल रहा है। आए दिन आती मार्मिक तस्वीरों को देखकर रूह कांप जाती है। युद्ध की भट्ठी में डालकर सीरिया को नर्क बनाने वाले आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन का सबसे बड़ा रोल रहा, जिसे खत्म करने के लिए देश में लंबे समय तक अमरीकी फौज तैनात रही, अब जब अमेरिका ने अपनी फौज को वापस बुला लिया है, उनके फौज बुलाते ही तुर्की ने कुर्द लड़ाकों पर हमला बोल दिया।

कुर्द लड़ाके भी सुन्नी इस्लाम को मानते हैं, इसके अलावा भी कई और समुदाय और धर्म के लोग इसमें शामिल हैं। कुर्द मध्य-पूर्व का सबसे बड़ा जातीय समूह है। न सिर्फ सीरिया में बल्कि ईरान, इराक व तुर्की के पहाड़ी इलाकों में निवास करते हैं, एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल मिलाकर इनकी जनसंख्या करीब साढ़े तीन करोड़ है। इतनी जनसंख्या होने के बावजूद भी कुर्दों का कोई अलग देश नहीं है।

कुर्दों ने अपने लिए एक अलग देश की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलनरत हैं। वह कुर्दिस्तान के नाम से देश बनाना चाहते हैं। इनके इतिहास को देखें तो 20वीं सदी के शुरुआत में ऑटोमन साम्राज्य के पतन और पहले विश्व युद्ध के बाद सेवरेस संधि में कुर्दों के अलग देश का प्रावधान रखा गया। लेकिन साल 1923 में तुर्की के मशहूर नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने इस संधि को ही खत्म कर दिया। तुर्की की सेना ने अगले सात सालों में इस आंदोलन को रौंद दिया।

एक सवाल ये भी लगातार उठता है कि आखिर कुर्द इस्लामिक स्टेट से क्यों मुकाबला कर रहा है? दरअसल आंतक की विभीषिका ने कुर्दों को सबसे ज्यादा परेशान किया है। साल 2013 में इस्लामिक स्टेट ने सीरिया के कुर्दों को निशाना बनाना शुरू किया और भारी संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। कुर्दों ने पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स बनाया और इस्लामिक स्टेट से अपनी रक्षा के लिए कुर्द लड़ाकों को तैयार किया।

तुर्की की स्थापना करने वाले मुस्तफा कमाल पाशा ने देश में जो विचारधारा डाली है वह कुर्द विरोधी है इसकारण तुर्की में रह रहे 15-20 फीसदी कुर्दों को उनके अधिकार से वंचित रखा गया है। कुर्दिश नाम रखने पर पाबंदी है साथ ही कुर्दिश भाषा का प्रयोग करना अपराध की श्रेणी डाला गया है। तुर्की कुर्दों को पहाड़ी तुर्क मानती है इसलिए उनके साथ भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाती है।

अमेरिका चाहे तो कुर्द संगठनों की मदद कर सकता है पर उसे डर है कि इससे ईरान, सीरिया, तुर्की व इराक की सेनाएं एक हो जाएंगी और यूरोप-अमेरिका की कोशिश नाकाम हो जाएगी। इसलिए अमेरिका सख्त लहजे के बजाय नर्म लहजे में तुर्की को समझाने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल स्वायत्त देश की मांग को लेकर कुर्द लड़ाकों द्वारा छेड़ा गया संशस्त्र संघर्ष पीछे हटता नहीं दिखाई दे रहा है।

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