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राममंदिर आंदोलन के वो पांच बड़े नेता, जिनका अब राजनीतिक सूरज डूब गया

करीब तीन दशक से चल रहे रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद (Ayodhya Case) में कोर्ट (Supreme Court) ने अंतिम फैसला सुरक्षित कर लिया है। रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए कभी इन नेताओं की तूती बोलती थी।

राममंदिर आंदोलन के ये पांच बड़े नेता, जिनका अब राजनीतिक सूरज डूब गया
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राममंदिर आंदोलन के ये पांच बड़े नेता, जिनका अब राजनीतिक सूरज डूब गया

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने आज ऐतिहासिक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद (RamJanmbhoomi-Babri Masjid Despute) में सुनवाई पूरी कर ली है। सुनवाई का आज 40वां और अंतिम दिन था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। बुधवार को हिंदू पक्ष की ओर से निर्मोही अखाड़ा, हिंदू महासभा, रामजन्मभूमि न्यास की ओर से दलीलें रखी गईं तो मुस्लिम पक्ष की तरफ से राजीव धवन ने अपनी दलीलें रखीं। 1949 में पहली बार यह मामला कोर्ट के पास पहुंचा था जिसपर अंतिम सुनवाई अब खत्म हुई है। आइए राम जन्मभूमि आंदोलन के उन पांच नेताओं के बारे में जानते हैं जिनकी लोकप्रियता कभी चरम पर थी। एक आवाज पर लाखों समर्थक और कार्यकर्ता एकजुट हो जाते थे लेकिन राजनीति में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के बाद आज हाशिए पर हैं।

लालकृष्ण आडवाणी- साल 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की तो लालकृष्ण आडवाणी 1957 तक पार्टी के सचिव बने रहे। इसके बाद 1973 से 1977 तक उन्होंने जनसंघ का जिम्मा संभाला। फिर 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद 1986 तक पार्टी महासचिव बने रहे। फिर 1986 से 1991 तक उन्होंने भाजपा अध्य़क्ष पद का जिम्मा संभाला।

1990 के दशक की शुरूआत के साथ आडवाणी की लोकप्रियता और तेजी से बढ़ती गई। तब राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। हालांकि उन्हें बीच में ही गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उनका राजनीतिक कद और बढ़ता गया। रथयात्रा से उनकी लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया था। साल 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया उनमें आडवाणी का भी नाम शामिल है।



वह एक या दो नहीं तीन बार भाजपा के भी अध्यक्ष पर रहे। इसके अलावा चार बार राज्यसभा और पांच बार लोकसभा के सदस्य रहे। वर्ष 1977 से 1979 तक पहली बार केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री की हैसियत से लालकृष्ण आडवाणी ने दायित्व संभाला। आडवाणी इस दौरान सूचना प्रसारण मंत्री रहे।

साल 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी नेतृत्व की सरकार बनी तो उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री का पद संभाला। फिर 29 जून 2002 को उप-प्रधानमंत्री बन गए। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से आडवाणी का प्रधानमंत्री बनने का सपना लगभग टूट सा गया। अपने 91 साल के राजनीतिक जीवन में आडवाणी ने हमेशा परिवारवाद का हमेशा विरोध किया। उनके बेटे और बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। इस तरह आडवाणी का राजनीतिक जीवन सन्यास की तरफ आगे बढ़ रहा है।

मुरली मनोहर जोशी-

राम मंदिर आंदोलन की अगुवाई करने वाले नेताओं में आडवाणी के अलावा भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी भी एक थे। वह पार्टी के दूसरे बड़े नेता हैं जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। बताया जाता है कि छह दिसंबर को मुरली मनोहर जोशी विवादित परिसर में ही मौजूद थे। मस्जिद का गुम्बद गिरने पर उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी गले मिले थे। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के पास भी लालकृष्ण आडवाणी की तरह पार्टी में अब कोई पद नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से आडवाणी और जोशी दोनों ही पार्टी से अलग-थलग हैं।



