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'एक देश एक चुनाव' पर पक्ष-विपक्ष में तेज हुए तर्क-वितर्क, आसान नहीं किसी फैसले पर पहुंचना

देश में इस समय फिर से 'एक देश एक चुनाव' को लेकर बहस तेज हो चुकी है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा जहां देशभर के सारे चुनाव एक साथ करवाना चाहती है वहीं विपक्षी पार्टियां देश में चल रही चुनाव व्यवस्था को सही ठहरा रही हैं। दोनों पार्टियों का अपना अलग और व्यापक तर्क है। एक साथ चुनाव करवाने या फिर न करवाने को लेकर एक लाइन में जवाब नहीं दिया जा सकता। इसपर लंबे तार्किक बहस की जरूरत है तभी किसी परिणाम पर पहुंचा जा सकता है।

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देश में इस समय फिर से 'एक देश एक चुनाव' को लेकर बहस तेज हो चुकी है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा जहां देशभर के सारे चुनाव एक साथ करवाना चाहती है वहीं विपक्षी पार्टियां देश में चल रही चुनाव व्यवस्था को सही ठहरा रही हैं। दोनों पार्टियों का अपना अलग और व्यापक तर्क है। एक साथ चुनाव करवाने या फिर न करवाने को लेकर एक लाइन में जवाब नहीं दिया जा सकता। इसपर लंबे तार्किक बहस की जरूरत है तभी किसी परिणाम पर पहुंचा जा सकता है।

देश में एक साथ चुनाव करवाने को लेकर जो सबसे बड़ा तर्क दिया जाता है वह यह कि इससे बार बार हो रहे चुनाव खर्च को कम किया जाएगा। यह तर्क सही भी है। इसबार लोकसभा चुनाव में करीब 90 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। करीब 10 लाख पोलिंग बूथ बनाया गया था। हर बूथ पर 5 से ज्यादा कर्मचारियों की तैनाती की गई। चुनाव करवाने से लेकर मतगणना तक बहुत लोगों की की जरूरत पड़ती है। ऐसे में अगर विधानसभा चुनाव भी साथ करवाना हो तो पोलिंग बूथ के अन्दर सिर्फ ईवीएम रखने की जरूरत है। थोड़े से खर्चे में ही लोकसभा के साथ विधानसभा का चुनाव भी पूरा हो जाएगा।

वहीं इसके विरोध में चुनावी विशेषज्ञ कहते हैं कि पैसा बचाने के चक्कर में हम महत्वपूर्ण मुद्दों को दरकिनार नहीं कर सकते। उनकी मानें तो लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव करवाने से क्षेत्रीय मुद्दे खत्म हो जाएगें। साथ ही किसी पार्टी की अगर राज्य या केंद्र में से कहीं लहर होगी तो उसे चुनाव में फायदा होगा। एक तर्क जो सबसे ज्यादा प्रभावी है वो ये कि एक ही व्यक्ति दो अलग मानसिक स्थितियों में होकर अलग-अलग मशीनों में वोट डालना एक पेचीदा काम साबित होगा।

2019 की शुरूआत में राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए जहां पहले से सत्तासीन भाजपा के कामकाज से प्रदेश की जनता नाखुश थी इसलिए पूरा जनमत कांग्रेस के पक्ष में चला गया। और कांग्रेस सत्ता में आ गई। ठीक 4 महीने बाद देश में लोकसभा का चुनाव हुआ और कांग्रेस को दोनों राज्यों की कुल 54 सीटों में महज एक सीटे ही मिली। कहने का आशय साफ है कि दोनों ही चुनाव के समय मुद्दे अलग-अलग थे जिसपर जनता ने फैसला किया।

एक साथ चुनाव करवाने से एक डर यह भी है कि इससे चुने गए प्रतिनिधि बेलगाम हो जाएगें। और क्षेत्र से गायब हो जाएंगे। बार-बार चुनाव होने से उनकी जवाबदेही तय होती है साथ ही चुनाव में जीत के मद्देनजर भी क्षेत्र में कई योजनाएं लागू कर दी जाती है। इसके कारण जमीनी स्तर के रोजगार पैदा होते हैं जो जनता को सीधे लाभ पहुंचाता है।

वहीं इसके विरोध में तर्क ये दिया जाता है कि बार बार चुनाव होने से आचार सहिंता लागू की जाती है, जिससे चुनाव से 3 महीने पहले ही सरकारी कामकाज ठप कर दिए जाते हैं। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि नेताओं के पास काम करने के लिए पांच साल का समय होता है क्या वह हर योजना चुनाव के वक्त ही शुरू करना चाहते हैं। खास बात यह कि अगर चुनाव के समय नेता वास्तव में काम करना चाहते हैं तो वह काम कर सकते हैं कोड ऑफ कंडक्ट से ऐसे कार्यों को करने में कोई बाधा नहीं आती।

बार बार चुनाव होने से पर्यावरम को भी फायदा होता है क्योंकि चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही सार्वजनिक संपत्तियों का दुरुपयोग, वायु और शोर प्रदूषण पर रोक तथा प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध जैसे कानूनों का कड़ाई से पालन होता है। चुनाव के समय सारे हथियार जमा कर लिए जाते हैं इससे दबंगई व हत्या के भी मामले में कमी देखी गई है। गैर जमानती अपराधियों के खिलाफ गैर जमानती वारंटों पर भी अमल किया जाता है।

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