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भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन और क्यों ?

2019 की आम लोकसभा चुनाव की अधिसूचना निर्गत हो चुकी है। चुनाव आयोग से लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी कार्ययोजना में व्यस्त दीखने लगे हैं। बुद्धिजीवियों की मंडली में यह चर्चा होने लगी है कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन? और क्यों? हो सकता है कि इस प्रश्न का हल उन्हें चुनाव परिणाम घोषित होने पर ही मिले। परंतु, जो लोग अतीत में निहित शुभ को सामने रखकर वर्तमान में जीने के अभ्यासी हैं उन्हें आज ही दीख रखा है नरेंद्र मोदी भारत का अगला प्रधानमंत्री। कारण भी सुस्पष्ट हैं।

भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन और क्यों ?
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2019 की आम लोकसभा चुनाव की अधिसूचना निर्गत हो चुकी है। चुनाव आयोग से लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी कार्ययोजना में व्यस्त दीखने लगे हैं। बुद्धिजीवियों की मंडली में यह चर्चा होने लगी है कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन? और क्यों? हो सकता है कि इस प्रश्न का हल उन्हें चुनाव परिणाम घोषित होने पर ही मिले। परंतु, जो लोग अतीत में निहित शुभ को सामने रखकर वर्तमान में जीने के अभ्यासी हैं उन्हें आज ही दीख रखा है नरेंद्र मोदी भारत का अगला प्रधानमंत्री। कारण भी सुस्पष्ट हैं।

प्राचीन दार्शनिक एक सूक्ति 'नायमूला प्रसिद्धि:' को स्मरण कर हम कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से भारत की प्राचीन प्रतिष्ठा विश्वगुरु का सम्मान पुनर्स्थापन की चर्चा वृहद होने लगी है जो निर्मूल नहीं सकती है क्योंकि सूक्ति वचन का समर्थन भी इसे प्राप्त हो रहे हैं। भारत के हजारों निर्द्वंद्व बुद्धिजीवियों को इस प्रश्न का हल महाकुंभ 2013 में ही दीख गया और नरेंद्र मोदी उन साधु-संतों-बुद्धिजीवियों की भविष्यदृष्टि पर खड़े उतरे हैं। राष्ट्र की समृद्धि, आत्मनिर्भरता, सर्वत्र निर्भयता से लेकर विश्व राजनीति में सर्व सामान्यता की दिशा में नरेंद्र मोदी के बढ़ते कदम उनके विरोधियों में भी कौतुहल पैदा कर दिया है।

सवा सौ करोड़ भारतीयों की मोदी की आत्मीयता से बड़ी कोई अन्य साधन नहीं हो सकती जो मोदी विरोधियों के पास हो। सवा सौ करोड़ अनंत वाचक हैं और इन सब में आत्मीय संबंध स्थापित कर लेना योगी का स्वभाव है। निश्चय ही नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व योगी जनक, कार्तवीर्य, अजातशत्रु की श्रेणी में आज खड़ा दीखता है, जहां से 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का सर्वव्यापक अर्थ विश्वजनमानस में पुनर्जगृत होने को है। यह एक कल्पना नहीं, आत्मीय मोदी का सत्य है जिसे त्रिकालदर्शी बुद्धियोगियों ने देख ली है।

सवा सौ करोड़ को अपने से अभिन्न समझने, जाननेवाला व्यक्ति असाधारण ज्ञान में विचरण करत है। उसे कभी मोह, शोक में जाने का अवसर नहीं मिलता है। सभी प्राणियों में अपनी छाप देखने वाला योगी निर्द्वंद्व मन-बुद्धि का होता है। उसकी अभेद दृष्टि में लिंगभेद, जातिभेद, संप्रदायभेद आदि कोई भेदकारक विचार नहीं पनपते। नरेंद्र मोदी की प्रकृति की सभ्यता हीं उनके लिए कामधेनुवत कार्यक्षम है जो सवा सौ करोड़ भारतीय पर उनके अटल विश्वास को डिगने नहीं देगी।

