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Haribhoomi-Inh News: संत से 'राह' या संसार की चाह? चर्चा प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ

Haribhoomi-Inh News: हरिभूमि-आईएनएच के खास कार्यक्रम 'चर्चा' में प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने शुरुआत में कहा कि नमस्कार आपका स्वागत है हमारे खास कार्यक्रम चर्चा में, आज हमारा विषय काफी गंभीर है, संजीदा है और एक ऐसा विषय है, जो अपने आप में एक अप्रिय है। हमारा विषय है संत से राह या संसार की चाह।

Haribhoomi-Inh News: संत से राह या संसार की चाह? चर्चा प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ
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Haribhoomi-Inh News: हरिभूमि-आईएनएच के खास कार्यक्रम 'चर्चा' में प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने शुरुआत में कहा कि नमस्कार आपका स्वागत है हमारे खास कार्यक्रम चर्चा में, आज हमारा विषय काफी गंभीर है, संजीदा है और एक ऐसा विषय है, जो अपने आप में एक अप्रिय है। हमारा विषय है संत से राह या संसार की चाह। संदर्भ अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महंत रहे नरेंद्र गिरि जी महाराज असमय में हुई इस मौत की पहेली को सुलझाने में पुलिस लगी हुई है। उनकी आत्महत्या के संदर्भ में कथित नोट पुलिस ने बरामद किया है। जिसके पन्ने सार्वजनिक हो चुके हैं। तकरीबन 12 से ज्यादा पन्नों में लिखा है। जिसपर पूरी कहानी लिखी है।

जिन्होंने उसमें अपनी मौत के लिए अपने शिष्य आनंद गिरि को जिम्मेदार बताया है। तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगाए हैं और इसी के साथ पुराने किस्से कहानी निकलने शुरू हो रहे हैं। नरेंद्र गिरि के ही शिष्य हैं, आनंद गिरि उनके ऊपर आरोप कि महिलाओं से छेड़छाड़ के संदर्भ में ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तार हुए। वह आरोप लगा रहे थे कि नरेंद्र गिरि जी ने मठ की कीमती संपत्ति निजी स्वार्थ के लिए बेच रहे थे। मई में दोनों के बीच में सुलह हुई। बाद में कथित रूप से प्राप्त पत्र में कहा गया कहा गया है कि नरेंद्र गिरि जी की कई महिलाओं के साथ फर्जी फोटो से उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था। इससे आहत होकर उन्होंने आत्महत्या कर ली।

संदर्भ केवल एक महंत या संत के द्वारा आत्महत्या की कोशिश या हत्या का नहीं है। सवाल इस बात का है जिस सनातन धर्म के अंदर, हिंदू धर्म की मान्यताओं के अंदर, हम कसीदे पढ़ते-पढ़ते नहीं थकते हैं। अगर हम मार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं, उलझन में फंस जाते हैं, तो उससे बाहर संत ही निकालता है। संत के सानिध्य में हम राह दिखती है। संत के सानिध्य में हमें तमाम कष्टों से निजात मिलती है। संत से हमें मुक्ति मिल सकती हैं। संत के बताए हुए मार्ग पर चलने से जीवन का कल्याण है। उन संतों की यह दुर्दशा हमारी उस भावना पर कितनी करारी चोट देती है. यह आज हमारे चर्चा के विषय में चर्चा का विषय है। कई सवालों पर चर्चा करेंगे। इस गंभीर विषय पर चर्चा करने के लिए हमारे साथ चार मेहमान जुड़े हुए हैं, जिनसे हम बारी बारी से इस मामले को समझने की कोशिश करेंगे...

संत से 'राह' या संसार की चाह ?

'चर्चा'

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