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लोकसभा चुनाव 2019 में अपने एक वोट की कीमत जानकर चौक जाएंगे आप

चुनाव की तारीख से करीब 1 साल पहले से राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग तमाम माध्यमों के जरिए ये बताने के लिए लग जाता है कि आपके वोट से देश का भला होगा, इसलिए आपको वोट डालना चाहिए। एक वोट की कीमत न सिर्फ देश के लिए कीमती है बल्कि पैसों के लिहाज से भी इसबार एक वोट पर काफी खर्च हुआ है।

लोकसभा चुनाव 2019 में अपने एक वोट की कीमत जानकर चौक जाएंगे आप

चुनाव की तारीख से करीब 1 साल पहले से राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग तमाम माध्यमों के जरिए ये बताने के लिए लग जाता है कि आपके वोट से देश का भला होगा, इसलिए आपको वोट डालना चाहिए। एक वोट की कीमत न सिर्फ देश के लिए कीमती है बल्कि पैसों के लिहाज से भी इसबार एक वोट पर काफी खर्च हुआ है।

2019 का लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2019) सबसे ज्यादा मंहगा चुनाव हुआ है। सात चरणों में हुए इस चुनाव में करीब 60,000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। पिछले चुनाव यानी 2014 लोकसभा चुनाव में इसके आधा यानी 30,000 करोड़ रुपए खर्च हुआ था।

चुनाव खर्च का ये अनुमान सेंटर फार मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने लगाया है। सीएमएस के आंकड़ो की माने तो हर सीट पर तकरीबन 100 करोड़ रुपए का खर्च आया है। देश में इस साल 90 करोड़ वोटर पंजीकृत थे। वोटरों के हिसाब से जोड़े तो एक मतदाता पर करीब 700 रुपए का खर्च आया है।

सीएमएस के अनुसार चुनाव में 12 से 15 हजार करोड़ रुपए सीधे मतदाताओं को बांटे गए हैं। दावा किया जा रहा कि दक्षिण के राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में तो वोटरों को दो से तीन हजार रुपए तक नकद देकर वोट हासिल किए गए हैं।

एक प्रत्याशी को 70 लाख रुपए तक खर्च करने की अनुमति होती है इस आधार पर राजनैतिक पार्टियां चुनाव प्रचार में 20 से 25 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। चुनाव आयोग ने चुनाव को संपन्न करवाने के लिए 10 से 12 हजार करोड़ रुपए तक खर्च किया।

लोकसभा चुनाव में भागीदारी करने वाले प्रत्याशियों को चुनाव परिणाम के 90 दिन बाद चुनाव में हुए खर्च का ब्योरा देना पड़ता है। अभी फिलहाल किसी ने भी अपने खर्च का ब्योरा नहीं दिया है। एक सच्चाई ये भी है कि प्रत्याशियों द्वारा चुनाव आयोग को दिया जाने वाला खर्च सिर्फ काजगी होता है वास्तविक खर्च तो बहुत ज्यादा होता है।

चुनावी पारदर्शिता को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा कि राजनीति में अपराधीकरण और पैसे के जोर को नहीं रोका गया तो आप ये उम्मीद नहीं कर सकते कि अगला चुनाव निष्पक्षता तथा पारदर्शिता के मामले में 2019 के चुनाव से बेहतर होगा।

1998 से चुनाव पर हुआ खर्च

1998 - 9000 करोड़ रुपये

1999- 10000 करोड़ रुपये

2004 -14000 करोड़ रुपये

2009 -20000 करोड़ रुपये

2014 - 30000 करोड़ रुपये

2019 - 60000 करोड़ रुपये (अनुमानित)

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