अशोक सिंघल-

अशोक सिंघल दशकों से हिंदुत्व विचारधारा के मुखर प्रतिनिधि थे और और राम मंदिर मंदिर बनाए जाने के पक्षधर थे। वह बीस वर्षों तक विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे। इसके बाद जब उनका स्वास्थ्य बिगड़ा तो उनकी जगह प्रवीण तोगड़िया ने ली ली। विश्व हिंदू परिषद की आज जो पहचान है उसके पीछे सबसे ज्यादा योगदान अशोक सिंघल का माना जाता है। सिंघल आरएएस से भी जुड़े रहे और इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान आपातकाल के खिलाफ संघर्ष में लोगों को एकजुट करते रहे।

साल 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक धर्म संसद का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य संचालक सिंघल ही थे। यहीं पर राम जन्मभूमि आंदोलन की रणनीति तय की गई। यहीं से उन्होंने कारसेवकों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। बताया जाता है कि उन्होंने देशभर से पचास हजार कारसेवक जुटाए थे। सभी कारसेवकों ने रामजन्मभूमि पर राम मंदिर की स्थापना करने की कसम देश की प्रमुख नदियों के किनारे खायी।1992 में विवादित ढांचा तोड़ने वाले कारसेवकों का नेतृत्व सिंघल ने ही किया था।

14 नवंबर को उन्हें गंभीर हालत में गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई। फिर 27 नवंबर 2015 को उनका निधन हो गया।




कल्याण सिंह-

राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा के कई नेताओं को देश की राजनीति में एक पहचान दी। उनमें से एक कल्याण सिंह भी थे। उनका जन्म जन्म 5 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। वो संघ की गोद में पले बढ़े। भाजपा के कद्दावर नेताओं में शुमार किए जाते थे और एक दौर में वह उत्तर प्रदेश में बीजेपी के चेहरा माने जाते थे। उनकी पहचान कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी और प्रखर वक्ता की थी। वह दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल रहे हैं।

अयोध्या आंदोलन के बाद जहां कई नेताओं ने सत्ता की सीढ़िया चढ़ी वहीं राम मंदिर में सबसे बड़ी कुर्बानी कल्याण सिंह ने दी थी। कल्याण सिंह भाजपा के इकलौते नेता थे जिन्होंने 6 दिसंबर 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद अपनी सत्ता की बलि चढ़ा दी थी। राम मंदिर के लिए सत्ता ही नहीं गंवाई बल्कि इस केस में सजा पाने वाले भी वे एकमात्र शख्स हैं।



प्रवीण तोगड़िया-

विश्व हिंदू परिषद के फायरब्रांड नेता रहे प्रवीण तोगड़िया पेशे से एक कैंसर सर्जन और किसान के बेटे हैं। वह अब तक अपने विवादित बयानों से चर्चाओं में बने रहते हैं। 1979 में जब वह मात्र 22 साल के थे तो उन्हें राष्ट्र स्वयंसेवकों का मुख्य मार्गदर्शक चुना गया। बताया जाता है कि बचपन में एक बार उन्हें सोमनाथ मंदिर में जाने का अवसर प्राप्त हुआ (सोमनाथ के पुनरुद्धार से पहले)। जब उन्होंने सोमनाथ के ध्वस्त अवशेष देखे तो उनके जीवन की दिशा ही बदल गयी और वे हिन्दुतत्व के पुनरुद्दार में लग गए। ये युवा अवस्था में ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए थे।



तोगड़िया भी राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद का मुद्दा लगातार उठाते रहे हैं। अशोक सिंह के बाद विश्व हिंदू परिषद की कमान उन्हें ही सौंपी गई थी। लेकिन 14 जून 2018 को उन्होंने खुद विश्व हिंदू परिषद से अलग कर लिया। 24 जून 2018 को दिल्ली में अपने समर्थकों के साथ राम मंदिर, धारा 370 और गौहत्या पर कानून जैसे मुद्दों को केंद्र बनाकर अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद की स्थापना की।

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