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मिलिए इन पांच इंजीनियर्स से जिन्होंने लाखों की नौकरी छोड़ कृषि में बनाया करियर, जानेें सक्सेस स्टोरी

खेती-किसानी में पढ़े-लिखे युवाओं का लगातार क्रेज लगातार बढ़ रहा है। कई ऐसे युवा हैं जो प्रोफेशनल स्टडी करने के बाद टेक्निकल खेती करने पर जोर दे रहे हैं। ऐसी ही कहानी है एक युवा इंजिनीयर की जिसने कृषि की तरफ अपना करियर बनाने की सोची। जब 27 साल के अभिषेक धामा के मन में इंजिनीयरिंग छोड़ कर खेती करने का ख्याल आया तो उनका परिवार उन पर सवाल खड़ा कर दिया। घर के लोगों ने कहा कि इतना पढ़ने के बाद तुम्हें खेती करना ही सूझा?

मिलिए इन पांच इंजीनियर्स से जिन्होंने लाखों की नौकरी छोड़ कृषि में बनाया करियर, जानेें सक्सेस स्टोरी
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खेती-किसानी में पढ़े-लिखे युवाओं का लगातार क्रेज लगातार बढ़ रहा है। कई ऐसे युवा हैं जो प्रोफेशनल स्टडी करने के बाद टेक्निकल खेती करने पर जोर दे रहे हैं। ऐसी ही कहानी है एक युवा इंजिनीयर की जिसने कृषि की तरफ अपना करियर बनाने की सोची। जब 27 साल के अभिषेक धामा के मन में इंजिनीयरिंग छोड़ कर खेती करने का ख्याल आया तो उनका परिवार उन पर सवाल खड़ा कर दिया। घर के लोगों ने कहा कि इतना पढ़ने के बाद तुम्हें खेती करना ही सूझा?

1. अभिषेक धामा जिन्होंने नेचुरल स्वीटनर की खोज की

वे कहते हैं कि इस तरह के सवाल मुझसे उस वक्त कई लोगों ने किया। दरअसल धामा की कहानी ये है कि उन्होंने एक अज्ञात पौधे की खोज की जिसका नाम स्टीविया था। जिसका उपयोग प्राकृतिक स्वीटनर बनाने के लिए किया जाता है। इसकी खोज के लिए लोगों ने उन्हें 'मिस्टर स्टीविया' की उपाधि तक दे डाली। धामा तीन साल पहले इंजीनियरिंग छोड़कर कृषि की तरफ करियर बनाना चाहे।

धामा की तरह ही कई ऐसे ही युवा हैं जिन्होंने इंजीनियरिंग व अन्य प्रोफेशनल कोर्स करने के बाद खेती-किसानी की तरफ रूख किए। ये ऐसे किसान होते हैं जो धोती कुर्ता पहनकर खेती नहीं करते ये सूट पहनकर खेती करते हैं। अधिकांश युवा कहते हैं कि नौकरियों की कमी नहीं थी, लेकिन एक अधिक स्थायी जीवन शैली की तलाश थी जिसके कारण इस क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित किया।

2. धामा के चचेरे भाई इंजीनियरिंग छोड़ जुड़े कृषि से

इसी तरह एक और 25 वर्षीय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर विशाल जोकि धामा के चचेरे भाई हैं। उन्होंने भी इंजीनियरिंग छोड़कर कृषि से जुड़ गए। उन्हें इंजीनियरिंग छोड़ने का कोई पछतावा नहीं है। नौ महीनों की नौकरी में उन्होंने पाया कि कॉर्पोरेट जीवन की चकाचौंध उनके लिए नहीं थी। विशाल कहते हैं कि कोई भी पार्टी, क्लब या नियमित वेतन, चेक आपकी उस संतुष्टि को नहीं हरा सकता है जो आपको एक पौधे के बढ़ने से मिलता है। अब वे चेरी, टमाटर, शिमला मिर्च, अजवाइन, लेट्यूस और तरबूज सहित फसलों को उगाते हैं। जिसे वह ऑनलाइन खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं, लेकिन वे कहते हैं कि बड़ी मुश्किल से लागत वसूल पाते हैं।

