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International Yoga Day Speech In Hindi : अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण हिंदी में

International Yoga Day Speech In Hindi : निरोग जीवन के इए योग अनिवार्य है। नियमित योग करने से शरीर सभी बिमारियों से दूर रहता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2019 (International Yoga Day 2019) में 21 जून (21 June) को मनाया जायेगा। ऐसे में अगर आपको स्कूल, कॉलेज या किसी मंच के लिए अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण (International Yoga Day Speech) लिखना या पढ़ना है तो हम आपके लिए लाये हैं लेखिका सुषीला कुमारी द्वारा लिखित सबसे बेस्ट अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण हिंदी में (Antarrashtriye Yoga Diwas Par Bhashan), जो आपके लिए काफी मददगार साबित होगा।

International Yoga Day Speech In Hindi : अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण हिंदी में

International Yoga Day Speech In Hindi : निरोग जीवन के इए योग अनिवार्य है। नियमित योग करने से शरीर सभी बिमारियों से दूर रहता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2019 (International Yoga Day 2019) में 21 जून (21 June) को मनाया जायेगा। ऐसे में अगर आपको स्कूल, कॉलेज या किसी मंच के लिए अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण (International Yoga Day Speech) लिखना या पढ़ना है तो हम आपके लिए लाये हैं लेखिका सुषीला कुमारी द्वारा लिखित सबसे बेस्ट अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण हिंदी में (Antarrashtriye Yoga Diwas Par Bhashan), जो आपके लिए काफी मददगार साबित होगा।

योग पर भारतीय स्वामित्व की वैश्विक मुहर लग जाने से भले दुनिया इसे इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के संदर्भ में भारत की एक बहुत बड़ी कामयाबी मान रही हो। लेकिन भारत में तो यह गर्मागर्म राजनीति का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। राजनीति में पक्ष-विपक्ष तक ही नहीं धर्म और समुदाय तक भी इस मुद्दे को लेकर बांट चुके हैं। यद्यपि मुस्लिम धर्म गुरुओं के एक बड़े तबके ने योग को अपनी सहमति दे दी है और इसे लेकर किये जा रहे धार्मिक विरोध को गैर जरुरी बताया है फिर भी तमाम हिन्दू मुस्लिम कट्टरपंथी योग के मसले पर आमने सामने हैं। सवाल है ऐसे में प्रस्तावित वैश्विक योग दिवस में भारत दुनिया को क्या सन्देश देगा ?

योग पर बिना किसी समुचित तर्क के हमेशा से दक्षिणपंथी हिन्दुओं का एक तरह से कब्जा रहा है। शायद यही वजह है कि जब संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग सम्बन्धी उस प्रस्ताव को स्वीकृति दी, जिसे बहुत कम समय में ही 177 देशों ने अपना समर्थन दिया था तो दक्षिणपंथी हिन्दुओं की बांछें खिल गयी थीं। ज्ञात हो कि जब अपने पहले अमेरिकी दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष योग दिवस का प्रस्ताव पेश किया था, और चाहत व्यक्त की थी कि संयुक्त राष्ट्र योग को 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' के रूप में मनाने पर विचार करे। तब उन्होंने ही इसके लिए 21 जून की तारीख भी सुझायी थी। आज इसे कम से कम भाजपा अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।


योग के विरोध का एक राजनीतिक कारण यह भी है। जिसे विरोधी कह तो नहीं पा रहे मगर समझ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव को संयुक्तराष्ट्र ने 12 नवम्बर 2014 को स्वीकृति दी थी। संयुक्त राष्ट्र ने तकरीबन मोदी के ही शब्दों में कहा है कि योग को पूरी दुनिया में फैलाना व स्थापित करना आधुनिक तनाव भरी तेजरफ्तार जीवनशैली के लिए जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र में योग को इतनी बड़ी स्वीकृति मिलने के बाद इससे भारत में हर्ष की लहर दौड़ जाना स्वाभाविक था। हिंदुत्ववादियों ने इस घोषणा में संघ के योग प्रचार और हिन्दू धर्म-संस्कृति के विस्तार का नतीजा देखा। इसीलिए वो झूमने लगे।

