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Independence Day 2019 : आजादी की राह पर आधी आबादी

Independence Day 2019 बात जब महिलाओं से जुड़ी आजादी की होती है तो आज भी बहुत से ऐसे बंधन दिखते हैं, जिनसे मुक्त होने के लिए वे संघर्ष करती नजर आती हैं। सामाजिक जीवन में सुरक्षा, परिवार में अधिकार, मानसिक दायरों-परंपराओं को तोड़ने और सपनों को साकार करने जैसी बहुत-सी आजादी हैं, जिन्हें हासिल करना अभी बाकी है। इस दिशा में संतोषजनक बात यह है कि वे तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद बगैर किसी हताशा के हौसले के साथ अपनी आजादी के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

Independence Day 2019 : आजादी की राह पर आधी आबादी

Independence Day 2019 : आजादी के मायने हर किसी के लिए अलग-अलग होते हैं। पिंजड़े के फड़फड़ाते किसी पंछी के लिए दायरों को तोड़कर उड़ जाना आजादी है, तो किसी बच्चे के लिए खुले आकाश के नीचे मन भर कर खेल लेना आजादी हो सकती है। आजादी सबको चाहिए, पुरुषों को भी, महिलाओं और बच्चों को भी।

यहां तक कि बेड़ियों में जकड़े रहने के आदी पशुओं को भी। बात जब महिलाओं की आजादी की आती है, तो इसे कई बिंदुओं पर समझना जरूरी हो जाता है, क्योंकि महिलाओं के लिए आजादी का मतलब सिर्फ दायरों को तोड़ देने भर से नहीं होता है, न ही उनके परिवार, समाज या परंपराओं के खिलाफ किसी विद्रोह से है, बल्कि हर महिला के लिए उसकी अपनी स्थितियों के मुताबिक आजादी का अलग मतलब हो सकता है।

किसी के लिए आजादी का मतलब बराबरी के अधिकार से है, तो किसी के लिए दायरों में रह कर अपनी एक अलग पहचान बनाने से है, तो कहीं दायरों को तोड़ कर अपना अस्तित्व साबित करने से है। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को कई स्तरों पर आजादी चाहिए।

लेकिन इसके लिए जरूरी है कि महिलाएं पहले खुद को मानसिक तौर पर इतना सबल बनाएं कि वह यह सुनिश्चित कर सकें कि आखिर उन्हें किस तरह की आजादी चाहिए। बराबरी से जीने की आजादी, अपने जीवन के अहम निर्णय लेने की आजादी, सपनों को चुनने की आजादी या फिर अपने अस्तित्व को बनाए रखकर अलग मुकाम हासिल करने की आजादी।




मानसिक तौर पर सबल बनने की आजादी

आमतौर पर लड़कियों की परवरिश एक निश्चित दायरे में की जाती है। ऐसे में यह उम्मीद ही कहां बचती है कि वे कुछ अलग सोचें। नतीजतन उनकी सोच का दायरा सीमित रहता है। 'द सेकेंड सेक्स' में सिमोन द बोउआर ने भी इस बात को इन शब्दों में व्यक्त किया है कि स्त्री होती नहीं, बना दी जाती है यानी शुरुआत से ही उनकी सोच को पनपने ही नहीं दिया जाता। यही वजह है कि वे एक सीमित दायरे से अलग सोच नहीं पातीं।

इसके लिए जरूरी है कि मानसिक तौर पर सबल बनाने की शुरुआत बचपन से ही की जाए, ताकि बचपन से ही उनको ऐसा माहौल मिले कि उनकी सोच विकसित हो। तभी महिलाओं के मानसिक तौर पर सबल बनने की शुरुआत होगी और वे जीवन के अहम फैसले लेने में सक्षम होंगी। विकसित मानसिकता के बल पर ही वे हौसलों की उड़ान और सपनों के परवाज को एक दिशा दे सकेंगी।



परंपरा की बेड़ियों से आजादी

यह सही है कि परंपराओं को निभाने का जिम्मा महिलाओं पर ही लाद दिया गया है, इसी के मुताबिक उनकी सोच भी बन गई है। हालांकि बदलते और आधुनिक होते समाज में अब बाहर निकल कर शिक्षित हो रहीं बेटियों ने परंपराओं के इस बंधन को कुछ ढीला जरूर किया है। यही वजह है कि अब घूंघट, पर्दे में रहना उन पर बोझ नहीं, उनकी इच्छा पर निर्भर है।

केरल की बॉडी बिल्डर मजीजिया भानू और भोपाल की बुर्के, हिजाब में जिम करती महिलाएं इसकी मिसाल कही जा सकती हैं, जिन्होंने अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए भी अपने व्यक्तित्व को निखारा है, अपने सपनों को पूरा किया है।




सपनों को चुनने की आजादी

सपने देखने पर अंकुश नहीं होता, लेकिन सपने पूरे करने पर जरूर होता है। खासकर जब बात महिलाओं की हो, उन्हें यह मौका कम ही मिलता है। सपनों को हकीकत बनाने का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है, जब इन्हें चुनने की आजादी भी हो। यही आजादी अकसर बेटियों और पत्नियों को नहीं मिलती।

कहीं पिता तो कहीं पति उनके लिए तय करते हैं कि उन्हें क्या करना है। ऐसे में खुद महिलाओं को सक्षम बनना होगा और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी आत्मनिर्भरता का विश्वास दिलाना होगा, ताकि अपने सपनों को चुनने की भी आजादी उन्हें मिल सके।

हौसलों को परवाज देने की आजादी

किसी ने खूब कहा है, 'कौन कहता है आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।' मंजिल मिलने की उम्मीद इंसान के अपने हौसलों की उड़ान पर निर्भर करती है।

साथ ही परिवार का साथ बेटियों के सपनों को पूरा करने में उनके साथ हो तो बात ही अलग है, क्योंकि भावनात्मक तौर पर उनके इरादों में हौसलों की शक्ति परिवार ही देता है। हौसलों की इसी उड़ान के बूते उन्हें आगे बढ़ने से और दुनिया मुट्ठी में करने से कोई नहीं रोक सकता।



समाज में हिफाजत से जीने की आजादी

आधुनिक होते समाज में बलात्कार और छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाएं महिलाओं की आजादी पर असुरक्षा की गहरी छाया की तरह हैं। ऐसे में कड़े कानूनी प्रावधान होने के बावजूद महिलाएं डर के साए में जीती हैं।

यह डर न सिर्फ उनकी आजादी में खलल डालता है, बल्कि उनके आश्वस्त होकर जीने में भी बाधा है। इस डर से उन्हें पूरी आजादी तभी मिल सकेगी, जब उनके लिए लोगों की सोच बदले और समाज में उन्हें बराबरी के साथ उचित सम्मान मिले।

अधिकारों को हासिल करने की आजादी

महिलाओं को अधिकार तो मिले हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है। दरअसल, यह महिलाओं की जागरूकता पर निर्भर है कि वे खुद अपने अधिकारों के प्रति सजग और जागरूक हों। साथ ही यह उनके समाज पर भी निर्भर है कि वह इनको हासिल करने की कितनी आजादी उन्हें देता है।

मिसाल के तौर पर संपत्ति के अधिकार को ही लें। जब खुद अधिकतर महिलाएं ही इस अधिकार को लेकर जागरूक नहीं हैं, तो फिर यह किसको मिला है और किसको नहीं, इस पर सवाल ही कहां उठता है।

लेखिका - नाज खान

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