3. अजय नाईक ने भारत में हाईड्रोपोनिक खेती की शुरूआत की

ऐसे ही कर्नाटक के अजय नाईक हैं जो कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने के बाद नौकरी तलाश करने गोवा पहुंचे। वहां वे एक साफ्टवेयर कंपनी में काम भी करने लगे लेकिन रासायनिक तरिके से उगाए गए फल-सब्जियों से हमेशा परेशान रहते थे। उन्होंने बताया कि मैंने शोध किया कि बिना रासायनिक तरिके से उगाए फल-सब्जियों से कितना फायदा है और मैंने फैसला किया कि जैविक विधि से खेती क्यों न किया जाए और इसके साथ ही क्यों न किसानों को जागरूक भी किया जाए।

अजय नाईक कहते हैं कि मैंने एक कंपनी से हाईड्रोपोनिक खेती की ट्रेनिंग ली और फिर भारत का पहला इनडोर वर्टिकल हाइड्रोपोनिक्स फार्म की स्थापना की जहां मिट्टी के बजाय पोषक तत्वों से भरपूर पानी के उपयोग से खेती की जाती है। नाइक कहते हैं हमने एक सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की और इसे बेचा, उपभोक्ताओं को लाभान्वित करने के लिए लेटसेट्रा नामक कंपनी की स्थापना की।

नाइक कहते हैं कि मैंने इंजीनियरिंग की जो पढ़ाई की थी वह इस क्षेत्र में काम आई। शुरू में जब हमनें इसकी खेती की तो बहुत खर्च आया क्योंकि सेटअप बनाने में काफी पैसा लगा था। तब हमनें इन हाउस सॉल्यूशन बनाने के लिए अपनी तकनीक ज्ञान का इस्तेमाल किया और इससे हमें लागत में कमी लाने में काफी मदद मिली। नाइक कहते हैं कि अगली हरित क्रांति में इंजीनियरिंग की बड़ी भूमिका होगी।

4. अभिषेक सिंघानिया पिता की बीमारी से प्रेरित होकर जुड़े कृषि से

नाइक की तरह ही कोलकाता के अभिषेक सिंघानिया भी इंजीनियरिंग छोड़कर कृषि की तरफ आए। उनके पिता की बीमारी ने उन्हें सस्ते जैविक खाद्य पर शोध करने के लिए प्रेरित किया, जो रसायनों से बनी नहीं थी। उन्होंने पहले शोध करने के लिेए खेतों में भी समय बिताया। धातु विज्ञान में आईआईटी से स्नातक होने के चार साल बाद सिंघानिया इस क्षेत्र से जुड़े आज वे लाखों कमाते हैं और कई किसानों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।

5. IBM के एग्जीक्यूटिव वेंकेट अय्यर ने मूंग की खेती में महारत हासिल की

इसी तरह 53 वर्षीय आईबीएम के एग्जीक्यूटिव वेंकेट अय्यर की कहानी है जिन्हें 2003 में नौकरी छोड़ने का मन हुआ और उन्होंने खेती करने की ठान ली। 2003 में बादल फटने की वजह से फसल बर्बाद हो गया था। इसी कारण वे अवसाद में चले गए। वे सोचे कि अब मैं बर्बाद हो जाऊंगा लेकिन मुंबई से लगभग 100 किलोमीटर दूर दहानू तालुका में पेठ गाँव में 4.5 एकड़ जमीन खरीदी और उन्होंने खेती करना शुरू कर दिया।

उन्होंने 16 साल बाद अपने कृषि की उपलब्धियों पर एक किताब लिखी। जो मूंग की खेती पर आधारित था। वे कहते हैं कि खेती करने में ताजी सब्जियां, हरियाली व खेतों की ताजी हवा से सुखद एहसास होता है यहां कंप्यूटर का F-1 बटन नहीं दबानी पड़ती मदद के लिए।

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