इस घटना को बड़ी होशियारी से भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी की और इस जरिये अंततः अपनी पार्टी की व्यक्तिगत उपलब्धि बना दिया। कुछ इसी अंदाज में लोकसभा और राज्यसभा में हर्ष मनाया गया जिसमें एक तरह से देश अनुपस्थित रहा। यह जितनी चालाकी भाजपा और उसके कट्टरपंथी संगी साथियों की थी उससे कहीं ज्यादा न समझी तथाकथित सेक्युलरवादी बुद्धिजीवियों की भी थी। इसका फायदा योग गुरु रामदेव जैसे कारोबारियों और अपनी मौजूदगी से किसी भी मसले को दो धड़ों में बांट देने वालों ने उठाया। बाबा रामदेव ने इस उपलब्धि को भगवा जामा पहनाते हुए देश भर में पांच लाख आचार्य कुलम बनाने की घोषणा कर दी।

संयुक्त राष्ट्र की घोषणा से आह्लादित योग गुरु ने इसका सारा श्रेय मोदी को देते हुए कहा कि इसके जरिये उन्होंने अपने वैश्विक नेतृत्व का लोहा मनवा लिया है। दरअसल इन्ही प्रतिक्रियाओं के बाद योग की वैश्विक स्वीकृति की उपलब्धि देश की न रहकर भाजपा की हो गयी। कांग्रेस, वाम, समाजवादियों या मुस्लिमों अथवा स्वतंत्र विचारकों ने इस सब की कोई परवाह ही नहीं की। किसी ने भाजपा का हाथ नहीं पकड़ा कि जिसे वह अपनी उपलब्धि साबित करना चाहती है दरअसल वह उसकी नहीं पूरे देश की है। योग की उपलब्धि पर भाजपा के बाद अगर किसी ने अपनी राय की मौजूदगी दर्ज कराई वो राष्ट्रपति थे।


पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की सरकारी तैयारियों के बीच राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है, 'संयुक्त राष्ट्र की ओर से इस संबंध में लिया गया फैसला वैश्विक स्तर पर योग को लोकप्रिय करेगा और इस 'अमूल्य भारतीय धरोहर' से लोग लाभ पा सकेंगे।' राष्ट्रपति ने दुनिया को सन्देश देते हुए कहा प्राचीन भारतीय जीवन पद्धतियां शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों की जरूरतों का संपूर्ण उत्तर हैं।' मुखर्जी ने यह भी कहा कि योग कला, विज्ञान एवं दर्शन है, जो जनता को आत्मानुभूति कराने में मदद करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने पुष्टि की है कि योग से न सिर्फ तनाव कम होता है बल्कि दीर्घकाल तक कई फायदे होते हैं।

जाहिर है राष्ट्रपति की भाषा देश के मुखिया की माफिक सौम्य रहनी थी सो वो सौम्य रही। मगर कट्टरपंथियों को तो अपना रंग दिखाना ही था। सबसे पहले हमेशा की तरह भाजपा सांसद महंत आदित्यनाथ आये। एक बार फिर उन्होंने जहर बुझे बयान से श्रीगणेश किया। वाराणसी में रजत राजित सिंहासन महोत्सव के समापन में शामिल होते हुए उन्होंने कहा है,जो लोग सूर्य नमस्कार को नहीं मानते, उन्हें समुद्र में डूब जाना चाहिए। गौरतलब है बिना किसी बौधिक नेतृत्व के मुस्लिम कट्टरपंथियों ने भी मामले को हाईजैक कर लिया था। वह यह भी कहने से बाज नहीं आये कि जिन्हें योग से परहेज है, उन्हें भारत की धरती को छोड़ देना चाहिए।

उन्हें भगवान सूर्य से कभी प्रकाश नहीं लेना चाहिए और घरो में, बिलो में अंधरे में कैद रहना चाहिए। सेर का बदला सवा सेर से देने की मंशा से योग का विरोध करते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने सरकारी स्कूलों में योग और गीता पढ़ाए जाने के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। बोर्ड का मानना है कि सरकारी या सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त स्कूलों में योग, सूर्य नमस्कार या गीता का पाठ पढ़ाया जाना संविधान के अनुच्छेद 28 का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है इसलिए बोर्ड इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करेगा।


बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य तथा उत्तर प्रदेश के अपर महाधिवक्ता जफरयाब जिलानी के मुताबिक राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश के स्कूलों में योग और गीता का पाठ पढ़ाया जा रहा है जबकि गीता, योग और सूर्य नमस्कार एक तरह से सनातन धर्म के पाठ हैं। एक और मुस्लिम धर्मगुरु और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद राशिद फरंगी महली ने भी कहा कि यद्यपि मुस्लिम योग के कतई खिलाफ नहीं है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के तौरपर मनाने के फैसले से आम मुसलमान खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। हमारा एतराज सिर्फ इतना है कि योग में सूर्य नमस्कार और ओम का उच्चारण अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए।