मोदी जिस सनातन भारतीय वैभव को पुनर्स्थापित करने हेतु राष्ट्रनेतृत्व का ध्वजवाहक बना है उसे पूर्ण हुए बिना वह चाहकर भी स्वयं को इस पावन लक्ष्य से पृथक नहीं कर सकता। वर्तमान भारत की नियति यही है। साधु-संतों सहित जन-जन का आशीर्वाद, घनघोर विरोधियों की शुभकामना एवं मौन सह-सहमति देखकर ऐसा लगता है कि प्रकृति द्वारा नियोजित जनता जनार्दन ही मोदी के रथ का संचालन कर रही है। मोदी की विश्वसनीयता को परखकर प्रत्येक मतदाता स्वयं में मोदी को देखने लगे हैं। 2014 की लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी द्वारा जनता को दी गई आश्वासनों में सर्वप्रधान भ्रष्टाचारमुक्त भारत का था।

मोदी भलीभाँति जानते हैं कि भ्रष्टाचार भारतीय संस्कार का लक्षण नहीं है। प्रत्येक भारतीय शिशु को बाल्यावस्था में रटाये जाने की परंपरा रही है- "मातृवत परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत। आत्मवत सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पंडितः"। इस मानवीय श्रेष्ठतम ज्ञान में भारतीय जनमानस जीवन जीने का आदि रहा है। भ्रष्टाचरण को आक्रांताओं द्वारा विदेशी संस्कार से भारत में घोल दिया गया जिसका उपसंहार विदेशी विचारक द्वारा नामित एवं भारत में स्थापित काँग्रेस के रूप में विद्यमान है।

भारत में भ्रष्टाचार ऐसी विदेशी विषाणु है जिसे भ्रष्ट अभिभावक भी अपने संततियों में देखना पसंद नहीं करते। अतएब आम जनमानस द्वारा गुजरात के लक्ष्यसिद्ध मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की निर्भयता पर भरोसा करते हुए प्रथम प्रयास में ही पूर्ण बहुमत प्रदान कर दी गई। नरेंद्र मोदी ने अपनी निर्भयता एवं कार्यकुशलता से, निम्न से आरंभ कर उच्चवर्गों तक के प्रति सहृदयता से, भारत को अपेक्षित विश्व सम्मान की दिशा में तत्परता से भारतीय जन के भरोसा को दृढ़तर किया है।

आज का भारत इस सत्य को जान गया है कि भ्रष्टाचारी नासूर के कटते ही जन-जन को बैंक खाते में पैसे होने का सुख तथा करोड़ों बेरोजगार युवकों को रोजगार सुलभ होंगे। सभी जानते हैं कि सभी महत्वपूर्ण कार्य छू-मन्तर से सिद्ध नहीं होते। बड़े लक्ष्य साधने में धैर्य परमावश्यक होता है और धैर्यशील भारतीयों का आभूषण है। नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता देश-विदेश सर्वत्र गहरी छाप छोड़ी है।

नरेंद्र मोदी की स्वच्छता अभियान का लक्ष्य बाह्याभ्यंतर दोनों हैं। और इसमें उन्हें अपार सहमति जान-जन की प्राप्त हो रही है। आम जन-जीवन मन, वाणी एवं क्रिया से मोदी के साथ चल पड़ा है मोदी की विश्वसनीयता को सिर चढ़ाकर। परिणाम भी रेखांकित करने योग्य देशवासियों के सामने हैं। मोदी की निःस्वार्थता, निस्पृहता, पर उसकी लोकहितैषी विचार, कार्य एवं विश्वसनीय व्यवहार पर सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा की मुहर गली। और तब से अबतक विश्व के सभी प्रमुख राष्ट्राध्यक्षों ने मोदी के व्यापक व्यक्तित्व में अपने हितैषी की छवि देखी है।

आधुनिक भारत एवं विश्व के इतिहास में ऐसा सर्वसमान्य व्यक्तित्व किसी अन्य राजनेता में देखने को नहीं मिलता है। विश्वसनीयता नरेंद्र मोदी की प्राणवायु का स्थान ले ली है। विश्वाजनमानस के लिए आभायान्तर शुद्धि का उपाय मोदी ने योग अवलंबन को रखा और समग्र विश्व इस भारतीय शिक्षा को हाथों हाथ सिर अपर चढ़ा लिया। मोदी की विश्वसनीयता का यही प्रमाण है। सैकड़ों वर्षों से जिस निष्काम योगी मुक्तिदाता की खोज भारत को थी वह नरेंद्र मोदी के आकार में खोज ली गई है।

