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Haribhoomi-Inh News: म्यांमार : सरकार, सेना और संहार ! प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने की चर्चा

Haribhoomi-Inh Exclusive: हरिभूमि-आईएनएच के खास कार्यक्रम 'चर्चा' में प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने म्यांमार में चल रहे विवाद को लेकर बातचीत की।

Haribhoomi-Inh News: म्यांमार : सरकार, सेना और संहार ! प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने की चर्चा
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प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी, पूर्व राजदूत अशोक, रक्षा विशेषज्ञ के ले.ज (रि) राज कादयान, सीएसआईएम एचओडी सोसियोलॉजी के प्रो. प्रशांत त्रिपाठी

Haribhoomi-Inh Exclusive: हरिभूमि-आईएनएच के खास कार्यक्रम 'चर्चा' में प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने म्यांमार में चल रहे विवाद को लेकर बातचीत की। म्यांमार : सरकार, सेना और संहार ! संदर्भ है… पड़ोसी देश म्यांमार में एक बार फिर सैन्य शासन… दरअसल म्यांमार में लोकतंत्र की सबसे बड़ी उम्मीद आंग सान सू की (Aung San Suu kyi ) रही हैं… सवाल ये उठता है कि उनसे कहां चूक हो गई कि वहां की सत्ता पर एक बार फिर सेना का कब्जा हो गया… दशकों के संघर्ष के बाद उन्हें देश की कमान मिली थी और लगा था कि म्यांमार के हालात सुधर जाएंगे, लेकिन एक बार फिर म्यांमार सैन्य शासन के हाथों में चला गया है। जाहिर है वहां एक अदद लोकतंत्र की तलाश अब भी जारी है…

कार्यक्रम 'चर्चा' में प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने पूर्व राजदूत अशोक, रक्षा विशेषज्ञ के ले.ज (रि) राज कादयान, सीएसआईएम एचओडी सोसियोलॉजी के प्रो. प्रशांत त्रिपाठी से खास चर्चा की। खास कार्यक्रम के दौरान इन मेहमानों से कई सवाल पूछे...

म्यांमार : सरकार, सेना और संहार !

'चर्चा'

1 फरवरी को म्यांमार में सेना ने नेता आंग सान सू की को हिरासत में ले लिया और खुद सरकार बन गई। इस दरौन देश में लगातार कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। जिसमें 500 लोगों की मौत हो चुकी है। इस कार्रवाई के बाद यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों में उठा। सेना ने आरोप लगाया कि साल 2020 में हुए चुनावों के दौरान देश में धांधली हुई थी। वहीं आंग सान सू की की एनएलडी की पार्टी ने कहा कि म्यांमार में प्रदर्शन हो रहे हैं और सेना बर्बरता दिखा रही है। इन मौतों के लिए सेना जिम्मेदार है। एक फरवरी को तख्तापलट बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रतिरोध के साथ किया गया है कि सुरक्षा बल हिंसा के बढ़ते स्तर के माध्यम से कुचलने में असमर्थ रहे हैं। जिसमें अब नियमित रूप से प्रदर्शनकारियों को गोली मारना शामिल है।

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