मौलाना ने कहा कि दुनिया के 45 इस्लामी देशों ने योग के समर्थन में वोट दिया है जिसकी बदौलत योग को अंतरराष्ट्रीय दिवस के तौरपर मान्यता मिली है। योग के भगवाकरण के प्रयास को मुसलमान कतई बर्दाश्त नही करेंगे। सूर्य नमस्कार और ओम सनातन शैली का हिस्सा है जबकि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत का उसूल है। अल्लाह के सिवा मुसलमानों का सर सूरज, चांद, तारे समेत दुनिया जहान की किसी भी ताकत के आगे नहीं झुकेगा। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के प्रोफेसर सारिब रूदौलवी हालांकि मुस्लिम धर्मगुरुओं के योग के बहिष्कार के फैसले से सहमति नहीं जताते। क्योंकि वो कहते हैं योग स्वस्थ जीवनशैली का पर्याय है।

यह अच्छे स्वास्थ्य के लिए वरदान की तरह है और इसे अपनाने से दवाइयों के इस्तेमाल से होने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। योग अपनाने वाले लोगों को दवाइयों की जरूरत न के बराबर होती है। लेकिन उनका मानना है कि योग को वास्तव में योगियों से जोड़ दिया जाना मुस्लिम समाज में भ्रम के हालात पैदा कर रहा है। प्रो.रुदौलवी खुद 40 सालों से योगासन कर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय योग संस्थान के सदस्य हैं। उनका कहना है कि योग के किसी भी आसन को अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए। हम कहते हैं कि खड़े होकर पानी नहीं पीना चाहिए या खाने के बाद तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए। अगर इन बातों को धर्म से जोड़ दिया जाए तो यह बेवजह बहस का मुद्दा बनकर रह जाएगी।


बहरहाल अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी मानकर योग को अपनाना हर किसी के लिए फायदेमंद है। शायद इसीलिये आज पश्चिम में योग को बहुत तरजीह दी जा रही है। जबकि हमारे यहां कट्टरपंथी इसमें धर्म और वर्चस्व की जड़ें तलाश रहे हैं। ऐसे में प्रो. रुदौलवी का यह मत बिलकुल सही है कि सरकार को योग क्रिया में सूर्य नमस्कार का नाम बदल कर इसे अष्टासन कर देना चाहिए। सूर्य नमस्कार से मुसलमानों को एतराज हो सकता है मगर योगासन में शामिल अष्टासन से नहीं। ओम के उच्चारण पर मुस्लिम समुदाय के एतराज के सवाल पर रूदौलवी कहते हैं कि सनातम धर्म गायत्री मंत्र में ओम भूर्भवः स्वाहा कहा जाता है जबकि इस्लाम में अल्हम अल्लिलाह का उच्चारण किया जाता है।

मायने तकरीबन दोनों के एक है। हिन्दूओं में ईश्वर, मुसलमानों में अल्लाह और इसाइयों में गाॅड सब अलग अलग तरह से उस अदृश्य शक्ति की आराधना करते हैं जिनकी बदौलत हम सबका वजूद है सिर्फ इनमें भाषा बदल जाती है। योग के इस राजनीतिक योग का समीकरण बन ही नहीं सकता था यदि इसमें राहुल न कूदते। इसलिए समय पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी इसमें कूद गए हैं। योग दिवस पर राजनीति करने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर निशाना साधा है। राहुल गांधी ने कहा कि पहले उन्होंने स्वच्छता की बात की। उन्होंने कहा कि आपको रोजगार नहीं मिलेगा, अतएव झाड़ू थामिए और झाड़ू लगाना शुरू कीजिए।

जब स्वच्छता की चर्चा पूरी हो गई। तब अब वह कह रहे हैं कि राजपथ पर जाइए और योग कीजिए। रोजगार के बारे में कोई चर्चा नहीं हो रही। उस पर चुप्पी लगा ली है। हर रोज कोई नई बात कही जाती है। ये सारी नई बातें अधूरे वादों को ढंकने के लिए कही जा रही हैं। राहुल के साथ ही दिग्विजय सिंह और दूसरे कांग्रेसी भी योग पर राजनीतिक मोर्चा लगा चुके हैं जबकि आग में घी डालने के बतौर प्रधानमंत्री आजकल हर दिन योग पर ट्वीट कर रहे हैं। इस तरह देखें तो भले पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को भारत की एक बड़ी बौद्धिक संपदा के लिहाज से उपलब्धि मान रही हो लेकिन भारत में तो योग दिवस राजनीतिक मोर्चे का योग बन चुका है।

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