आज के भारतीय विचार में 'गरीबी हटाओ' का नारा देने वाले ढंगों में तथा उज्जवला, जन-धन, आयुष्मान भारत, अंत्योदय योजना जैसे कार्यान्वित लक्ष्य साधक में भेद स्पष्ट दीख रहा है। अस्तु, भारत के बुद्धिजीवियों में चल रही आशंका दूर होने में समय नहीं लगता। हम सत्ता की राजनीति से पूर्णतः पृथक भारत के आबालबृद्ध नर-नारी को मोदी-मोदी रटते सुनते हैं। मोदी का प्रत्येक नारा राष्ट्रहित में सुचिंतित विचार सूत्र हैं।

उनमें 'मेक इन इंडिया'', स्किल इंडिया जैसा नारा भारत को महाशक्ति के रूप में खड़ा करने का अचूक माध्यम है जिसका अपेक्षित परिणाम सजग भारतीय के समझ से बाहर नहीं है। 'सबका साथ सब का विकास' की सरलता में सर्वहितैषी संकल्प का उर्वर बीज छुपा है। यह नारा योगी की उस अभेद बुद्धि से निःसृत सत्य है जिसकी गति लक्ष्य साधे बिना स्थिर नहीं हो सकती, भले इसके विरोध में प्रवंचना का बुलबुला किसी भी मात्र में क्यों न खड़ी की जाए।

इस नारा का संवाहक सनातन सत्य है जिसके सम्मुख विरोधी स्वर टिक नहीं पाता। तभी तो इस नारा को भू-मंडलीय मान्यता मिलने लगी है। सभी विचारक यह स्वीकार करने लगे हैं कि किसी भी राष्ट्र की समृद्धि एवं सर्वांगीण विकास हेतु यह संकल्प अनिवार्य हैं। यह नारा मात्र नहीं अमोघ कलयंकारी मंत्र है।

नरेंद्र मोदी की निर्भयता सर्वोपरि है। यह 'सर्वत्र निर्भयता' भौतिक ऐषनाओं से मुक्त हुए विना संभव भी नहीं है। 1947 से अबतक भारत को ऐसा निर्भीक नेतृत्व प्राप्त नहीं हुआ। यह मोदी ही है जो इजराइल का परम मित्र होकर भी फिलिस्तीनियों के साथ खड़ा हो सकता है। अमेरिका, रूस, चीन की आँखों में आँख मिलाकर मित्रवत विचारों का आदान-प्रदान कर सकता है। आसुरी शक्तियों को मुँहतोड़ जबाव दे सकता है। राष्ट्रहित को प्रमुखता देते हुए विश्व सुख-शांति की दिशा में विचार-कार्य कर सकता है।

विश्वसनीयता, निर्भयता, समता, सच्चरित्रता तथा बुद्धियोग के अर्थ में नरेंद्र मोदी के बराबरी का अभी तक भारत में कोई राजनेता नहीं उभरा है जिसकी विश्वगुरु भारत को खोज थी। भारत को भ्रष्टाचार मुक्त करने का मोदी संकल्प राष्ट्र को सर्वांगीण समृद्धि के साथ-साथ विश्वगुरु का सम्मान पुनः स्थापित करेगा। प्रत्येक भारतीय में यह भरोसा अब अटूट बन गया है। सजग भारतीय इस दैवीय अवसर को हाथ से जाने नहीं देगा।

द्वारिकाधीश का सखा (भक्त) नरेंद्र मोदी श्रीकृष्ण के बुद्धियोग से शिक्षित होकर श्रीकेदारनाथ के नंदी रूप में राष्ट्रमाता गिरिजा की चौकीदारी में खड़ा हो, तो भ्रष्टाचारी असुर चौकीदार का अपमान कर पाने सर्वनाश को आमंत्रित करते हैं। भारतीय जनमानस को भगवान श्रीकृष्ण के इस वचन में अटूट विश्वास है- 'न मे भक्त: प्रणश्यति'। आत्मजयी भगवदभक्त सदैव अपराजेय ही रहता है।

लेखक- विमल नारायण ठाकुर, दरभंगा, बिहार

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