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महाराष्ट्र: मां बेचती थी शराब, बेटा बना कलेक्टर, राजेंद्र भारूड के संघर्ष की कहानी पढ़कर आंखें हो जाएंगी नम

राजेंद्र भारूड ने एक अखबार से बीतचीत करते हुए कहा कि मैं अपनी मां के गर्भ में था उसी समय पिता का साया मेरे सिर से उठ गया था। हम इतने गरीब थे कि पिता अपनी एक फोटो तक नहीं खिंचवा पाए।

महाराष्ट्र: मां बेचती थी शराब, बेटा बना कलेक्टर, राजेंद्र भारूड के संघर्ष की कहानी पढ़कर आंखें हो जाएंगी नममां बेचती थी शराब, बेटा बना कलेक्टर

महाराष्ट्र के धुले जिले में एक गरीब का के बेटे में कलेक्टर बनकर मिसाल पेश की है। राजेंद्र भारूड के जीवन की कहानी प्रेरणादायक ही नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए मिसाल है। राजेंद्र भारूड इतने गरीब थे कि पिता की एक फोटो तक क्लिक नहीं हो पाई थी। उनकी मां शराब बेचती थी, लेकिन जब वह भूखे होते थे तो उनकी दादी उन्हे एक दो चम्मच शराब पिला देती थी।

राजेंद्र भारूड ने एक अखबार से बीतचीत करते हुए कहा कि मैं अपनी मां के गर्भ में था उसी समय पिता का साया मेरे सिर से उठ गया था। हम इतने गरीब थे कि पिता अपनी एक फोटो तक नहीं खिंचवा पाए। मुझे अपने पिता की शक्ल भी देखने का सौभाग्य भी प्राप्त नहीं हुआ। परिवार का ऐसा हाल था कि एक वक्त का खाना भी जुटा पाना बहुत मुश्किल होता था। गन्ने के खरपतवार से बनी छोटी सी झोपड़ी में हमारा 10 लोगों का परिवार रहता था। उन्होंने आगे बताया कि लोगों ने मां से कहा था कि गर्भपात करा लो। तुम्हारे पास एक बेटा और एक बेटी तो है ही। तीसरे बच्चे की क्या जरूरत है।

मां ने लोगों की बातों को किया अनसुना

लेकिन मेरी मां ने लोगों की बात को अनसुना कर दिया और मुझे जीवित रखा। उन्होंने बताया कि मैं महाराष्ट्र के धुले जिले के आदिवासी भील समाज से हूं। बचपन में मेरे चारों तरफ अज्ञान, अंधविश्वास, गरीबी, बेरोजगारी और भांति-भांति के व्यसनों का दंश था। मां कमला बहन को मजदूरी के दस रुपये मिलते थे। इतनी छोटी सी रकम से कैसे गुजारा हो सकता था। केवल दस रुपये से जरूरतें पूरी नहीं हो सकती थी। इसी कारण मां को शराब बेचनी पड़ती थी ताकि घर का खर्च चलाया जा सके।

राजेंद्र भारूड आगे बताया कि मैं जो कोई तीन साल का था। जब मुझे अधिक भूख लगी तो मैं रोता था। मेरे रोने से शराब पीने वालों का परेशानी होती थी। कुछ लोग मुझे चुप करान के लिए मेरे मुंह में शराब की बुंदे डाल देते थे। दूध की जगह दादी भी मुझे हल्की सी शराब पिला देती ताकि कुछ हद तक भूख मिट जाए और मैं चुप हो जाऊं। कुछ दिनों बाद शराब की आदत सी पड़ गई। उन्होंने यह भी बताया की सर्दी खांसी हो जाने पर हमारी दवाई केवल दारू ही थी।

10वीं 95 प्रतिशत अंक प्राप्त किए

राजेंद्र भारूड ने बताया कि वह घर से बाहर चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई करते थे। लेकिन जो लोग शराब पीने के लिए आते थे वह कुछ न कुछ मगांते रहते थे। इसके लिए मुझे वह कुछ पैसे भी दे देते थे। मैंने उन्ही पैसों से कुछ किताबें खरीदीं थी। मैंने मेहनत से पढ़ाई की और 10वीं में 95 प्रतिशत अंक हासिल किए और 12वी में 90 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। साल 2006 में मेडिकल में प्रवेश परीक्षा में बैठा।

ओपन मेरिट के जरिए मुझे मुंबई के सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया था। साल 2011 में मैंने यूपीएससी का फॉर्म भर दिया था। परीक्षा पास की और कलेक्टर बन गया। लेकिन, मेरी मां को पहले कुछ पता नहीं चला। जब गांव के लोग, अफसर, नेता बधाई देने आने लगे तब उन्हें पता चला कि राजू (दुलार से) कलेक्टर की परीक्षा में पास हो गया है। वह सिर्फ रोती रहीं।

मां ने लिया था संकल्प

राजेंद्र भारूड ने बताया कि लोग कहते थे पढ़-लिखकर क्या करेगा, अपनी मां की तरह शराब ही बेचेगा। जब मैंने यह बात अपनी मां को बताई तो उसने संकल्प लिया था कि मैं अपने बेटे को डॉक्टर या कलेक्टर बनाऊंगी। लेकिन मां को जानकारी नहीं थी कि यूपीएससी क्या है। उन्होंने आगे कहा कि मैं जो कुछ भी आज हूं सिर्फ अपनी मां की बदौलत हूं।

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