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PM Modi Birthday Special: आज के पीएम ने कभी भारत-पाक युद्ध के दौरान जवानों को पिलाई थी चाय

PM Modi Birthday Special: 17 सितंबर को भारत के 15वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है।

PM Modi Birthday Special: आज के पीएम ने कभी भारत-पाक युद्ध के दौरान जवानों को पिलाई थी चाय
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पीएम नरेंद्र मोदी

PM Modi Birthday Special: 17 सितंबर को भारत के 15वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है। इस दिन को खास बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने सप्ताह दिवस की तैयारी कर रखी है। वहीं दूसरी तरफ हम आापके लिए पीएम मोदी की जिंदगी से जुड़ा एक किस्सा लेकर आए हैं। जिसके जरिए आप जान सकेंगे कि पीएम मोदी ने अपने बचपन में सेना के जवानों को भी चाय पिलाई थी।

पीएम मोदी की जिंदगी से जुड़े कई किस्से हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि साल 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान मोदी जी ने स्टेशन से गुजर रहे भारतीय सेना के जवानों को चाय पिलाई थी। साल 2014 में पीएम पद मिलने के बाद पहली बार अपने गृह नगर में यात्रा के दौरान उन्होंने पत्रकारों को वाड नगर रेलवे स्टेशन पर चाय के उस स्टाल की तस्वीरें भी दिखाई थी। जहां वो चाय बेचा करते थे।

पीएम मोदी के नाम है ये रिकॉर्ड

वैसे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम कई बड़े रिकॉर्ड हैं। लेकिन भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने मां के जिंदा रहते पीएम पद को ग्रहण किया था। उनकी मां हीराबेन अभी भी जिंदा हैं। नरेंद्र मोदी उत्तर गुजरात के मेहसाणा जिले के एक छोटे छोटे से गांव वडनगर के रहने वाले हैं।

वडनगर में हैं कई इतिहास छुपे

पीएम का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात में हुआ था। भारत की आजादी मिलने के 3 साल बाद उनका जन्म हुआ था। नरेंद्र मोदी दामोदरदास मोदी और हीरा मोदी के छठे बच्चों में से तीसरे हैं। वडनगर एक ऐसा शहर है, जो इतिहास में डूबा हुआ है। पुरातत्व खुदाई से पता चलता है कि यह सीखने और आध्यात्मिकता का एक जीवंत केंद्र रहा था। इस शहर में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने वडनगर का दौरा किया था।

17 साल की उम्र में लिया था ये फैसला

उन्होंने 17 साल की उम्र में अपने करियर के बारे में सोच लिया था। लेकिन उस उम्र में नरेंद्र मोदी के लिए चीजें बहुत अलग थीं। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया। जिसने उनके जीवन को ही बदल कर रख दिया। उन्होंने घर छोड़ने और पूरे भारत में यात्रा करने का फैसला लिया था। वो एक सन्यास की तरह जीवन जीना चाहते थे।

लेकिन उनके इस फैसले को सुनकर उनका परिवार हैरान था। लेकिन उन्होंने नरेंद्र की इच्छा को स्वीकार कर लिया। यह उनके लिए आध्यात्मिक जागृति का समय भी था। जो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति से जोड़ता था, जिसकी वह हमेशा प्रशंसा करते थे स्वामी विवेकानंद।

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