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प्रकृति में ही समृद्धि व स्वास्थ्य, दुनियाभर में बजेगा पतंजलि का डंका : स्वामी रामदेव

स्वामी रामदेव ने पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति पर आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेद विज्ञान सम्मेलन के दूसरे दिन संबोधित किया।

प्रकृति में ही समृद्धि व स्वास्थ्य, दुनियाभर में बजेगा पतंजलि का डंका : स्वामी रामदेव
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तिलक लगाकर स्वामी रामदेव का स्वागत करती किशोरी।

ओ.पी. पाल : हरिद्वार

योग गुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि प्रकृति से ही हमारी संस्कृति की पहचान होती है और इसी से हमें समृद्धि व स्वस्थ्य भी मिलता है। आज करोड़ों लोगों ने अपनी वाटिका यानी आंगन में तुलसी, ऐलोवेरा व गिलोय के पौधों को स्थान दिया है। उन्होंने कहा कि इसमें आचार्य बालकृष्ण के औषधीय जड़ी बूटियों का अनुसंधान का बड़ा योगदान है। स्वामी रामदेव ने यह बात पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति पर आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेद विज्ञान सम्मेलन के दूसरे दिन कही। उन्होंने कहा कि आचार्य बालकृष्ण ने पतंजलि के आयुर्वेद में विराट योगदान है, जहां शोध से आयुर्वेदिक दवाओं की दुनिया से स्वीकार्यता बढ़ी है।

दुनियाभर में बजेगा पतंजलि का डंका

पतंजलि के आचार्य बालकृष्ण ने पतंजलि को आयुर्वेद का शिखर करार देते हुए कहा कि वनों को बचाने पर बल दिया और कहा कि विश्व ने वनस्पति को इतना जटिल कर दिया कि पढ़ा लिखा व्यक्ति भी पेड़ पौधों के नाम नही ले सकता। उन्होंने कहा कि विश्व में 3.60 लाख पेड़ पौधे हैं, जिनमें से उन्होने दो सौ अज्ञात बोटनीकल नामों में से 1.45 लाख नाम खोजे हैं। यही नहीं 60 हजार पौधों का औषधीय गुणों के आधार पर उन्होंने अनुंधान किया है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में उनके नामों को पहचानना आसान काम नही था। इसलिए उन्होंने जींस और आकृतियों के आधार पर उनका वरगीकरण विधा को अपनाने पर जोर दिया गया। उन्होंने पेड़ पौधों के जींस के आधार पर नामकरण कर लिया है औ करीब पांच हजार पेड़ पौधों का चरित्र के आधार पर नामकरण किया जा रहा है। मसलन तीन लाख से ज्यादा पेड़ पौधे के नामों को करीब 25 हजार नाम में समायामजित करने उनकी पहचान को आसान बनाया जा रहा है। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि इस बात को उन्होंने डंके की चौट पर संयुक्त राष्ट्र में भी कहा है कि जो काम यूएनओ को करना था वो हम कर रहे हैं।

विशेषज्ञों ने किया मंथन

उन्होने कहा कि वनस्पति के बोटनीकल के नामों की हिंदी और अंग्रजी भाषा में वैश्विक डायरेक्टरी ऋषि मुनियों की वैदिक और आयुर्वेदिक परंपरा को लेकर एक रिकार्ड बनाएगी। सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रुप में डा. यूएन दास ने ड्रग डिस्कवरी व क्लानिक ट्रायल की प्रक्रिया को विस्तार से बताया। उन्होंने सभी का पोष्टिक आहार लेने के साथ नियमित योग व्यायाम को अपनी जीवन शैली से जोडने की सलाह दी। वहीं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर डाक्टर एचबी सिंह ने माइक्रोबियल पेस्टीसाइड के बारे में विस्तार से जानकारी दी। वैज्ञानिक डा. रणजीत सिंह ने सीबकर्थेान और गुहावटी विश्वविद्यालय की प्रो. राखी चतुर्वेदी ने प्लांट टिशू कल्चर तकनीक, तमिलनाडु विवि के डा. के. राजमणि ने औषधीय पादप विषय पर प्रकाश डाला। इंदिरागांधी विश्वविद्यालय हरियाणा के उप कुलपति डा. जे.पी. यादव ने आयर्वेद सू डेंगू वायरस के नियंत्रण और हिमाचल के प्रो. एसएस कंवर ने बौद्धिक संपदा तथा दिल्ली विश्वविद्याय की प्रो. रुपम कपूर ने मलेरिया जैसे रोगों के उपचार पर प्रकाश डाला। इस सम्मेलन में जहां कृषि क्रांति और ई-आत्मनिर्भर भारत को थीम पर चर्चा की गई। वहीं मंगलवार को वनस्पति विज्ञान से आयुर्वेद उपचार के थीम पर पूरक और वैकल्पिक दवाई के अलावा औषधीय पौधों की खेती और बाजार से जुड़ाव के अलावा हाल के बाजार के रुझान में हर्बल मेडिसिन सेक्टर की भूमिका पर चर्चा की गई है।

ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाने पर बल

इससे पहले बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय सोलन के पूर्व कुलपति केआर धीमान ने जंगलों में फायर लाइन बनाने, उन्हें आगजनी से बचाने और वन तालाब विकसित करने की जरूरत बताई। उनका मत है कि वन खत्म होंगे तो औषधियां भी खत्म हो जाएगी। प्रोफेसर ओमप्रकाश अग्रवाल ने केंचुआ खाद की उपयोगिता व निर्माण के बारे में बताते हुए ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाने की बात कही। जिससे पर्यावरण प्रदूषण खत्म होगा, गुणवत्ता में सुधार व उत्पादन बढ़ेगा। लखनऊ के प्रोफेसर डॉ रमेश कुमार श्रीवास्तव ने हल्दी, भूमि आंवला, तुलसी, एलोविरा समेत कई औषधिय पौधों की नई वैरायटीज से रूबरू कराया।

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