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विशेष : पढ़ाई के प्रेशर में छात्रों की आत्महत्या जारी? कॉलेज कब तक बनाता रहेगा विलेन?

छात्रों द्वारा आत्महत्या का क्रम बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा। देश के हर हिस्से से पढ़ाई के तनाव को लेकर आत्महत्या की घटनाएं बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं।

विशेष : पढ़ाई के प्रेशर में छात्रों की आत्महत्या जारी?  कॉलेज कब तक बनाता रहेगा विलेन?
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28 अक्टूबर को हैदराबाद आईआईटी कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र ने आत्महत्या कर ली। किसी तरह के सुसाइड नोट के न मिलने से आत्महत्या के कारणों का कुछ पता नहीं चल सका। साथी छात्र बताते हैं कि पिछले कुछ दिनों से कम्प्यूटर साइंस का छात्र सिद्धार्थ पिचिकाला डिप्रेशन में था। बार-बार पूछने पर भी वह अपनी परेशानी नहीं बताता था। बस इतना कहता था कि उसे अकेला छोड़ दो। और फिर उसने बिल्डिंग से कूदकर दुनिया ही छोड़ दी।

छात्रों द्वारा आत्महत्या का क्रम बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा। देश के हर हिस्से से पढ़ाई के तनाव को लेकर आत्महत्या की घटनाएं बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं। इसी 22 अक्टूबर को बेंगलुरु में इंजीनियरिंग के छात्र ने आत्महत्या कर ली। कॉलेज प्रशासन हर्षा को लगातार सस्पेंड करने की धमकी देता था जिसकी वजह से उसने सातवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। सुसाइड नोट में उसने कॉलेज प्रबंधन पर उत्पीड़न का आरोप लगाया है।

14 अक्टूबर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्र ने भी आत्महत्या कर ली। 3 जुलाई को भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान हैदराबाद में मार्क एंड्रयू चार्ल्स नाम के छात्र न पढ़ाई के प्रेशर और बेहतर न कर पाने के कारण खुदकुशी कर ली। उसे आशंका थी कि जब वह पढ़ाई पूरी करके निकलेगा तो उसका खराब रिजल्ट आएगा और उस रिजल्ट के दम पर उसे अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी। इसलिए उसने जिंदगी को खत्म करने का ही फैसला कर लिया। साथी बताते हैं कि वह बहुत मिलनसार इंसान था।


इसमें किसी तरह का संदेह नहीं है कि छात्रों पर पढ़ाई का जबरदस्त प्रेशर है। जो जितने बेहतर संस्थान में है उसपर उतना ही दबाव है। कभी खराब रिजल्ट का प्रेशर, कभी परिवार की तरफ से उम्मीदों को पूरा कर पाने का प्रेशर तो कभी कॉलेज में सीनियरों द्वारा रैगिंग करना। हर तरफ से मिल रहे प्रेशर से छात्र परेशान हो जाता है और देखते ही देखते डिप्रेशन में चला जाता है। यही कारण है कि मरने वाले ज्यादातर छात्र सुसाइड नोट में लिखते हैं कि उनकी मौत का जिम्मेदार कोई नहीं है पर वह ये भी लिखते हैं कि वह जिंदगी के कड़े संघर्षों का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। जिसके कारण वह मौत को चुन रहे हैं।

छात्रों के बढ़ते आत्महत्या पर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एसके यादव कहते हैं कि छात्र देश में बढ़ रही बेरोजगारी से डर जाते हैं, उनके दिमाग में ये बात बैठ जाती है कि उन्हें बेहतर नौकरी नहीं मिलेगी, यही कारण है कि वह आत्महत्या कर लेते हैं। वह कॉलेज प्रशासन को भी इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं, एसके यादव कहते हैं कि छात्रों को पढ़ाई के साथ मोटिवेशन की भी जरूरत होती है पर ज्यादातर कॉलेज इसपर ध्यान ही नहीं देते।


मनोचिकित्सक अजय रस्तोगी छात्रों की आत्महत्या पर कहते हैं कि पढ़ाई का तो बोझ छात्रों पर है ही साथ ही मां बाप की उम्मीद आत्महत्या के चांस बढ़ा देती है। कई बार छात्र वह पढ़ाई करना ही नहीं चाहता पर परिवार के दबाव में उसे करना पड़ता है और जब वह उसमें बेहतर नहीं कर पाता तो डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। डॉ. रस्तोगी बताते हैं कि पहले आईआईटी जैसे संस्थानों में ही आत्महत्या के मामले सामने आते थे अब तो स्कूल स्तर पर भी ऐसे मामले सामने आने लगे हैं।

12वीं में पढ़ने वाला छात्र अपने ही साथी से प्रतिस्पर्धा कर बैठता है और फिर नंबर कम आने पर घातक कदम उठा लेता है। आत्महत्या को कैसे रोका जाए इसका कोई एकदम सटीक उत्तर नहीं है किसी के पास। अगर मां-बाप परिवार बच्चे को बहुत प्रेशर न दे, रिजल्ट को लेकर दूसरे बच्चों से तुलना न करे, कॉलेज प्रशासन छात्रों को पढ़ाई के साथ मोटिवेट करे तो इसमें कमी लाई जा सकती है। साथ ही नौकरी के लिए असुरक्षा की भावना अगर कम होती है तो निःसंदेह आत्महत्या के मामलों में बड़ी कमी आ सकती है।

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